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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 76

From जैनकोष



कृते येषं त्वया कर्म कृतं श्वभ्रादिसाधकम्।

त्वामेव यांति ते पापा वंचयित्वा यथायथम्।।76।।

पापों के फल में खुद के ही भोक्तृव्य― हे आत्मन् ! जिन प्राणियों के लिये तू नारकादिक दु:खों के देने में समर्थ पापकर्मों को करता है सो वे पापी लोग तो जिनके लिये तूने पाप किया वे सब ही धोखा देकर अपनी-अपनी गति को चले जायेंगे। उनके लिये जो तूने पाप कर्म किया, उसका फल तो केवल तुझे ही अकेला भोगना पड़ेगा। नरकों में जो विवेकी नारकी होते हैं, अवधिज्ञान बल से पूर्वभव की बातों को भी जान जाते हैं वहाँ भी इन भावनाओं का भाते हैं बिना क्रम, बिना नाम के अपने सच्चे हृदय से। मैंने जिन कुटुंबियों के लिये अनेक पापकार्य किये व कुटुंबीजन यहाँ एक भी मेरे साथी नहीं हो रहे हैं। उन पापकर्मों का फल यहाँ अकेले ही भोगना पड़ रहा है। वस्तु हैं सब एक दूसरे से न्यारी-न्यारी किंतु अपने स्वरूप से तन्मय हैं। जो जीव अपने इस यथार्थ स्वरूप की श्रद्धा नहीं रखते हैं वे बाहरी पदार्थों की परिणतियों में नाना कल्पनाएँ बनाते और दु:खी होते रहते हैं।

अपनी संभाल का अनुरोध― हे आत्मन् ! अपने आपको संभाल। कोई खोटा आचरण न बने इसकी सावधानी रख। यही सर्वोत्कृष्ट विभूति है। देखिये यह एक नीति बहुत प्रसिद्ध है कि तेरा धन, वैभव यदि गुम गया, मिट गया तो समझ कि तेरा कुछ नहीं गया। यदि शरीर निर्बल हो गया, अति राज रोग से ग्रस्त हो गया, एकदम शक्तिहीन हो गया तो समझ कि तेरा कुछ-कुछ गया और यदि तेरा पापों से भरा दिल बना तो समझ ले कि सब कुछ चला गया। हे आत्मन् ! तू सर्वपरिस्थितियों में केवल अकेला ही अपना जिम्मेदार है। ये सब मायामयी रंग हैं जो देखने में सुहावने लगते हैं, भीतर में मोहवश बड़े रमणीक लगते हैं पर हैं सब तुझसे अत्यंत भिन्न, जितने कि अन्य पदार्थ हैं अत्यंत भिन्न हैं। कर्तव्य तो अपना परिस्थिति के अनुकूल करें लेकिन इस समझ से कभी बेहोश मत बनें कि मेरा तो केवल मैं ही आत्माराम हूँ। जिस प्रकार की भावना बनाऊँ, जैसी में परिस्थिति बनाऊँ वैसा मैं अपने आपको आनंद-धाम में अथवा निकृष्ट धाम में ले जा सकता हूँ।

अन्य के द्वारा सहायता की असंभावना― मेरा सर्वत्र मैं ही हूँ, मेरा भविष्य मेरे पर ही निर्भर है, ऐसा जानकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की भावना से अपने आपको पवित्र बनायें, मोक्षमार्ग के पथिक बनें। इन मायारूप परिजन इष्ट मित्रादिक के लिए अथवा उनमें अपना मन बहलाने के लिए अथवा उनसे भोग संपादन के लिए तू तृष्णा मत बना, उनकी आशा और उनमें आसक्ति मत कर। जिनके लिये तू इतने कार्य कर रहा है वे तुझको धोखा देकर अपनी गैल जावेंगे और तुझे उन सब पापकर्मों का फल अकेले ही भोगना पड़ेगा।

अपने परिणाम से कर्म का संचय और भोक्तृत्व― एक जगह एक सेठ ने प्रश्न किया था कि हम अन्याय करके असत्य व्यवहार करके, अन्य लोगों को धोखा देकर इतना द्रव्य कमाते हैं तो उस द्रव्य को जो-जो लोग खाते है, जिन-जिनके काम वह धन आता है अर्थात् परिवार के सभी लोगों को उन सबका पाप बँट जाता होगा ना? इसका उत्तर तो बहुत सीधा है। उत्तर दिया गया कि तुम्हारे अन्याय को, धोखेबाजी को कुटुंबीजन यदि जानते हों कि यह इस प्रकार की कमाई है और उसका उपयोग करते हों तो उन्हें पाप लगेगा, मगर वह पाप बढ़कर न लगेगा। तुम्हारा तो तुम पर पूरा ही पाप लगेगा, वे कुटुंबीजन यदि जान बूझकर उसे भोग रहे हैं, प्रोत्साहन दे रहे हैं तो वे अपना पाप और अलग बाँधेंगे। कदाचित् किसी, कुटुंबी को इस बात का बिल्कुल भी पता न हो कि यह धन धोखा देकर कमाया गया है, अन्याय करके उपार्जित किया गया है और वे उस धन को भोग रहे हों तो उन्हें उसका पाप न लगेगा। खैर, उससे यह शिक्षा लेनी चाहिए कि हम जो कुछ करते हैं उस करनी के जिम्मेदार हम खुद ही हैं ऐसा निर्णय रखते हुए अपना कदम बढ़ायें।


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