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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 768

From जैनकोष



निश्चलीकुरु वैराग्यं चित्तदैत्यं नियंत्रय।

आसादय वरां बुद्धिं दुर्बुद्धे वृद्धसाक्षिकम्।।

गुणवृद्ध सत्पुरुषों की साक्षिता में वैराग्य और चित्तनियंत्रण के कर्तव्य का संदेश- हे दुर्बुद्धि आत्मन् ! अर्थात् जिसका चित्त किसी विषयकषायों की ओर लग रहा है ऐसे हे पुरुष, देख अपने आत्मा की भलाई के लिए अपने आत्मा पर करुणा कर। गुरुजनों की साक्षीपूर्वक अर्थात् गुरुजनों के निकट रहकर तू अपने वैराग्य को निश्चल बना। राग एक बहुत मलिन परिणाम है। परपदार्थ अपने से अत्यंत भिन्न हैं और उनसे कोई नाता भी नहीं है। सभी पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में अपना अस्तित्व रखते हैं, फिर भी किसी पर की ओर राग पहुँचना यह कितना अंधकार है? इस राग में ज्ञान की प्रसन्नता नहीं रह पाती। जब किसी चीज में राग न उठ रहा हो, शांत मुद्रा में बैठे हों तब की मुद्रा में देखो कितनी प्रसन्नता रहती है? जहाँ दिखावट है, बनावट है वहाँ प्रसन्नता नहीं रह पाती। जब रागभाव आये तो चित्त की निर्मलता दूर हो जाती है। यदि प्रसन्नता चाहिए तो राग हटाने का प्रयत्न करें, यह बात मिलेगी गुरुजनों की सेवा से, संगति से।

हे आत्मन् ! तू लेश मात्र भी सांसारिक विषयभोगों से राग मत कर। यह गुण प्राप्त होगा वृद्धसेवा से। लौकिक हिसाब से भी देखो। जिस घर में अपने माता, पिता, वृद्ध पुरुषों की सेवा हो रही है उन बच्चों की बुद्धि विकसित होती है, और हर कामों में उनकी बुद्धि काम देती जाती है। और, जो माता-पिता को दु:खी रखते हैं उन पुरुषों की बुद्धि भी अव्यवस्थित रहती है, काम नहीं कर पाती है, फिर जो मोक्षमार्ग के गुरुजन हैं, सम्यग्दृष्टि मनुष्य हैं, ज्ञानीजन हैं उनकी सेवा करने से, उनकी संगति में रहने से बुद्धि की स्वच्छता अधिकाधिक बढ़ती है, संसार देह भोगों से वैराग्य की प्राप्ति होती है। इस कारण वृद्ध पुरुषों के निकट रहकर अपने वीतराग भाव की वृद्धि करें, वृद्धसेवा से चित्तरूपी यह राक्षस जो कि अपनी स्वच्छंदता से जिस चाहे काम में पुरुष को लगा देते हैं उसका नियंत्रण करें। इस चित्त का नियंत्रण गुरुजनों की सेवा से होता है। गुरुसेवा करके अपनी बुद्धि को अंगीकार करें, निर्मल बनावें। ये सभी गुण गुरुजनों की सेवा करने से प्राप्त होते हैं।

आत्मध्यान द्वारा आत्महित करने में वास्तविक आत्म-करुणा- देखिये आत्मा का हित है आत्मा के ध्यान में। जीव सभी किसी न किसी का ध्यान करते ही रहते हैं। बालक, जवान, बूढ़े सभी को देखो वे किसी न किसी का ध्यान बनाये ही रहते हैं, पर यह निर्णय करें कि किसके ध्यान में आत्म-संतोष मिलता है और किसके ध्यान से आत्मा में विह्वलता बनती है? जो स्वयं रागी, मोही, द्वेषी प्राणी हैं उनकी प्रीति में हित नहीं है, विह्वलता बढ़ती है। और जो राग, द्वेष, मोह से अलग हैं ऐसे गुरुजनों की सेवा में रहने से एक शांति और संतोष प्राप्त होता है। और, सबसे उत्कृष्ट शांति तो रागद्वेषरहित केवल ज्ञानानंद स्वरूप निज अंतस्तत्त्व की उपासना से प्रकट होती है, अर्थात् आत्मध्यान ही इस जीव का वास्तविक शरण है। वह आत्मध्यान कैसे प्रकट हो उसके संबंध में इस ग्रंथ में वस्तु का वर्णन किया गया है। आत्मध्यान का पात्र वही पुरुष होता है जिसे सम्यक्त्व जगा हो, यथार्थ ज्ञान प्रकट हुआ हो, अपना आचरण आत्मा का अनुराग बना रहा हो उसे आत्मध्यान की सिद्धि होती है। तो परमशरणभूत आत्मा की सिद्धि के लिए हमारा कर्तव्य है कि हम सम्यक्त्व का और ज्ञान का उपाय बनायें और ऐसे ही ज्ञान में रत रहने का उद्यम किया करें।


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