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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 787

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पुण्यात्मनां गुणग्रामसीमासंसक्तमानसै:।

तीर्यते यमिभि: किं न कुविद्यारागसागर:।।

सत्संग में गुणानुराग के कारण कुविद्या का परिहार- जिसका चित्त पुण्य पुरुषों के गुण समूह में लग रहा है वह समझो सत्संगति कर रहा है। इस अज्ञानरूपी विषम समुद्र से क्या यह तिर न लेगा? अवश्य की तिरेगा। जिनका चित्त सज्जन पुरुषों के गुणगान में लग गया है उनकी अन्य पदार्थों से प्रीति हट ही जाती है। इस जीव को चाहिए एक परमविश्राम। तो सज्जन पुरुषों के संग में रहकर शांति मिलती है, उसका कारण यह है कि ज्ञान पर दृष्टि अधिक रहती है। ज्ञान की बात सुनने को मिलती है। तो जो बात अधिकाधिक मिले उसमें यह जीव रम जाता है। तो ज्ञान में रमण होने से परतत्त्वों के जो विषय प्रसंग हैं उनसे इसका चित्त हट जाता है, तो पुण्य पुरुषों के संग से ज्ञानप्रकाश का लाभ मिलता है। बारबार ऐसी भावना भावो कि मैं देह से भी न्यारा हूँ। देखिये आपका यह घरेलू मंत्र है। जानना सोचना यह कोई कठिन बात तो नहीं है। अंतर में ऐसा चिंतन करें कि मैं देह से भी न्यारा ज्ञानस्वरूप हूँ, इस ज्ञानस्वरूप की बारबार भावना बनाने से ये कषायें दूर होती हैं, और, जब कषायें दूर हुई तो पुण्यबंध भी बहुत होता है, धर्म का मार्ग भी मिलता है, उससे नियम से जीवन सुखमय व्यतीत होता है। जिसे आप ज्ञानस्वरूप कहते हैं वही तो आत्मा है। मैं ऐसा करता हूँ, मैं यह करूँगा, अगर कर्ता कोई न होता हो फिर यह वाक्य कैसे बोला जाय और फिर वाक्यों का अर्थ भी क्या रहा? जैसे हम अन्य पुरुषों के लिए कहते हैं वह आया तो वह कोर्इ चीज तो है जिसको देखकर आने की बात कह रहे हो। तो जो कुछ अपने आपमें मैं मैं के रूप में जान रहा है, जो मैं की बात अपने मन में करते हैं उसही का नाम तो आत्मा है। उस आत्मा की भावना बारबार की जाय वही मात्र एक शरण चीज है। जो अपने को ऐसा मानेगा कि मैं इतने लड़कों वाला हूँ, इतने वैभव वाला हूँ, ऐसे मकान महल वाला हूँ तो ऐसी भावनाएँ बनाने से वह विकल्प ही मचायेगा। कोर्इ भी जीव किसी दूसरे के कुछ करने से भला बुरा वही बनता स्वयं का प्रभाव है, स्वयं ही उपादान है। जैसा संग मिले जैसा उपादान हो वैसा ही अपने को आबाद अथवा बरबाद कर लेता है। जिन्हें बरबादी से बचना है उनका कर्तव्य है कि सज्जन पुरुषों के गुणगान में अधिक चित्त बसायें। क्योंकि जब सत् पुरुषों के गुणों में मन लग जाता है तब अन्य किसी पदार्थ में प्रीति नहीं रहती। जब बाह्यपदार्थों का विकल्प नहीं रहता तो आत्मा में शुद्ध अनुभव जगता है, यह कोई कठिन बात नहीं है। सब लोग कर सकते हैं। अभी सोच लो कि मैं इस देह से भी न्यारा ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा बारबार चिंतन करके अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभवना यह जब बनता है तो भव-भव के बाँधे हुए पापकर्म कट जाते हैं। तो अपना कर्तव्य है कि अपने को ज्ञानस्वरूप ही माना करें। और, जो यह समागम मिला, गृहस्थी मिली इसे एक झंझट समझें। सद्गृहस्थ वही है जो घर में रहता हुआ जल में भिन्न कमल की तरह रहे। जैसे कमल जल से ही तो पैदा हुआ और जल का संग छोड़ दे तो कमल सूख जायगा। तो जल में ही पैदा हुआ, जल के ही कारण वह हरा भरा है लेकिन जल को छूता नहीं है। जल से बहुत ऊँचे उठा रहता है। यदि वह जल छू ले तो कुछ ही समय बाद सड़ जायगा। तो जैसे पैदा होकर भी, जल में रहकर भी कमल जल से अलग है, निर्लेप है इसी तरह ज्ञानी गृहस्थ यद्यपि घर में पैदा हुआ है और घर में ही रह रहा है फिर भी वह अपने को सबसे न्यारा अनुभव करता है। ज्ञानी पुरुष के उपयोग में यह अंधकार नहीं है जो अपने ज्ञानस्वरूप को भूलकर और केवल इस मायामय विनश्वर देह में आपा मान बैठा। उसकी दृढ़ प्रतीति है कि मैं सबसे न्यारा केवल ज्ञानस्वरूप हूँ। तो अपने आपके सत्यस्वरूप की प्रतीति में महान बल है, बड़ा चमत्कार है। जो पुरुष ऐसे संत पुरुषों के गान में ही अपना चित्त रखते हैं उनके अज्ञान कभी नहीं ठहर सकता। जब अज्ञान में चित्त नहीं रहा, विषयों में चित्त रहा तो अपने आप ही आत्मा की प्रतीति हो जाती है। प्रयोजन यह है कि सत्संगति से रुचि करें और असत्संग से दूर रहें।


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