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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 80

From जैनकोष



प्रातस्तरुं परित्यज्य यथैते यांति पत्रिण:।

स्वकर्मवशगा: शश्वत्तथैते क्वापि देहिन:।।80।।

सत्वर विछोह― शाम के समय एक वृक्ष पर बस जाने वाले पक्षी रात्रिभर उस वृक्ष पर विश्राम करते हैं और प्रात:काल उस वृक्ष को छोड़कर अपने-अपने प्रयोजन से नाना दिशावों में चले जाते हैं इस ही प्रकार ये प्राणी अपने-अपने कर्मों के वश होकर जिस किसी भी गति में चले जाते हैं। यहाँ इस जगत् को यों अनित्य बताया जा रहा है कि यहाँ के ये पारिवारिक समागम, मित्रजनों का समागम ऐसा अनित्य है जैसे कि रात्रि भर विश्राम करने के लिये पक्षी एक जगह आते हैं, सवेरा होते ही चले जाते हैं ऐसे ही यहाँ कोई किस गति से आया है कोई किस गति से। सभी समागम से आये हुये लोग अपनी-अपनी आयु के अनुसार अपने-अपने कर्मों के अनुसार किसी भी गति में चले जाते हैं और भी देखिये अनित्यता की बात।


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