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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 803

From जैनकोष



जायते यत्समासाद्य न हि स्वप्नेऽपि दुर्मति:।

मुक्तिबीजं तदेकं स्यादुपदेशाक्षरं सताम्।।

संतों के उपदेशाक्षर में मुक्तिबीजरूपता- संत पुरुषों के उपदेश का अक्षर मुक्ति का बीज होता है। एक साधु को आचार्य ने सिखाया मां तुष मां रुष। इसका अर्थ है कि किसी पदार्थ में न तो द्वेष करो और न राग करो। वह साधु अधिक पढ़ा लिखा था नहीं। श्रद्धा बहुत विशेष थी तो उसके अक्षरों पर ही श्रद्धा करके उनको जपने लगा- मां तुष मां रुष। कुछ दिन बाद वह भूल गया तो जपने जगा मासतुष मासतुस। मासतुष का कुछ अर्थ होता है पर उसे कुछ भी इसका पता न था। मास शब्द में मूर्धनासकार है जिसका अर्थ होता है उड़द। और तुष का अर्थ होता है छिलका, और कोई उसका अर्थ नहीं होता, लेकिन उसकी श्रद्धा थी तो मासतुस मासतुस रटता रहा और वह समझता जाय कि गुरु ने जो मंत्र दिया है वह बराबर हम निभा रहे हैं। एक दिन वह साधु नगर में जा रहा था तो देखा कि एक महिला उड़द की दाल धो रही है। तो उसमें उड़द अलग और छिलका अलग हो जाता है, तो उस दृश्य को देखकर उसे आत्मबोध हो गया। ओह ! जैसे यह उड़द की दाल और छिलका अलग-अलग हो गए हैं और शुद्ध स्वच्छ रूप रख रहे हैं इसी तरह आत्मा की बात है। यह आत्मा कर्म रागद्वेष मोह अनेक छिलकों से घिरा हुआ है, वस्तुत: आत्मा एक न्यारी चीज है और ये सारे विकार न्यारी चीज हैं। ऐसी बारबार भावना बने तो यह आत्मा शुद्ध स्वच्छ हो जायेगा। इसी प्रकार आत्मज्ञान उस साधु के उसके गुरु के एक अक्षरमात्र से हुआ। तो सज्जन पुरुषों के उपदेश का असर भी मुक्ति का कारण बनता है। भेदविज्ञान हो, परपदार्थों से प्रीति हटे, आत्मा का बोध हो वही तो मुक्ति का मार्ग है।

कैवल्य की दृष्टि हुए बिना मुक्ति का अलाभ- मुक्ति का अर्थ है छुटकारा। कोई चीज किसी दूसरी चीज से बिल्कुल छूटी हुई हो, तब वे दोनों चीजें न्यारी-न्यारी हुई। एक ही चीज का सार, एक ही स्वरूप उससे कैसे छूटे? जैसे जल गर्म हो गया तो जल गर्मी से छूट सकता है अर्थात् ठंडा हो सकता है क्योंकि गर्मी जल का स्वरूप नहीं, वह गर्मी जल में अग्नि का निमित्त पाकर आयी हुई है, पर अग्नि की गर्मी भी छूट सकी क्या? अग्नि भी शीतल हो गयी क्या? अरे अग्नि का तो स्वभाव ही गर्मी है, अग्नि से गर्मी अलग कैसे हो सकती है, तो यदि हमें छुटकारा चाहिए है तो पहिले यह श्रद्धान तो आना चाहिए कि जिन जिनसे छुटकारा चाहते हैं उन उनसे न्यारा मेरा स्वरूप है। इसही का बोध न हो तो छुटकारा कभी मिल नहीं सकता। भेदविज्ञान की बात जब किसी क्षण किसी को हो तो थोड़े से अक्षरों का सहारा लेकर ही हो जाता है, तो संत पुरुषों के उपदेश का एक अक्षर मुक्ति का बीज हो जाता है।

श्रद्धासहित कतिपय अक्षरों की आराधना का प्रभाव- एक कथा विशेष प्रसिद्ध है कि एक सेठ वृक्ष के सीके पर चढ़ा हुआ णमोकार मंत्र की सिद्धि कर रहा था। उसकी सिद्धि का विधान इस तरह था कि नीचे तो हथियार खड़े थे तलवार, बर्छी आदिक और ऊपर 108 बार मंत्र के पढ़ने में जिस डोर पर बैठा था उसकी एक एक लर एक एक बार के मंत्र पढ़ने में कटती जायगी। वह पंडित था, ज्ञानी था, पर उसे यह डर लगे कि 108 बार मंत्र के पढ़ने पर यह डोर कट जायेगी, मैं उन हथियारों पर गिर जाऊँगा तो मेरा क्या हाल होगा? उसी समय वहाँ से एक अंजन नाम का चोर निकला, उसने वह दृश्य देखकर सेठ से पूछा कि तुम क्या कर रहे हो। वह सेठ बोला कि हम अपने मंत्र विद्या की सिद्धि कर रहे हैं, इस मंत्र की साधना का यह प्रभाव है कि इसकी सिद्ध हो जाने पर आकाशगामिनी विद्या सिद्ध हो जाती है, तो अंजन चोर बोला- महाराज यह मंत्र हमें भी बता दो, हम सीखेंगे और उसे सिद्ध करेंगे। उस सेठ ने वह मंत्र बता दिया- णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोएसव्वसाहुणं। उसे यह मंत्र थोड़ा-थोड़ा याद हो गया पर थोड़ी ही देर बाद में भूल गया, लेकिन इतना याद रह गया- आणं ताणं कछू न जाणं सेठ वचन परमाणं। तो चूँकि उसकी श्रद्धा थी, इस कारण श्रद्धा के बल पर उसे उस मंत्र की साधना हो गयी। तो श्रद्धापूर्वक संतपुरुषों के उपदेश पूर्वक संतपुरुषों का एक अक्षर भी सुना जाय और साधना में लाया जाय तो वह भी मुक्ति का कारण बन जाता है।

सिद्ध भगवंतों की उपासना की एक पूर्वपरंपरा- एक पाठ प्रसिद्ध है- लोग बोला करते हैं, ओनामासीधं और इसका मखोल लोग यों उड़ाते- ओना मासीधम, बाप मरे ना हम, पर यह मूल में बात सोचों कि ओनामासीधं शब्द कहाँ से निकला, कहाँ से चला और उसमें भाव क्या भरा? बहुत प्राचीन काल में कातेय व्याकरण का अध्ययन कराया जाता था, जिसे कहते हैं एक सस्ता व्याकरण स्पष्ट व्याकरण। यह व्याकरण जैन आचार्य ने बनाया है। और, यह बना कैसे कि एक राजा अपनी रानी के साथ तालाब में जलक्रीड़ा कर रहा था। जलक्रीड़ा अर्थ यह है कि एक दूसरे को छींटा मारे। जिसके उन छींटों के कारण विह्वलता हो जाय वह हार जाय। राजा की छींट कड़ी पड़ती थी तो रानी व्याकुल हो गयी और कहती है मोदकं देय राजन् ! जिसका अर्थ है, हे राजन् ! अब जल मत डालो, छींटे मत डालो। कहना तो उसका यह था, पर राजा ने उसका दूसरा अर्थ लगाया क्या कि रानी कहती है कि मुझे मोदक अर्थात् लड्डू लाकर दो। तो झट उसने नौकरों को बुलाकर उन्हें यह आज्ञा दी कि रानी के लिए जल्दी एक टोकनी में लड्डुवों का लड्डू ले आओ। जब नौकरों ने टोकना लाकर रख दिया तो रानी राजा को धिक्कारती है, कहती है कि देखो यद्यपि मोदकं देय के अर्थ तो दोनों हैं पर प्रकरण का भी तो कुछ अर्थ समझना था। उस समय हमने तो छींटे न मारने को कहा और तुमने लड्डू मंगवाकर रख दिये, क्या यह भी कोई प्रसंग की बात थी? तो जब रानी ने राजा को बहुत धिक्कारा तो वह राजा एक कातेय व्याकरण के रचयिता आचार्य महाराज के पास गया और कहा- महाराज मैं मूर्ख हूँ, जो अधिक से अधिक आसान पड़े वह संस्कृत विद्या मुझे दो। तो आचार्य महाराज ने अत्यंत सरलरूप में करके जो व्याकरण पढ़ाया उसी का नाम कातेय व्याकरण पढ़ गया। तो उस कातेय व्याकरण का प्रथम सूत्र है- ओम् नम: सिद्धं, और, जितने पुराने लोग होंगे वे जानते होंगे कि पहले पाटी पढ़ाई जाती थी। लड़के लोग जान जाते थे कि हमने चार पाँच पाटी पढ़ ली। एक एक छोटे सूत्राभ्यास का नाम एक पाटी था, पर वे सब सूत्रपाटी अब...क्लास के रूप में प्रयोग होने लगी। ओनामासीधं इस तरह सीखते थे, उसका शुद्ध उच्चारण है ओम् नम: सिद्धं। यह शुद्ध सूत्र है। तो सर्वप्रथम विद्यार्थी को विद्या सीखने पर मंगलाचरणरूप में यह कहा जाता था कि सिद्ध भगवान को नमस्कार हो। तो प्राचीनकाल में विद्या पढ़ाने का तरीका भी इस ढंग से था कि इस धर्म की ओर उपयोग बना रहे।

संतों की उपदेशशैली में अक्षरों की तत्त्वसूचकता- सत्पुरुषों का जो उपदेश है, जो शैली है उस समस्त शैली में उपदेश में प्रत्येक अक्षर धर्म और तत्त्व की सूचना देता है। तो सत्पुरुषों के उपदेश का एक भी अक्षर मुक्ति का कारण होता है और उस सदुपयोग की प्राप्ति कर लेने से स्वप्न में भी मनुष्य के कुबुद्धि उत्पन्न नहीं होती। दुर्बुद्धि दूर होती है और सुमति उत्पन्न होती है, किसी छोटे बच्चे को भी पढ़ाते हैं तो जो समझदार लोग हैं, समर्थ हैं, वे यह नहीं सोचते कि यह तो दूसरी कक्षा का विद्यार्थी है तो कोई प्राइमरी पास अध्यापक से पढ़ावो। वह ऊँचा मास्टर रखता है ताकि वह बड़े आसान तरीकों से सीखा देता है, साथ ही आचरण की भी शिक्षा देता है। केवल ज्ञानमात्र कर लेने से आत्मशांति प्राप्त नहीं होती। किंतु उस ज्ञान पर अमल करने से उसको प्रयोगरूप देने से शांति उत्पन्न होती है। ज्ञान ने तो एक रास्ता बता दिया। अब उस पर चले तो काम बनेगा। फर्क यहाँ यह है कि जो ज्ञान किया वैसा ही ज्ञान बराबर बना रहने का ही नाम चलना है। यहाँ कुछ और प्रवृत्तियाँ नहीं करना है। अध्यात्म में ज्ञान का ज्ञानरूप बना रहना ही चलता रहता है। जो व्यवहार प्रवृत्तियाँ हैं वे हैं तो अवश्य, पर वे विषयकषायों से उपयोग हटाने के लिए और इस ही ज्ञानरूप में अंतर्वृत्ति बनाने के उद्देश्य से है। ये सब बातें हमें सत्पुरुषों के उपदेश से प्राप्त होती है और इसी कारण सत्संग का बड़ा महत्त्व दिया है। ब्रह्मचर्य की पुष्टि, अहिंसा का आचरण जो जो कार्य हमारे भले के लिए हैं वे वे सब विचार और प्रवृत्तियाँ सत्संग में अनायास प्राप्त होती हैं, एक बड़ी प्रेरणा मिलती है।


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