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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 808

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अतुलसुखनिदानं ज्ञानविज्ञानबीजंविलयगतकलंकं शांतविश्वप्रचारम्।

गलितसकलशंकं विश्वरूपं विशालंभज विगतविकारं स्वात्मनात्मानमेव।।

अतुलानंदविधान अंतस्तत्त्व को भजने का आदेश- हे आत्मन् ! तू अपने आत्मा को आप ही स्वयं को भज। वस्तुत: सदैव आत्मा आत्मा को ही भजता है। चाहे मिथ्यादृष्टि हो, चाहे सम्यग्दृष्टि हो, कोई भी आत्मा किसी परपदार्थ को भज नहीं सकता, लेकिन मिथ्यात्व अवस्था में यह आत्मा आत्मा को देहादिक पदार्थोंरूप से जानता है और सम्यक्त्व अवस्था में आत्मा, अपने उस ज्ञानानंदस्वरूप को भजता है। तो यहाँ आत्मा को ही भजो, ऐसा कहने में यह बात बतायी है कि तू अपने आपको ज्ञानस्वरूप में भज। इसी के विवरण में अनेक विशेषतावों से बताया है। यह आत्मा अतुल सुख का निधान है, ऐसा आनंदस्वरूप है यह आत्मा, जिस आनंद की संसार की किसी भी स्थिति में तुलना नहीं की जा सकती। वैषयिक सुख भोगने में जितने भी प्रधान पुरुष और देव हुए हैं और भूतकाल में जितने हुए हैं, भविष्य में जितने होंगे उन सब सुखियों का सुख भी संचित कर लिया जाय तब भी उस सुख से तुलना नहीं हो सकती है आत्मा के आनंदस्वरूप की। यों अतुल आनंद का निधान है इस रूप में आत्मीय आनंद का परिचय करना हो कि वह किस प्रकार होता है तो उसका किसी अंश में अनुभवन करके ही जाना जा सकता है।

अनुभवन से अतुलानंद का विशद परिचय- एक शब्दों से जान लेना और एक अनुभव से जानना, इन दोनों में अंतर है। अनुभवपूर्वक जानना तो है प्रमाणभूत और यों ही जान ले यह है अप्रमाणभूत। जान लिया किंतु उसमें दृढ़ता नहीं है, चाहे उस ही अनुरूप हो। जैसे कभी चर्चा आती है ना किसी तीर्थक्षेत्र की जैसे शिखरजी पर नंदीश्वरद्वीप की रचना बड़ी सुहावनी है। इतने ऊँचें पर्वत बने हैं, इतनी ऊँची प्रतिमा है, इस इस ढंग से है, यों खूब बता दिया जाय, एक तो यह शब्दों द्वारा खूब ज्ञान कर लिया जाय और एक वहाँ जाकर आँखों से साक्षात् दर्शन कर लिया जाय, एक यह ज्ञान, तो इन दोनों ज्ञान में अंतर है या नहीं? विशदता और अविशदता का अंतर है। गोमट स्वामी की मूर्ति, बाहुबली की मूर्ति जो संसार में एक आश्चर्य मानी जाती है, और आज कोई बनाये तो शायद वैसी बनाई भी नहीं जा सकती है उसका आकार प्रकार ऊँचाई खूब भली प्रकार बता दी जाये, फिर भी जो सुनकर चित्र देखकर बाहुबली की मूर्ति का जो ज्ञान होता है और वहाँ जाकर कोई दर्शन करे तो उस समय के होने वाले ज्ञान में अंतर है। तो ऐसे ही सब चीजों का समझिये। जैसे किसी ने इमरती न खाया हो और उसे इमरती के स्वाद का ज्ञान कराया जाय, देखो जलेबी खाया है ना, उससे भी बढ़िया स्वाद है, यों किन्हीं भी शब्दों में सुन ले, और कोई पूछे तो उन शब्दों में बता भी सकता है, चाहे दूसरे लोग यह समझ ले कि इसने इमरती का बड़ा स्वाद लिया है, अच्छा बड़ा वर्णन कर रहा है, लेकिन अनुभवात्मक ज्ञान कुछ नहीं है कि क्या है। भैया ! सभी प्रसंगों की यही बात है। तो अनुभवात्मक ज्ञान में विशदता होती है और केवल शाब्दिक ज्ञान में विशदता नहीं होती। चित्र बनाना कोर्इ शब्दों से सिखा दे- यों पेन्सिल हाथ में ली जाती है, फिर धीरे से जिस ढंग का चित्र बनाना हो वहाँ वहाँ पेन्सिल ले जाई जाती है, यों कोई शब्दों से चित्र बनाने का ज्ञान करा दे और बाद में धर दे कागज पेन्सिल कि नौ अमुक चित्र बनाओ, तो क्या वह बना सकता है? अरे जब तक तीन चार कागज न बिगाड़े, खूब अभ्यास न किया जाय तब तक वह कला नहीं सीखी जा सकती है। यों ही समझिये कि आत्मीय आनंद कैसा होता है? इस बात को समझाने में समर्थ शब्द नहीं है। कुछ तो समझाते ही हैं, मगर यथार्थ अनुभव आ जाय कि लो यह है इस तरह की बात, शब्दों द्वारा समझ में नहीं आ सकती, तब आत्मीय आनंद का सत्य परिज्ञान करने के लिए स्वयं से पर का विकल्प तोड़कर अपने आपमें विश्राम से स्थित होने का अभ्यास करना होगा, और उस क्रिया में आनंद का पता चलेगा कि आत्मीय आनंद वास्तविक कैसा है? वह आनंद अतुल है, ऐसे इस अतुल आनंद का मैं निधान हूँ, इस रूप में अपने आपका सेवन कर। आत्मा को भज।

ज्ञानविज्ञानबीजरूप अंतस्तत्त्व को भजने का आदेश- यह आत्मा ज्ञान और विज्ञान का बीज है। जो ज्ञान अनेक पदार्थों की जानकारी कर रहे हैं उन ज्ञानों का नाम है विज्ञान और जो ज्ञान अध्यात्म में आत्मतत्त्व का ज्ञान कर रहा है वह कहलाता है ज्ञान। और विज्ञान है विविधज्ञान। तो ज्ञान के जितना विस्तार है और विज्ञान के जितने विस्तार है उन सबका बीज है कारण है आत्मा। अर्थात् वह समस्त ज्ञान और विज्ञान इस आत्मा से उत्पन्न होता है। अपने आपको इस रूप से अनुभवें कि मैं समस्त ज्ञान विज्ञान का एक स्वरूप बीज हूँ अथवा ज्ञान तो हुए सभी और विज्ञान हुआ भेदविज्ञान। जिसमें विशेष-विशेष ज्ञान किया जाय अर्थात् प्रत्येक पदार्थों की विशेषता को ज्ञान में रखकर जो बोध हो उसे कहते हैं विज्ञान। उस ज्ञान का और भेदविज्ञान का भी मैं बीज हूँ, इस प्रकार ज्ञानस्वरूप एक ज्ञानस्वभाव चैतन्यमात्र अपने आपको भज। यह शिक्षा दी जा रही है परम ब्रह्मचर्य की साधना के लिए। यह ब्रह्म अर्थात् आत्मा ब्रह्म में ही, आत्मस्वरूप में ही चर्या अर्थात् रमण करे, लीन हो जाय, मग्न हो जाय, निस्तरंगता हो जाय उसे कहते हैं ब्रह्मचर्य। मुक्ति और अनुभव से ही कुछ विचार कर लीजिए। हम ज्ञान कर रहे हैं। कोई संबंध ऐसा नहीं रहता कि जब यह जीव ज्ञान न करे। ज्ञान की छुट्टी कर दे ऐसा एक भी क्षण नहीं गुजरता। पर कोई परपदार्थों का ज्ञान कर रहे हैं, कोई आत्मतत्त्व का ज्ञान कर रहे हैं, कोर्इ किसी ढंग से कर रहे हैं, अब जरा उनमें यह अंतर तो देखो कि जब हम किन्हीं भी परपदार्थों का ज्ञान कर रहे हैं तो उसका ज्ञान करने में हमें स्थिरता मिलती है या नहीं? हम परपदार्थों का ज्ञान कर रहे हैं तो वे वे परपदार्थ तो स्थायी हैं ही नहीं, मिट जाने वाले हैं, वियोग हो जायेगा और परपदार्थ हैं अनेक तो इस ही पर के ज्ञान में ज्ञान एक पदार्थ को छोड़कर दूसरे पदार्थ का ज्ञान करने लगता है। तो यों परपदार्थों का ज्ञान बनाते रहने में यह आत्मा निर्विकल्प नहीं हो सकता। इसके तरंग उठते रहेंगे और फिर कभी किसी में राग किया, कभी किसी में द्वेष किया, कभी किसी में मोह किया यों विविधताएँ चलती रहेंगी।

ज्ञानविज्ञान बीज अंतस्तत्त्व के अनुभव की स्थिति का अवधिगम- अब जरा आत्मा के ज्ञान करने की स्थिति का परिज्ञान कीजिए कि वह कितना सुखद है, आत्मा का असाधारण लक्षण है ज्ञान और ज्ञान का लक्षण है ज्ञान। वैसे आत्मा के बारे में हम और और कुछ भी जानकारियाँ बना सकते हैं- यह आत्मा सूक्ष्म है, यह आत्मा रूपादिक से रहित है, यह आत्मा अनंत शक्तिमान है। इसके बारे में हम अनेकानेक जानकारियाँ और भी बना सकते हैं, वहाँ भी हम और और बातों की जानकारी बनायें वहाँ स्थिरता न मिलेगी। चाहे वह हम आत्मा के बारे में ही जानकारी बना रहे हैं, लेकिन जब हम अपने आत्मा को ज्ञानस्वरूपमात्र से जानने लग जायें। तो चूँकि जानने वाला भी ज्ञान है और जो जानने में आया वह भी ज्ञान है। यों ज्ञान और ज्ञेय दोनों एक हो जाने से फिर वहाँ तरंग नहीं रहती। निर्विकल्पता पाने का उपाय यह है कि यह ज्ञानस्वरूप अपने आपका अनुभव करे। तो हे आत्मन् ! यदि परमब्रह्म की उपासना करना है तो अपने आत्मा का, इस प्रकार अनुभव करें कि यह मैं ज्ञान और विज्ञान का बीज हूँ। जैसे बीज से अंकुर निकलता है और उन अंकुरों में भी बीज बनकर उनमें भी अंकुर निकलेंगे, एक बीज से अनेक बीजों की परंपरा चलती रहती है, इस ही प्रकार इस ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व में अनेक ज्ञानों का निवास है। यह ज्ञान से कभी खाली नहीं होता। आत्मा को स्वरूपदृष्टि से देखो और भगवान को सब दृष्टियों से देख लो। स्वरूपदृष्टि से भी देखो और व्यक्तपरिणमन की दृष्टि से भी देखो, वैसे तो भगवान अंतरंग में और बहिरंग में एक रस है। हमारी हालत यह है कि हमारा अंत:प्रभु की ही तरह है क्योंकि स्वरूप एक है, लेकिन बाह्य में उपाधिकृत भेद हो गया है। तो उपाधिकृत भेद पर हम निगाह ही न दें और केवल उस स्वरूपदृष्टि से स्वरूप को ही निहारें तो क्या किसी क्षण हम ऐसा कर नहीं सकते? आत्मा में हम आत्मा के परिणमनों को नजर में न लें, और केवल उसके स्वभाव को नजर में लें। ऐसा हम कभी कर तो सकते हैं, और इस ही प्रयोग के आधार पर आत्मतत्त्व का विकास होता है।

अंतस्तत्त्व की परम परिपूर्णता- जब हम अपने आपको स्वरूपदृष्टि से निहारते हैं तो उस समय कोई अधूरापन नजर नहीं आता। मैं आत्मा तो परिपूर्ण हूँ। क्या ऐसा है जैसे कोई घडा बनाये तो अभी आधा बना है और ठहर जावो, पूरा बन जाने दो, क्या इस प्रकार यह आत्मा है कि अभी आधी है अभी और आधी बनेगी। प्रत्येक पदार्थ परिपूर्ण सनातन सत् है। स्वरूपदृष्टि से अपने आपको निहारें कि मैं पूर्ण हूँ, और वह भगवान भी पूर्ण है। अच्छा अब और आगे चलिए- इस पूर्ण में से जो कुछ बात निकलती है, क्या वह उस काल में अधूरी है? वह भी उस काल में पूरी है। प्रतिसमय हमारा जो परिणमन बनता है वह परिणमन प्रतिसमय पूर्ण ही है। वह पूर्ण में से पूर्ण निकल जाता है, फिर भी रोता नहीं बनता, मैं पूर्ण का ही पूर्ण रहता हूँ। तो जैसे मैं परिपूर्ण हूँ ऐसे ही मैं एक बीजस्वरूप हूँ, चैतन्यमात्र अंतस्तत्त्व हूँ। ऐसा अपने आपका अनुभव करें। इस अनुभव में अर्थात् जब यह ज्ञान ज्ञानस्वरूप को जानने लगे तो वहाँ आत्मा आत्मा में निस्तरंग, निर्विकल्प निर्भय हो जाता है, यही है परमब्रह्मचर्य।

निष्कलंक अंतस्तत्त्व के अनुभवन का आदेश- भैया ! अपने आपको निष्कलंक अनुभव करें। जैसे जो जौहरी है, पारखी है, सर्राफ है वह किसी भी आभूषण को लेकर कसकर उसके शुद्ध स्वर्ण पर दृष्टि रखता है कि इसमें इतना स्वर्ण है, बाकी सब गैर तत्त्व हैं, क्योंकि उसे शुद्ध स्वर्ण का परिचय है और उसको शुद्ध स्वर्ण की रुचि है, इसी प्रकार जिस जिस तत्त्ववेदी को अपने आत्मा के शुद्ध स्वरूप का परिचय हुआ है और उसकी ही रुचि है तो वह इस सहजस्वरूप में अर्थात् जो कुछ भी भाव गुजरा, राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक गुजरे इन सबको वह यह मैं नहीं हूँ, ऐसा जानकर हटा देता है। देखो रुचि का प्रताप है। स्वर्ण में तो फिर भी इतना भेद है कि किट्ट कालिमा स्वर्ण से अलग है और तपाकर यह दिखाया जा सकता है कि लो यह तो निकली कालिमा और वहाँ तो स्वर्ण में और कालिमा में इतना प्रकट भेद है और देख सकते हैं कि लो यह कालिमा है और यह शुद्ध स्वर्ण है। वहाँ तो दो पदार्थ हैं, और यह मैं आत्मा अकेला हूँ, इसमें कोई भी दूसरा पदार्थ नहीं है। रागादिक पदार्थ इसे अलग हैं। हमारे आत्मा में उस काल में रत्नत्रयरूप है वह विकार तिस पर भी रुचि का ऐसा प्रताप है कि उन रागादिक विकारों को आत्मा माना ही नहीं है। इस प्रकार अपने आत्मा को निष्कलंक अनुभव करें।

शांत निष्प्रपंच विशाल अंतस्तत्त्व के अनुभवन का आदेश- अपने आपको ऐसा शांत अनुभव करें कि इसमें विश्व के सब प्रपंच शांत हो गए हैं; देखो थोड़ा जबरदस्ती भी अपने को सुखी बना सकते हैं। मानो कोई इष्ट गुजर या, उसके पीछे बड़े दु:खी हैं तो थोड़ी देर को अपने को उस इष्ट से अत्यंत भिन्न निरखने लगें, उसकी सत्ता उसमें है, मेरी सत्ता मेरे में है ऐसा अनुभव करने लगे लो सारे सुखों की झलक वहाँ आ जायगी। और, बड़ा प्रेम है, सब तरह का मौज है लेकिन अपने को दु:खी अनुभव करें तो दु:ख आ जायगा। जिस महापुरुष को मुक्त होने की इच्छा है अर्थात् बंधे हुए इन कर्मों से, शरीर से अपने को मुक्त होना चाहता है उसे आवश्यक है कि वह अपने मुक्त स्वरूप को निहारे। यदि अपने को महाप्रपंची, मायासक्त, परिवार वाला निरखा और मुक्ति के स्वप्ने देखे तो उसकी वह मिथ्या कल्पना है। हे आत्मन् ! यदि तुम परम ब्रह्मचर्य की उपासना करना चाहते हो अर्थात् ब्रह्मचर्य व्रत का आनंद लेना चाहते हो तो अपने को सर्व प्रपंचों से रहित केवल ज्ञान ज्योति मात्र अनुभव करें। अपने आपको निष्कलंक अनुभव करें। हे आत्मन् ! तू तो विविक्तरूप है, समस्त विश्व का ज्ञान तो तुम ही में होता है। उस ज्ञान की अपेक्षा तुम विश्वरूप हो, अत्यंत विशाल हो, तुम्हारा विराट रूप है। इस ही ज्ञान में समस्त लोकालोक का आकार समाया जा सकता है। प्रभु के ज्ञान में समस्त लोकालोक प्रकट प्रतिभासमान होता है, तब बतलावो वह ज्ञान कितना बड़ा है? क्या इस नगर से भी बड़ा है? क्या इन समुद्रों से भी बड़ा है, क्या इन तीनों लोकों से भी बड़ा है? अरे तीनों लोक और अलोक इन सबको मिला दो उससे भी विशाल यह ज्ञान है। ये जगत के प्राणी अपने आपको तुच्छ अनुभव करते चले जा रहे है, भले ही ये कुछ मौज मानते हों घर में रहकर, भले ही इन नाना इष्ट समागमों में मौज मानते हों लेकिन वे अपने को तुच्छ ही मानते हैं। अरे उस तुच्छता के अनुभव को छोड़ो, यह मेरा है, यह पराया है; इस प्रकार के विकल्पों को छोड़ो, ये तुच्छ बातें है। हे आत्मन् ! इस ममता के कारण तेरी प्रगति रुकी हुई है। अपने को विशाल अनुभव करो; और मुझमें अब विकार नहीं रहे हैं, दूर हो गए हैं, विगत हो चुके हैं, इस प्रकार अपने को निर्विकार अनुभव करो।

धारणापूर्वक ध्यान के कर्तव्य से लाभ लेने का अनुरोध- ध्यान करने के लिए धारणा हुआ करती है। जरा अपने आपको इस तैयारी के साथ बनायें, सब ओर से विकल्प हटावें। यहाँ प्रकृत में जो तत्त्व कह रहे हैं उस पर ही ध्यान जमावें। यह मैं एक मेरूपर्वत जैसे विशाल पर्वत के ऊपर बैठा हूँ, यों समझिये कि यहाँ बड़े भारी समुद्र हैं उन समुद्रों के बीच एक जंबूद्वीप है और उस द्वीप में लाखों योजन की ऊँचाई पर, प्रभु विराजमान हूँ, और वही मैं भी बैठा हूँ, अपने आपमें प्रभुस्वरूप को प्रभु को पूरी शकल में जैसी कि शांतमुद्रा में प्रभु की मूर्ति के दर्शन करते हैं, लो यह मैं भी उस मूर्ति के ही समान निश्चल दशा में विराजमान हूँ, एक अपने आपके प्रभुस्वरूप को देख रहा हूँ, उस समय यों अनुभव करें कि मैं तो प्रभु के ही समान ज्ञानानंदस्वरूप हूँ, निर्विकार हूँ, यों अपने आपकी निर्विकारता का अनुभव करने लगें। यही एक परम ध्यान है। इस परम ध्यान के बीच-बीच में शुक्लध्यान की अग्नि प्रज्ज्वलित होती है। लो इस शुक्लध्यान की अग्नि ने इन अष्ट कर्मों का विध्वंस किया, मात्र शरीर रह गया, सारे विकार भस्म हो गये। लो ये सारे कर्म धूलवत उड़ गए। यों जरा ध्यान तो बनाओ। वहाँ आप अपने आपको निर्विकार अनुभव करने लगोगे, यों अनेक आत्मसाधना के उपायों से अपने आत्माराम के सम्मुख होकर अपने आपको शुद्ध ज्ञानानंद मात्र अनुभव करें, इससे ही इस परम ब्रह्मचर्य की प्राप्ति होगी।


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