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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 811

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चंचद्भिश्चिरमप्यनंगपरशुप्रख्यैर्वधूलोचनै-र्येषामिष्टफलप्रद: कृतधियां नाच्छेदि शीलद्रुम:।

धन्यास्ते शमयंतु संततमिलद्दुर्वारकामानल-ज्वालाजालकरालमानसमिदं विश्वं विवेकांबुभि:।।

अखंड शीलवंत संतों को धन्यवाद- जिन मनुष्यों का शीलरूपी वृक्ष कामकुठार से नहीं छेदा गया वह महाभाग धन्य है। शील तो स्वभाव का है, परम निश्चय से देखा जाय तो आत्मा का शील है आत्मा का चैतन्यभाव। चिन्मात्र सच्चिदानंदस्वरूप। वही है शील और उस शील की रक्षा करने के लिए व्रत परिणाम करना, संयम से रहना ये सब साधन हैं और उन सब साधनों में सर्वोच्च साधन है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य महाव्रत के धारण से जिनका शीलरूपी वृक्ष इन चंचल और चमकते हुए काम कुठारवत् स्त्रीनेत्रों से नहीं छेदा गया वे महाभाग धन्य हैं। प्रकरण साधुवों को समझाने का है। यों तो शीलव्रत को जो मनुष्य जो महिला पालें वे धन्य हैं। शीलपालन से एक ऐसी चित्त में स्थिरता आती है कि यह शील इष्ट फल को देने वाला है। इष्ट क्या है जीव को? शांति। शांति में साधक है यह ब्रह्मचर्य। एक अद्भुत विशेष साधकतम है। जो पुरुष कामी होते हैं, चित्त में विकारभाव रखते हैं अथवा उस विकार पोषण का यत्न करते हैं ऐसे पुरुषों का चित्त अस्थिर रहता है, और अस्थिर चित्त में आत्मा के शुद्ध परिणाम की वृत्ति नहीं जगती है। ऐसे मुनिराज, ऐसे योगिराज निरंतर मिलने वाली तो काम अग्नि की ज्वाला, उसके समूहों से जो जल रहा जगत इसको वे विवेकरूपी घड़े से शीतलता प्रदान करें। जिस मनुष्य के पास बैठो तो बहुत काल तक संगति करने से उसका कोई से कोई गुण अपने में आ जाता है अर्थात् उसकी तरह अपनी भी आदत बन जाती है। परम ब्रह्मचर्य के पालन करने के लिए एक तो ब्रह्मचर्य की जो मूर्तियां हैं ऐसे साधु संतजनों के समागम में रहें और अपना उपयोग किसी न किसी कार्य में लगाये रहें। जैसे गृहस्थजन हैं तो धन कमाने के समय धन कमाया, उपकार के समय उपकार करें और धर्म के समय धर्म करें, और, और भी जान जानकर कोई उत्साह समारोह और अनेक प्रकार के उद्यम बनायें रहें। उपयोग लगा रहेगा तो ये काम विकार उसे न सता सकेंगे, और फिर दसलक्षण धर्मों में अंतिम धर्म बताया है ब्रह्मचर्य। और, सभी धर्मों की एक एक जाप होती है, तो ब्रह्मचर्य की जाप है- ॐ परमब्रह्मचर्ये उत्तमधर्म धर्मांगाय नम:। इस मंत्र का भी जाप रखें। जिस किसी भी प्रकार हो चित्त में ऐसी रुचि जगे कि मेरे निष्कामता अधिकाधिक प्रकट हो। उसही प्रसंग में ब्रह्मचर्य व्रत के प्रकरण को पूर्ण करते हुए आचार्यदेव कह रहे हैं कि ऐसे योगिराज उनका सत्संग, उनके वचन, उनके विवेकरूपी घड़े से मुझे शीतलता प्राप्त हो।

दु:खों का आधार इंद्रियविषयरुचि- मनुष्य को और दु:ख क्या है, सिवाय पंचेंद्रिय के विषय और छठा मन। इन 6 विषयों से ये सारा जगत पीड़ित है, किसी को भी निरख लो, स्पर्शनइंद्रिय का विषय तो है कामविकार। वैसे और भी विषय हैं- ठंडी, गर्म, कोमल, कड़ी आदि चीजें सुहाना ये भी सब विषय हैं। और, विषय तो परिस्थितिवश होते हैं पर कामविकार संबंधी विषय तो व्यर्थ ही मन में विचार हुआ, जिसकी न जड़, न शाखा, न पत्र, न फूल, न फल, केवल एक भाव जगा और व्यथित हो जाते हैं। रसनाइंद्रिय का विषय है स्वादिष्ट चीज का रस लेना। मनुष्य को ऐसी तृष्णा लग गयी है कि उसे यह मालूम पड़ जाय कि अमुक चीज में ज्यादा खर्च होता है तो उसका उसे ज्यादा स्वाद आता है। वहाँ कोई बहुत ईमानदारी से सोचे तो साधारण सात्विक जो भोजन है सूखी रोटी उसके स्वाद को हलुवा पूड़ी ये नहीं पा सकते। कुछ थोड़ा शांत होकर देखो तो। इसका एक मुख्य प्रकरण तो यह है कि पेट भर जाने पर अभी रोटी साग थोड़ा खा जाया जा सकता है पर हलुवा पूड़ी तो पेट भर जाने पर तनिक भी नहीं चलता। अनुभव करके सोचो तो जिसमें अधिक पैसा लग गया है उसमें यह अधिक स्वाद मानता है। तो इस स्वाद में आसक्त होना यही है रसनाइंद्रिय का विषय। घ्राण इंद्रिय के विषय हैं- इत्र, तेल, फुलेल, सुगंधित पुष्प, और और भी सुगंधित चीजें। इन विषयों के भोगने के लिए यह जीव अनेक प्रकार के साधन जुटाता है। नेत्रइंद्रिय का विषय है रूपवान पदार्थ को निरखना। यह भी कितना उजड्ड विषय है। पदार्थ दूर है और नेत्र इंद्रिय से देखकर अपने विषय का पोषण करता है। सिनेमा वगैरह में क्या है? एक पर्दा लगा है, उस पर जो चित्रों की छाया पड़ती है उसी को निरखकर लोग खुश होते हैं? अनेक पुरुष तो ऐसे हैं कि जो अपनी क्षुधा को नहीं मिटा सकते, पर सिनेमा देखे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ती। सिनेमा हाल में देखो तो जितनी संख्या रिक्शा चलाने वालों की या मजदूरों की मिलेगी उतनी संख्या रईस लोगों की न मिलेगी। तो जो व्यर्थ व्यय कर रहे हैं यह उनकी उद्दंडता ही तो है। श्रोत्रइंद्रिय का विषय है राग रागिनी की बातें सुनना। जिसमें चित्त में राग उत्पन्न हो, मोह उत्पन्न हो ऐसे वचनों का श्रवण करना सो कर्णइंद्रिय का विषय है।

मनोविषय की दु:खरूपता व विषयविजेताओं को धन्यवाद- मन का विषय तो इन सब विषयों से भी अधिक उद्दंड व खोटा है। इस मन की प्रेरणा इन पंचेंद्रियों से मिलती है तो और उत्तरोत्तर जागृति होती जाती है। मन का विषय क्या है? इज्जत चाहना, यश चाहना, नाम चाहना, यह सब मन का विषय है। इस मन के विषय ने भी इन जगत के जीवों को पीड़ित कर रखा है। ये साल दो साल के बच्चों का भी मन देखो कितना विकट है? गोद से अगर माँ नीचे उतार दे तो वह भी उसमें अपना अपमान महसूस कर रोने लगता है। तो मन के विषय से ये बच्चे, जवान, बूढ़े सभी सताये गए हैं। यों छहों विषयों के अधीन होकर यह सारा जगत दु:खी है। यह विषयों का भार न रहे तो यह इसी समय प्रभुता को पाया हुआ है। प्रभुता नाम किसका है? विकारभाव न जगे इसी का नाम प्रभुता है। पूर्णरूप से स्वच्छ हो जाय वही परमात्मतत्त्व है। न इन विषयों के अधीन रहे, न इन रागादिक भावों के अधीन रहे, केवल शुद्ध ज्ञानमात्र अपने आपका परिणमन करे तो वही उसकी स्वाधीनता है। इन विषयों को जिसने जीता है और एक ज्ञानमात्र स्वात्माराम में मग्न रहा करते हैं वे योगीश्वर इस संतप्त हुए जगत को विवेकरूपी घड़े से शीतलता प्रदान करें अर्थात् उन योगिराजों के वचनों से विवेक उत्पन्न हो और इन संसार के संतापों को दूर करें।


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