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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 82

From जैनकोष



यस्य राज्याभिषेकश्री: प्रत्यषेत्र विलोक्यते।

तस्मिन्नहनि तस्यैव चिताधूमश्च दृश्यते।।82।।

एक ही पुरुष का एक ही दिन में राज्याभिषेक व चिताधूम― प्रभात के समय जिसके राज्याभिषेक देखा जाता है उसी दिन उस राजा की चिता का धुवाँ देखने में आ जाता है। कितनी ही बारातों में तो सुना गया ऐसा कि बारात चल रही है, विवाह हो चुका या होने को है उसी बीच दूल्हे का किसी कारण से मरण हो गया, ऐसी बात कई जगह सुनी भी होगी। लो पहिले तो इतनी खुशी थी, बाजे बज रहे, गीत गाये जा रहे, सब खुश हो रहे लेकिन अचानक ही हार्ट फेल हो जाये पति या पत्नी कोई गुजर जाये तो लो सारा वातावरण दु:खरूप में परिणत हो जाता है। हम आप आज तक जिंदा बने हुये हैं, किसी की 40 वर्ष की उमर है, किसी की 50 वर्ष की उमर है, क्या हम आपकी यह हालत नहीं हो सकती है कि 20 वर्ष की ही उमर में गुजर गये होते या उससे भी पहिले गुजर गये होते? गुजर गये होते तो हम आपका यहाँ क्या था? कहाँ पैदा हुये होते, क्या बने होते? अब तक जीवित हैं लेकिन अब तक भी मोह और राग करने में कसर नहीं रखते। कुछ तो विवेक करना होगा अन्यथा इस अंधाधुंध दौड़ में बहुत विपत्ति सहनी पड़ेगी।

दुर्लभवर नरदेह के सदुपयोग में विवेक― यह मनुष्य देह बड़ी दुर्लभता से मिला है। संसार में कितनी कुयोनियाँ हैं, एकेंद्रिय, दो इंद्रिय आदिक कैसे-कैसे तुच्छ भव हैं, उन भवों से निकल-निकलकर और इस आत्मा के ज्ञान का आवरण करने वाले कर्मों से कुछ छूट-छूटकर आज पंचेंद्रिय और मनुष्य हैं। पशु, पक्षियों से हम आप लोगों में कितनी श्रेष्ठता है? जहाँ इतना उत्कृष्ट मन होता है कि श्रुतकेवली इस मनुष्यभव से ही होते हैं। जितना केवली का ज्ञान है श्रुतकेवली का भी उतना ही ज्ञान कहा है। अंतर यह है कि केवली भगवान् प्रत्यक्ष रूप से जानते हैं और श्रुतकेवली परोक्षरूप से जानते हैं। ऐसा महान् मन वाला भव है यह मनुष्य का। मनुष्यभव पाया, उत्तम देश, उत्तम जाति, उत्तम कुल, बुद्धि उत्तम, धर्मश्रवण की योग्यता, समझने की योग्यता इतना सब कुछ दुर्लभ समागम पाकर भी इस यथार्थ धर्म के धारण की तीव्र उत्सुकता न जगे तो इससे अधिक और खेद की बात क्या बतायी जा सकती है? सदुपयोग करो, जो दुर्लभ चीज मिली है उसका ऐसा उपयोग करो जिससे उत्कृष्ट मार्ग शांतिपथ प्राप्त हो जाये।

सुखों की क्षोभमयता― भैया ! यहाँ के सुखों में क्या छटनी करना कि मुझे ऐसा सुख मिले। सभी सुख क्लेशरूप हैं, क्षोभरूप हैं। जैसे साँप का नाम बदल देने से कहीं विष में बदल तो न हो जावेगी। चाहे साँपनाथ नाम रख लो, चाहे नागनाथ नाम रख लो। नाम तो नागनाथ बड़ा अच्छा है, पर ऐसा बढ़िया नाम रख लेने से उसके विष में अंतर तो न आ जायेगा। ऐसे ही ये सुख हैं। कल्पनावश इनका कुछ नाम रख लीजिए। धनी होना, वैभव का सुख, स्त्री का सुख, यश का सुख कुछ भी नाम रख लीजिये, कैसी ही कल्पनाएँ कर लीजिये उससे इस सुख के भोगने में जो क्षोभ कारण है, क्षोभ परिणमना है और क्षोभफल है उसमें अंतर नहीं आ जाता। कैसा ही सुख भोगो उसका पहिले क्षोभ होता है। भोगने के काल में क्षोभ होता है, भोग भोगने के बाद में क्षोभ होता है। इस सुख में रति करना योग्य नहीं है।

अचानक मरण के निर्णय से धर्मपालन का उत्साह― किसी ने अपने बारे में किसी दिन की मृत्यु का निर्णय किया है क्या कि अमुक दिन मरेंगे? अरे मृत्यु तो जब भी होगी अचानक होगी। तो उस अचानक की बात कुछ नियत है क्या? अचानक तो अचानक ही कहलाती है। नीतिकार भी कहते हैं कि देखा भाई ! यदि तू धन की कमाई चाहता है तो अपने को ऐसा सोच कि हम तो अजर अमर हैं, बहुत काल तक जिंदा रहेंगे और समर्थ रहेंगे। यदि ऐसा सोच बैठा कि हम तो शायद कल सुबह भी न रहें, मृत्यु हो जाय तो धन कैसे कमायेगा? जिसे धन कमाना हो वह अपने को अमर माने। इसी प्रकार जिसे विद्या सीखनी हो तो वह भी अपने को चिरंजीव माने। लो अभी कोई गणित का या किसी विषय का हम अभ्यास करने को हैं और उसी समय ख्याल आ जाये कि हमारी मृत्यु तो घंटा भर बाद भी हो सकती है तो वह इस विद्या को कैसे पढ़ेगा? विद्या का अर्जन करने के लिये और धन का अर्जन करने के लिये अपने को चिरंजीव मानना होगा तब वह यत्न होगा। चाहे कभी गुजर जायें, वह बात अलग है लेकिन धर्मपालन वही पुरुष कर सकेगा जिसके चित्त में यह समाया हो कि मृत्यु ने तो मेरा केश ही पकड़ रक्खा है, किसी भी मिनट यह मृत्यु मेरे केशों को झटक सकती है अर्थात् मृत्यु हो सकती है, ऐसा जिसका निर्णय हो वह पुरुष धर्म का पालन कर सकता है।

परपदार्थों की विनश्वरता के निर्णय से धर्म की ओर झुकाव― पर की बात भी ऐसी ही देखिए। ये बाह्य समागम अनित्य हैं, किसी भी क्षण किसी भी ढंग से विघट सकते हैं, ऐसी श्रद्धा हो परवस्तुवों में तो वह तो उनसे उपेक्षा करके धर्मपालन में लग सकता है। अनेक घटनाएँ ऐसी देखी जाती हैं― प्रभात समय में तो खुशी मान रहे हैं और उस ही दिन वही पुरुष थोड़ी देर बाद अत्यंत दु:ख में ग्रस्त हो जाते हैं, यह संसार की बहुत बड़ी विचित्रता है।


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