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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 821

From जैनकोष



संवृतस्य सुवृत्तस्य जिताक्षस्यापि योगिन:।

व्यामुह्यति मन: क्षिप्रं धनाशाव्यालविप्लुतम्।।

धनाशा में बड़े पुरुषों का भी पतन- जो मुनि संवर सहित है, उत्तम चरित्र सहित जितेंद्रिय है उसका भी मन धनाशारूपी सर्प से पीड़ित हो तो तत्काल वह मोह को प्राप्त होता है। किसी अच्छी स्थिति के बाद जब कोई खराबी आने लगती है तो वह समग्र खराबी तुरंत नहीं आती, उसका प्रारंभ पहिले कुछ छोटे कार्यों से होता है और फिर उस अतिचार के बाद उस छोटे दोष के बाद बराबर वे दोष हों और उनसे फिर ग्लानि न रहे तो वे फिर अनाचार के रूप रख लेते हैं। जैसे जो लोग बड़े चोर और डकैत बन जाते हैं वे एकदम किसी ही दिन बन गए हों ऐसा नहीं हैं, किंतु पहिले कुछ छोटी चीजों की चोरी करने का शौक लगा, जैसे मान लीजिए किसी की चाकू चुरा लिया। फिर इससे बढ़कर धीरे-धीरे वह बड़ी चोरियाँ करने लगता हैं। यों ही संग त्यागकर, परिग्रह त्यागकर जो निर्ग्रंथ हुए हैं, जो तपश्चरण करते हैं फिर भी कदाचित् कभी किसी प्रकार की आशारूपी सर्प से पीड़ित हो जाय तो वह धीरे-धीरे बढ़कर मोह की अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इस कारण प्रारंभ से ही अपने आपको सावधान बनाये रखना चाहिए। गृहस्थावस्था में परिग्रह को प्रमाण बताया गया है, उस प्रमाण से गृहस्थ की एक सीमा बन जाती है। वह उससे अधिक अपने में कोई परिणाम नहीं लाता है तो वह संतुष्ट रहता है, उसके एक देश अणुव्रत है और जो साधु संत हैं वे परिग्रह के पूर्णतया त्यागी होते हैं, उनके परिग्रह त्याग नाम का महाव्रत होता है। तो जो परिग्रह के त्यागी हैं वे ही ध्यान के पात्र है और आत्मतत्त्व का निरंतर ध्यान बने तो यह ध्यान अवस्था आत्मा के लिए शरण है। ध्यान से ही मुक्ति की प्राप्ति होती है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए अर्थात् संसार के समस्त संकटों से छूटने के लिए अपना कर्तव्य है कि इन पंच पापों का त्याग करें और आत्मध्यान का और अधिकाधिक यत्न करें।


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