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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 823

From जैनकोष



नाणवोऽपि गुणा लोके दोषा शैलेंद्रसंनिभा:।

भवंत्यत्र न संदेह: संगमासाद्य देहिनाम्।।

परिग्रह संसर्ग में दोषों का जमाव- इस लोक में परिग्रह होने के कारण गुण तो अणुमात्र भी नहीं होता और दोष सुमेरु पर्वत सरीखे बड़े-बड़े हो जाते हैं। इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। परिग्रह नाम मूर्छा का है, किसी अन्य वस्तु में यह मेरा है ऐसी जो परपदार्थ में मूर्छा जगती है वह परिग्रह है और ऐसी मूर्छा के समय में आत्मा में गुणों का विकास नहीं होता और वहाँ अवगुण अर्थात् विकारभाव बढ़ जाते हैं। गृहस्थ भी जब सामायिक करता है तो उस समय वह निष्परिग्रहता का अनुभवन करना चाहता है और वही सामायिक है। गृहस्थ को भी सामायिक के समय में विचार से मुनि कहा जा सकता है, भले ही भेष कुछ हो, लेकिन उपयोग जब अपने आपमें नि:संग अनुभव करता रहता है मैं सबसे न्यारा केवल ज्ञानमात्र हूँ, जब ऐसा अपने आपको नि:संग अनुभव करते हैं उस समय वह उपचार से महाव्रती है अर्थात् परिणाम उसके बहुत उत्कृष्ट है। महाव्रती बन नहीं गया किंतु उसके उपशम कषाय है उस समय ऐसी पवित्रता बन जाती है कि गृहस्थ निसंगता का अनुभव करता है। बाह्यपरिग्रह कभी न भी हों किंतु उनके विकल्प भी उठें उनकी आकांक्षा जगे तो उस समय भी अवगुण और क्लेश अनेक आ जाते हैं। कभी ऐसा स्वप्न आये कि बहुत सा वैभव प्राप्त हो गया या राज्य मिल गया, जैसे कि एक कथानक है कि किसी घसियारे को दोपहर के समय एक पेड़ के नीचे नींद आ गयी, उसके साथ अनेक घसियारे थे। उस घसियारे ने स्वप्न में क्या देखा कि मुझे राज्यपद मिल गया, अनेक राजा सिर नवा रहे हैं, हमारी आज्ञा में भी हैं, और और भी अनेक आराम के साधन हैं, जिस समय ऐसा स्वप्न आया उस समय वह सुख मालूम कर रहा था, इतने में एक घसियारे ने उसे जगा दिया तो उसने देखा कि यहाँ तो कुछ भी नहीं है। लो वह उस घसियारे से लड़ने लगा- अरे तू मुझे जगा न देता तो मैं बड़ा सुख भोगता रहता। यद्यपि वहाँ था कुछ नहीं, पर सुख तो केवल मन की कल्पना से ही भाग जाता है। जब होता भी कुछ तो वहाँ भी कल्पना का ही सुख है और स्वप्न में भी जो दिखा है वह भी कल्पना का ही सुख है। स्वप्न में भी राज्य वैभव आदिक किसी भी परिग्रह का संबंध बने तो वहाँ भी यह जीव विकारों का ही अनुभव करता है, अवगुण का ही अनुभव करता है।

आत्मानुभूति के लिये नि:संगता की साधनता- यहाँ परिग्रह की आलोचना चल रही है, यह इसलिए है कि हे आत्मन् ! यदि तुम आत्मानुभव चाहते हो तो अपने आपको नि:संग अनुभव करो और बाह्य परिग्रह त्यागकर अपने आपको नि:संग अनुभव करो। वह तो उत्तम है ही। वह तो साधु संतों का कर्तव्य है किंतु इतना न करते बने तो प्रतीति में और किसी किसी समय में सामायिक आदिक के काल में अपने को नि:संग अनुभव करना चाहिए। मेरा कहीं कुछ नहीं है। यह मैं ज्ञानमात्र हूँ। जितना हूँ उतना ही तो मैं करने वाला हूँ और जितना जान रहा हूँ उतना ही भोगने वाला हूँ और जो कुछ ये सामायिक हैं ये ही मेरे वैभव और धन हैं, इनके अतिरिक्त बाहर में मेरा कहीं कुछ नहीं है। यों अपने आपको ज्ञानमात्र और नि:संग अनुभव करना चाहिए। यह ज्ञान बना ऐसा अनुभव कभी कभी बनता रहे तो मनुष्य जीवन सफल है और रात दिन केवल मोहरूप ही अपने को अनुभवा जाय, मैं ऐसे परिवार वाला हूँ, ऐसी पोजीशन वाला हूँ, इतने बच्चों वाला हूँ इन सब रूप अपने को निरंतर अनुभवा जाय तो उससे जीवन में क्या सिद्धि होती है? समय निकल जायेगा, फिर मरण हो, जन्म हो, यह परंपरा रहेगी, इससे रात दिन में किसी समय एक मिनट भी यदि अपने को नि:संग अनुभव कर लिया जाय तो वह इतना पुण्य कमा लेता है कि जिस उदय में आगे एक वातावरण अच्छा पायेगा और जिसमें धार्मिक संग बना रहे, ऐसी समृद्धि पायेगा।


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