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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 834

From जैनकोष



अणुमात्रादपि ग्रंथांमोहग्रंथिर्दृढीभवेत्।

विसर्पति ततस्तृष्णा यस्यां विश्वं न शांतये।।

अणुमात्र भी ग्रंथ से तृष्णा का विशाल विसर्पण- एक अणुमात्र भी परिग्रह हो तो वह मोह की गाँठ को ओर दृढ़ कर देता है। थोड़ा सा परिग्रह होकर भी तृष्णा ऐसी बढ़ती है कि तीनों लोकों का राज्य भी प्राप्त हो जाय तो भी शांति नहीं हो पाती, इस आत्मा का पूरा नहीं पड़ पाता। बहुत-बहुत साधनाएँ भी कर ले, धर्मपालन करके बहुत बड़ी योग्यता भी बना ले लेकिन अणुमात्र परिग्रह का संपर्क भी बन गया तो यह मोहकर्म की गाँठ को और तेज लगा देता है, इससे इस परिग्रह से दूर रहने में ही श्रेय है। एक छोटी सी कहानी अख़बार में छपी हुई थी कि किसी पुरुष और स्त्री में बड़ा झगड़ा हो रहा था। पुरुष तो कहता था कि हम बच्चे को इंजीनियर बनायेंगे और स्त्री कहती थी कि हम बच्चे को डाक्टर बनायेंगे। दोनों में बड़ा तेज विवाद हो गया, बहुत बड़ी कलह हो गयी। तो एक आदमी पूछता है कि भाई किस बात पर इतनी तेज लड़ाई कर रहे हो? पुरुष बोला कि झगड़ा इस बात पर है कि हम तो चाहते हैं कि हम बच्चे को इंजीनियर बनावेंगे और यह स्त्री इस बात पर हठ करती है कि हम अपने बच्चे को डाक्टर बनावेंगी। तो वह पुरुष बोला कि हमें भी वह बच्चा दिखावो कौन है, उसको देखकर हम भी कुछ अपनी सलाह देंगे। तो पुरुष बोला कि अभी तो उस बच्चे के निकलने में 4 माह की देर है याने बच्चा अभी गर्भ में है, जिसके पीछे यह लड़ाई चल रही है। अरे भाई अभी तो यही नहीं पता कि वह बच्चा होगा या बच्ची होगी, पर व्यर्थ का विवाद खड़ा हो गया। तो अणुमात्र भी परिग्रह हो तो इस मोह की गाँठ को और दृढ़ कर देता है। एक स्त्री पुरुष एक चारपाई पर पड़े हुए गप्पें छाँट रहे थे। स्त्री बोली कि अगर एक बच्चा हो गया तो वह कहाँ लेटेगा? पुरुष थोड़ा सा खिसककर कहता है कि यहाँ लेटेगा।...और अगर दूसरा हो गया तो?...तो कुछ और उचक गया और चारपाई से नीचे जमीन में गिर गया। उसका एक पैर भी टूट गया।...और अगर तीसरा हो गया तो?...अरे अभी बच्चा नहीं है, सिर्फ कल्पना भर किया तब तो एक पैर टूट गया और बच्चे हो जायेंगे तो न जाने क्या हाल होगा? तो यह कल्पना भी बुद्धि को दुषित कर देती है। जितने भी लोग आज बड़े जाल में फँसे हैं वे थोड़ी थोड़ी इच्छावों से प्रारंभ करके बड़ी बड़ी इच्छायें बना डालते हैं और फिर वे एक महान जाल में फंस जाते हैं। तो समझिये कि रंचमात्र के भी परिग्रह का संबंध जुड़े तो मोह की ग्रंथि और दृढ़ हो जाती है।


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