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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 845

From जैनकोष



सुतस्वजनभुपालदुष्टचौरारिविड्वरात्।

बंधुमित्रकलत्रेभ्यो धनिभि: शंकयते भृशं।।

धनियों के सर्वत्र शंका का संताप- जिसके परिग्रह लगा हुआ है, धन वैभव अधिक है उसमें मूर्छा भी है ऐसा पुरुष पुत्रादिक सभी प्रकार के लोगों से शंकित रहा करता है। धनिकों को अपने पुत्रों से भी शंका रहती है। कदाचित् यह तृष्णावश बहुत सा वैभव जोड़ ले या कब्जे में कर ले तो फिर न उतना बड़प्पन रहेगा और न जीवन सुख से व्यतीत होगा, ऐसा जो संदेह रहता है, पुत्र से शंकित रहता है वह धन वैभव के कारण ही तो रहता है। यहाँ परिग्रह का प्रभाव बतला रहे हैं कि परिग्रह से कितने अनर्थ होते हैं। कोई पुरुष यदि अपने आपके विशुद्ध आत्मस्वरूप का निर्णय कर ले कि मैं तो इस देह से भी न्यारा केवल ज्ञानमात्र हूँ तो उसे किसी भी परिस्थिति में विघ्न नहीं आ सकता। जो लोग विकृत रहा करते हैं वह सब उनके अज्ञान का फल है। परिस्थिति क्या चीज है? बड़ी बड़ी परिस्थितियों में यह जीव अपना गुजारा कर लेता है, कीड़ा, मकोड़ा, पशुपक्षी ये भी तो जीव हैं, उनका भी गुजारा चलता है। कुत्ता, बिल्ली आदिक का कोई स्वामी तो नहीं लेकिन वे भी अपना गुजारा कर लेते हैं। मनुष्यों में भी जो गरीब हैं दरिद्र है वे भी येन केन प्रकारेण अपना गुजारा करते हैं। तो गुजारे की चिंता उतनी नहीं है मनुष्य को जितनी अपनी लोकप्रतिष्ठा और बड़प्पन की चिंता है। मेरा लोक में नाम हो, मैं वैभवशाली कहलाऊँ और यह पता नहीं कि इस समय भी यह वैभव से जुदा है और मरण करके तो एकदम ही अलग हो जायगा। जहाँ धन वैभव का अधिक संबंध है वहाँ लोगों के प्रति अधिक शंकायें बनी रहा करती हैं, भाई बहिन आदिक ये कहीं हमारा वैभव हड़प न लें, में निर्धन रहकर फिर इस लोक में कैसे जीवन बिताऊँगा ऐसी शंका किया करते हैं। राजा से धनिक लोग शंकित रहा ही करते हैं। एक तो टैक्स की भरमार है, और अपना बड़प्पन दिखाते हैं। अगर मालूम पड़ गया कि यह बहुत धनिक है, इसका कारोबार अच्छा है ऐसा विदित होने पर और अधिक टैक्स देना पड़ेगा, और वैसे ही जब राजा को जरूरत हो तो न भी टैक्स में न्याय बैठता हो तो भी जितना चाहे ले सकते हैं। सरकार को यदि किसी आपत्ति के समय किसी भी पब्लिक से जो भी जरूरत हो वह ले सकते हैं। कोई बड़ा मकान है, और और है, वहाँ किसी को ठहराना है या कुछ भी वैभव हो सब ले सकते हैं, तब शंका वाली ही बात तो रही। भले ही मौका नहीं रहा कि सरकार सब छुटा ले लेकिन कानून में तो है कि सरकार को कभी आपत्ति आये तो सब कुछ जिस चाहे का ले सकती है। तो धनिक लोग राजा से भी शंकित रहते हैं। दुष्टजनों की शंका हमेशा बनी रहती है। जो गुंडा लोग हैं, मरने मारने को तैयार रहते हैं ऐसे पुरुषों से धनिक को सदा शंका रहती है। कोई चोर हो गए, डाकू हो गए तो उनसे सदा शंका बनी रहती है। अभी ही पास के कांदला गाँव में एक धनिक के यहाँ डाका पड़ा तो डाकुवों ने घर के सभी लोगों को जख्मी कर डाला और जो कुछ भी धन था वह सब ले गए। अब सोचो उनका चित्त क्या कहता होगा? सच पूछो तो गरीब जन बहुत सुखी हैं पर नहीं ऐसा अनुभव करना चाहते। अपने से अधिक की ओर दृष्टि रहने से अंतर में साता का परिणाम नहीं रहता। इस धन वैभव के कारण चोर, डाकू, बैरी इन सबसे शंका बनी रहती है। बैरी न जाने कब अपना बैर भजाये, ये सब शंकायें धन वैभव के कारण रहा करती हैं।

धनिकों के स्वजनों में भी शंका- धन प्रसंग में स्त्री तक से भी शंका रहती है। बहुत सी कीमती चीजें स्त्री से भी छुपाकर रखते हैं धनिक लोग। एक तो यहाँ तक अविश्वास कर डालते हैं, आखिर वह स्त्री ले कहाँ जायेगी, लेकिन यह शंका हो जाती कि कदाचित् इसका चित्त पलट जाय और मुझसे विपरीत हो जाय, अन्य जगह इसका चित्त लग जाय तो किसी को भी यह वैभव दे सकती है, यों अनेक शंकायें हो जाती हैं। मित्र से भी शंका हो जाती है। भले ही वह मित्र विश्वासपात्र है लेकिन किसी भी समय इसका चित्त बदल सकता है और जितने लोग भी धोखा देते हैं वे विश्वासपात्र बनकर ही तो धोखा दे पाते हैं। आपका बड़ा विश्वासी कोई मैनेजर मुनीम बना है। आपके भले की ही बात वह सदा सोचा करता है, आपसे बड़ा अधिक प्रेम कर रहा है तो इतना अधिक प्रेम वह आपसे क्यों कर रहा है? यदि कोई सीमा से अधिक प्रेम करे तो उसमें भी यही समझ लेना चाहिए कि इसमें कोई हमारे धोखे की बात है। मित्रजन विश्वासपात्र बनकर ही तो धोखा दिया करते हैं। धन वैभव के कारण धनिक लोग इन सभी से शंकित रहा करते हैं। परिग्रह ऐसी चीज है, और जो शंका उत्पन्न करने वाली वस्तु है उसके रखते हुए आत्मा नि:शल्य कैसे हो सकता है? आत्मध्यान के लिए अपना प्रयत्न वह कैसे कर सकता है? तो जो उत्तम शरणभूत तत्त्व है आत्मध्यान उसमें महाबाधा डालने वाला परिग्रह है, इस कारण विवेकी साधुजन समस्त परिग्रहों का त्याग करके आत्मध्यान में उपयोगी रहा करते हैं।


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