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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 85

From जैनकोष



सुरोरगनरैश्वर्यं शक्रकार्मुकसन्निभम्।

सद्य: प्रध्वंसमायाति दृश्यमानमपि स्वयम्।।85।।

ऐश्वर्य की इंद्रधनुषवत् क्षणविनश्वरता― इस जगत् में देव, उरग, मनुष्य इनका ऐश्वर्य भी इंद्रधनुष के समान अतिचंचल है। केवल ये ऊपर से सुहावने दिख पडते हैं परंतु देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हैं। कभी थोड़े से बादलों में इंद्रधनुष दिखाई देता है। कितना बढ़िया आकार का होता है कि जरा भी लाइन नहीं बिगड़ती, कितना सुहावना लगता है? कितना सुंदर मालूम होता है पर वहाँ जाकर कोई छूकर देखे क्या है? कुछ भी नहीं है और देखते-देखते ही थोड़ी देर में नष्ट हो जाता है, विलीन हो जाता है। है वहाँ कुछ भी नहीं। कुछ सूर्य का योग्य सन्निधान पाकर इंद्रधनुष के रंग रूप परिणमन के योग्य बादलों का सद्भाव हो तो उस समय ये स्कंध ही उस रंगरूप हो जाते हैं। जो बादल जरासी देर में बिखरने वाले हैं, वहाँ अन्य कुछ बात नहीं है। कैसा विचित्र परिणमन है? जो बात किसी पुरुष के समझ में नहीं आती उसमें निमित्तनैमित्तिकपना कैसा है। विज्ञान की बात ध्यान में नहीं आती तो लो अमुक ने मेरा यों किया है यों कल्पना बनी ली जाती है। तो जैसे इंद्रधनुष देखने में ही सुहावना है, अतिचंचल है, विलीन हो जाता है, ऐसे ही ये दृश्यमान् समस्त ऐश्वर्य स्वयं विलय को प्राप्त हो जाते हैं।

तीनों लोकों के ऐश्वर्य की विनश्वरता का निरूपण― इस श्लोक में ऐश्वर्य बताते समय तीन के नाम लिए गए― देव, उरग और मनुष्य। उरग नाम है यद्यपि नागकुमार जाति के देव, फिर भी उपलक्षण से सब भवनवासी देव और व्यंतर देव भी ले लेना चाहिये और इस तरह से अब इसका अर्थ यह हुआ कि ऊर्ध्वलोक के तो हुए सुरेंद्र और मध्यवर्ती लोक के हुए चक्रवर्ती और अधोलोक के हुए भवनवासी आदिक इंद्र, ऐसे तीनों लोकों के इंद्रों का भी ऐश्वर्य केवल देखने में रम्य किंतु इंद्रधनुष के समान चंचल, शीघ्र विलय को प्राप्त हो जाता है।

समागत अचेतन पदार्थों की असारता― अपने-अपने पाये हुए ऐश्वर्य की भी बात निरख लो। अचेतन पदार्थों में भी यही बात है। यह वैभव, धन, मकान, ऐश्वर्य, ये सब केवल देखने में सुहावने लगते हैं। ठोस कुछ नहीं हैं। आत्मा को शांति पहुँचाने वाले ये कुछ भी नहीं हैं। ये तो केवल देखने में सुहावने लगते हैं पर शांति प्राप्त करने लायक इनमें कोई बात नहीं है। प्राय: ऐसा भी होता कि अपना ऐश्वर्य इतना सुहावना नहीं लगता जितना कि दूसरे का ऐश्वर्य सुहावना लगता, क्योंकि प्राप्त वस्तु में तृष्णा नहीं जगती, अप्राप्त वस्तु की तृष्णा हुआ करती है। जो ऐश्वर्य दूसरों के पास जो वैभव अन्य लोगों के अधिकृत है उस पर चाह रहती है, ऐसा और मुझे हो। ये वैभव बाहर से सुहावने लगते हैं, यदि वे ही अपने निकट आ जायें तो उतने सुहावने फिर नहीं रहते। मोह का कितना विचित्र परिणमन है कि प्राप्त और अप्राप्त सभी चीजें इसे सुंदर जँचती हैं, किंतु वे सभी चीजें सारहीन हैं, क्षणभर में ही विलय को प्राप्त हो जाती हैं।

चेतन पदार्थों की विनश्वरता― चेतन पदार्थों में देखो पुत्र, मित्र, स्त्री, बांधव सभी लोग जब कुछ थोड़ी रागभरी कल्पना में बढ़ जाते हैं तो ये बड़े सुहावने लगते हैं। जब कुछ मूढ़ता कम होती है तो उसे स्वयं प्रतीत होता है कि ये सब सारहीन हैं, इनमें कुछ तत्त्व नहीं है। वहाँ दो ही तो बातें हैं जीव और शरीर। शरीर तो नि:सार ही है, हाड़, माँस, खून, चाम, पसीना, मल मूत्र इन सभी अशुचि पदार्थों का पिंड है। रही चेतन की बात। वे चेतन भी कषायों से भरे, स्वार्थवासना से सहित अपनी ही अपनी गरज चाहने वाले, इस प्रकार वे भी पाप मलीमस हैं। यों वहाँ भी कुछ सार नजर नहीं आता। ये सभी वैभव, सभी ऐश्वर्य इंद्रधनुष की तरह सारहीन हैं। वे देखते ही देखते विलय को प्राप्त हो जाते हैं।

मेघवत् ऐश्वर्य की क्षणभंगुरता― पुराणों में आया है कि एक राजा छत पर बैठा हुआ बादलों की शोभा देख रहा था, तो कुछ बादलों की टुकड़ी बहुत बढ़िया मंदिर के आकार की बनी हुई थी। उसका बहुत ही सुंदर आकार था। सोचा कि इस नक्शे का मैं एक मंदिर बनवाऊँगा, मैं इसका चित्र उतारूँ। तो वह अकेला ही बैठा था। नीचे आया कागज पेन्सिल फुटा वगैरह चित्र बनाने के समान लेने। ज्यों ही नीचे से सामान लेकर ऊपर गया देखा कि सारे बादल इधर उधर बिखरे हुए हैं। बादलों का बना हुआ मंदिर विघट गया था। यह दृश्य देखकर उस राजा को वैराग्य हो गया। जैसे ये बादल देखते-देखते बिखर जाते हैं, ऐसे ही यह समस्त ऐश्वर्य देखते-देखते ही विलीन हो जाता है।

जीवन के सुख का असारपना― भैया ! क्या है जीवन का सुख? छोटे हैं, बच्चे हैं, तब उस स्थिति के योग्य कल्पना में सुख मानते हैं। साथ ही साथ अनेक दु:ख भी लगे रहते हैं। माँ है, पिता है, दादी है, सब कुछ है, लो थोड़े ही दिनों में वे गुजर गए, अब रोना पड़ेगा, रो रहे हैं। इस जीवन में कितनी ही बार रोना हुआ और कितनी ही बार इसने मौज माना। न यह मौज रहा, न रोना रहा। फिर मौज हुआ फिर रोना रहा। यों मौज मनाने और रोने का चक्र चलता रहता है। इसी के मायने जीवन है। जीवन और क्या वस्तु है?

सारभूत जीवन― सारभूत जीवन तो वह है जहाँ ऐसा अटल विशुद्ध ज्ञान उत्पन्न हो जिस ज्ञान के होने पर धैर्य रहे, गंभीरता रहे, ज्ञाताद्रष्टा रह सकें, क्षोभ न आये, यह हुआ लो यह ठीक, यह न हुआ लो यह भी जान लिया। जैसा जो कुछ है उसके मात्र जाननहार रहें। अपने स्वरूप पर इसका पूर्ण अधिकार रहे ऐसे प्रवर्तन का जो जीवन है धन्य जीवन तो वह है। इस ऐश्वर्य में मौज मानने वाला जीवन क्या जीवन हैं? यह सब शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो जाता है।

अजायबघर में अपनायत करने का निषेध― इस ऐश्वर्य को अनित्य समझकर हे मोक्ष के इच्छुक पुरुषों !इस अनित्य में अपने उपयोग को मत फँसाओ। जैसे लोग अजायबघर देखने जाते है तो वहाँ केवल देखते ही हैं ना। किसी चीज को उठाते तो नहीं। यदि किसी चीज को उठाने लगें तो वहाँ के कर्मचारी उसे गिरफ्तार करके दंड देंगे। ऐसे ही यहाँ संसार पूरा अजायबघर है। इस छोटे से अजायबघर में तो लोग टिकट लेकर देखने जाते हैं। अरे उस अजायबघर से भी बड़ा अजायबघर यह सब संसार है जो आँखों भी दिखता है। आखिर अजायबघर में यहाँ के चित्र विचित्र जीवों को ही तो देखते हैं। क्या यहाँ विचित्र-विचित्र जीव देखने को नहीं मिलते? वहाँ जो कुछ देखने में आता है वह सब है। किसी पर इस दृष्टा का अधिकार नहीं है। ऐसे ही यहाँ जो कुछ देखने में आता है वह सब अनधिकृत है। इस पर हम आपका कोई अधिकार नहीं है। इस अजायबघर में हम किसी भी वस्तु को यदि ग्रहण करते हैं, राग करके, ममता करके उसे अपनाते हैं तो उसका फल है कर्मबंधन से बँध जाना, गिरफ्तार होना और फिर दंड पाना। इस इंद्रधनुष के समान अति चंचल ऐश्वर्य को निरख कर हे आत्मन् ! तू प्रीति मत कर।


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