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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 851

From जैनकोष



स्वजातीयैरपि प्राणी सद्योऽभिद्रूयते धनी।

यथात्र सामिष: पक्षी पक्षिभिर्बद्धमंडलै:।।

परिग्रहियों पर परिग्रहियों द्वारा उपद्रव- जैसे किसी पक्षी के मांस का टुकड़ा हो तो और और भी अनेक पक्षी उसे पीड़ित करते हैं, उस पर झपटते हैं, इसी प्रकार धनाड्य पुरुष भी अपनी जाति वालों से दु:खी और पीड़ित किया जाता है। तो परिग्रह एक ऐसी वस्तु है कि उस परिग्रही पुरुष पर अनेक लोग झपटते हैं, उससे अनेक लोग धन छीनने का यत्न करते हैं। धन वैभव तो एक क्षुब्ध वातावरण बनाने वाली चीज है। जो पुरुष इस धन वैभव में आसक्त है उन पुरुषों को परमात्मस्वरूप का ध्यान नहीं बन सकता। और, परमात्मस्वरूप का जिसके ध्यान नहीं बना उनका जीवन क्या जीवन है? यों तो अनादिकाल से यह जीव अनंत बार जन्म धारण करता रहा, मरता रहा और उसी तरह अब भी जन्म मरण करता चला आ रहा है, ऐसे जीवन से क्या भला है? अनेक जीवन बने, उनमें से एक यह भी जीवन आ गया। इस जीवन की सफलता तब है जब कोई ऐसा उद्यम बन जाय कि यह संसार के संकटों से सदा के लिए छूट जाय। यह बात तभी बन सकती है जब निष्परिग्रहता को अपनाया जाय। समस्त बाह्यपरिकरों से, परिग्रहों से दूर रहकर अपने आपमें उठे हुए औपाधिक विकारों से भी अलग बसे रहने का प्रयत्न करें, अपने आपको परिग्रहरहित केवल ज्ञानप्रकाश मात्र अनुभव करते रहें तो इस संसार के संकटों से छूट सकते हैं। जो परिग्रह में चित्त लगाये हैं वे इस संसार के चक्र से छूट नहीं सकते। ज्ञानी गृहस्थ यद्यपि उसका जीवन परिग्रह में ही बना हुआ है, परिग्रह छोड़कर वह किस प्रकार रह सकता है? परिग्रह छोड़ दे तो गुजारा बन नहीं सकता, फिर भी जो ज्ञानी गृहस्थ होता है वह परिग्रह से विविक्त होने की भावना बनाये रहता है। ज्ञान का तो यही काम है कि जो जैसी बात है उसको वैसी बना दे। तो ज्ञान से ये सब बातें बन रही हैं, धीरता है, समता है। ज्ञान नहीं है तो बाह्यपदार्थों में आसक्ति है, उनके न ध्यान बन सकता, न मोक्षमार्ग निभ सकता। वे संसार के संकटों से छूट नहीं सकते।

तत्त्वज्ञानी की धर्मवृत्ति का हेतु- ज्ञानी गृहस्थ भी परिग्रह के बीच रहता हुआ अपने को परिग्रही अनुभव नहीं करता। वे सब दृश्य उसकी नजर में हैं। यह मैं अकेला हूँ और ऐसा ही यह मैं अकेला इस शरीर को त्यागकर जब कभी भी चला जाऊँगा। जिसकी यह बात नजर में बनी हुई होती है वह परिग्रह में क्या आसक्त होगा? एक कवि ने कहा है कि विद्या और धन ये दो तो तब कमाये जा सकते हैं जब चित्त में ऐसा भाव बना हुआ हो कि मैं तो अजर अमर हूँ, बहुत काल जिंदा रहने वाला हूँ। जो कोई यह विचारे कि मैं तो न जाने कल जिंदा रहूँगा या नहीं, वह धन क्या कमायेगा? जैसे कोई पुरुष मरणहार पड़ा है, आजकल में ही मरने वाला है उसको धन कमाने की बात मन में नहीं रहती, उसे तो यहाँ का सब असार दिखने लगता है। अब मैं चला, यहाँ कुछ तत्त्व नहीं है, यह सब उसे नजर आने लगता है। तो धन की कमाई तब बन सकती जब यह मान ले कि मुझे तो वर्षों जीना है, इसी तरह विद्या भी तब पढ़ी जा सकती है जब यह जान जाय कि मुझे तो वर्षों जीना है। विद्या एक दिन में तो नहीं आती। ज्ञानध्यान समता की बात तो तुरंत कर ली जा सकती है पर किसी भी विषय का क्रमसहित विधिवत् अध्ययन होना यह बात तो यों ही नहीं बन जाती। इसके लिए वर्षों चाहिए। तो जो ऐसा सोच ले कि मुझे तो अभी वर्षों जीना है वही विद्या पढ़ सकता है। छंदशास्त्र, दर्शनशास्त्र, वैज्ञानिकशास्त्र, और और जो ऊँची विद्यायें हैं जिनमें वर्षों का समय लगता है। कोई ऐसी बात लेकर बैठ जाय कि मुझे तो कल का भी पता नहीं कि जिंदा रहूँगा या नहीं तो वह इन विद्यावों को नहीं सीख सकता है। लेकिन धर्मधारण की बात, समता समाधि की बात वही प्राप्त कर सकेगा जिसके चित्त में यह बात बैठी हो कि मुझे पता नहीं कि मैं कब मर जाऊँ। धर्मधारण करने का पात्र भी वही पुरुष हो सकता है जो यह समझ ले कि मुझे तो कल का भी पता नहीं कि मैं जिंदा रहूँगा या नहीं। यह धन का संबंध इस जीव की विपरीत बुद्धि हो जाने का कारण होता है। जो बहुत बड़ा मित्र हो, बंधु हो, स्वजन हो, बड़ा विश्वासपात्र हो वे सभी इस धन के हरण करने की इच्छा रखते हैं, और कभी वे धोखा देकर उस धन को अपना सकते हैं। तो इस अनर्थ का घर जो धन है उसका संबंध जिसके बना हुआ है वह पुरुष आत्मतत्त्व के ध्यान का पात्र नहीं बन सकता। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ ऐसी अनुभूति की धारा उस पुरुष के न बन सकेगी जिस पुरुष को किसी भी परद्रव्य में राग और स्नेह होता है। तो शरण है एक अपने आत्मतत्त्व की सुध। उस आत्मतत्त्व की सुध को बनाने के लिए कर्तव्य है कि हम परिग्रहों में मूर्छा न रखें और आत्मतत्त्व की अपनी रुचि बनायें।


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