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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 854

From जैनकोष



सकलविषयबीजं सर्वसावद्यमूलं

नरकनगरकेतुं वित्तजातं विहाय।

अनुसर मुनिवृंदानंदि संतोषराज्य-

मभिलषसि यदि त्वं जंमबंधव्यपायम्।

सकल विषयबीजभूत वित्तजाल के त्याग में ही भलाई का अवसर- संसार का यह प्राणी जन्म के बंधन में पड़ा हुआ दु:खी हो रहा है। यह जिस शरीर में पहुँचता है उसी को अपना सर्वस्व समझता है और चित्त में कभी यह बात न आने देता कि इस शरीर को त्यागकर आगे भी कहीं यात्रा करनी होगी। इस शरीर के संबंध से जो कुछ वैभव है यह ही मात्र मेरा सब कुछ नहीं है ऐसी प्रतीति नहीं हो पाती है। फल यह होता है कि जैसे अनंतकाल इस जीव ने जन्म बंधन में बिताये, जब जब जो जो शरीर पाया तब तक उस शरीर में ममता रखी, शरीर के बंधन को अपना सर्वस्व वैभव माना, वही प्रकृति आज भी है, और यह रहा सहा थोड़ा सा समय भी बहुत ही शीघ्र गुजर जायगा, फिर आगे भी यही प्रकृति रखेगा ऐसा जन्म बंधन इस जीव के बहुत भयंकर लगा हुआ है। इसका विनाश करने में ही हित है। जो पुरुष सम्यग्ज्ञानी हुए हैं, जिनके विवेक जगा है, जिनका होनहार अच्छा होना है, उन्होंने इस विवेक का आदर किया और जिनमें शक्ति थी इस जन्म बंध को शीघ्र दूर करने वाले साधुजन, सर्वप्रकार के विकल्पों को त्यागकर केवल एक आत्मा के ध्यान में ही अपना उपयोग लगाया और जो पुरुष ऐसे थे कि इतना महान व्रत धारण नहीं कर सकते थे उन्होंने भी निर्णय तो यही बनाया कि गृहस्थी में रहें तब भी निश्चय तो यह रखें कि जन्म का बंधन दूर करना चाहिए। ये समस्त बाह्य परिकर नि:सार हैं, इनसे मेरे आत्मा के लिए कोई हित की बात नहीं आती। निर्णय गृहस्थी में भी यही रहे कि मैंने गृहस्थी किसी परिस्थितिवश अंगीकार किया है, वहाँ कुछ वैभव की जरूरत हुआ करती है तो इस वैभव के बीच रहते हुए भी, वैभव का रक्षण करते हुए भी श्रद्धा अपनी शुद्ध बनाये रहते हैं। यह धनसमूह, यह समस्त वैभव समस्त विषयों का बीज है। एक कवि ने कहा है- जवानी धन, संपदा, प्रभुत्व और अज्ञान ये चार अनर्थ के कारण हैं। इनमें एक भी हो तो भी जीव को अनर्थ की ओर ले जाता है। जवानी शरीर की युवावस्था की प्रकृति ही विकारों की ओर बढ़ाने की है। तो जवानी भी प्राय: अनर्थ के लिए होती है। यदि किसी के विवेक है, ज्ञान है, सम्हाल है, आत्मसंबोधन सही है ऐसा कोर्इ विशिष्ट पुरुष ही युवावस्था में अपना विवेक रखता है और आचरण में सही उतरता है। लेकिन प्राय: करके ज्ञानीजन कहाँ रखे हैं अतएव युवावस्था पाकर लोग अपना अनर्थ ही करते हैं इसी तरह धन संपत्ति की भी बात है। प्राय: जहाँ धन संपत्ति होती है उन पुरुषों को अभिमान रहता है, अपने आपको बड़ा समझते हैं और उस बड़प्पन की गंध से लोगों को तुच्छ समझकर उन पर अन्याय करते हैं और जिस चाहे उपाय से विषयसाधन में लग जाते हैं। तो धन संपदा भी अनर्थ का कारण है। इसी प्रकार कुछ प्रभुता आ जाय, अपने पड़ोस में, गाँव में कुछ बला बन जाय उसे कहते हैं प्रभुता। प्रभुता मिल जाय तो वह भी अनर्थ का कारण बनता है, और अज्ञान हो, अविवेक हो तो वह अनर्थ की खान है ही। तो ये चारों चीजें अनर्थ की खान हैं। यह सब संपत्ति का समूह समस्त विषयों का बीजभूत है। पंचेंद्रिय के विषय भली प्रकार भोगे, इसके लिए उत्साह देने वाला तो यह वैभव ही है।

सकलसावद्यमूल वित्तजाल के परिहार में ही श्रेयोलाभ का अवसर- यह धन वैभव समस्त पापों का मूल है। जो भी करोड़पति हैं, धनिक लोग हैं उनकी चर्या देख लो, उनका दिल ही जानना होगा। लोग धन वैभव को अधिक से अधिक चाहते हैं किंतु एक कवि के कथनानुसार बात यह समझना है कि जैसे स्वच्छ पानी से समुद्र नहीं भरा करता है इसी प्रकार शुद्ध धन से विभूति भी नहीं बढ़ती है। जैसे समुद्र मलिन नदियों से मटमैले जल से भरता है इसी प्रकार यह वैभव भी अन्याय वगैरह करके अधिक बढ़ता है। अपना परिणाम मलिन करे, हिंसा करे, कुगति में ले जाने के काम करे तो एकदम वृद्धि हो जाती है। न्याय नीति से कमाने में तो एक शांति के लायक वातावरण रहे, साधारणरूप में गुजारा चले, यही बात बन पाती है। धन की कोई सीमा नहीं है कि इतना वैभव हो जाय तो सुखी हो जायें। मन में धनसंचय की इच्छा रखकर घोर श्रम किया जाय, उद्यम किया जाय तो यह धन बढ़ता रहता है। यह धन संपत्ति नरकरूपी नगर की ध्वजा है। जैसे किसी नगर में ध्वजा लहराती है, उस ध्वजा का दर्शन पहिले होता है फिर उस द्वार से नगर में प्रवेश करते हैं, इसी प्रकार नरक में प्रवेश कराने के लिए यह वैभव ध्वजा की तरह है। देखिये आत्मा का हित है, आत्मा अपने सहज शुद्ध स्वरूप की ओर उपयोग दे इसमें आत्महित है। बड़े-बड़े महान ऋषियों ने यह बात बतायी है कि अपना ज्ञान अपने आत्मतत्त्व की ओर रहे, यही भाव जीव का हित है, यही वास्तविक धर्मपालन है। ऐसा न होकर धन वैभव की इच्छा करना, उनके जोड़ने की मन में धुन रखना, इनमें यह उपयोग कितना दूर चला जाता है और धन संचय के लिये न्याय अन्याय कुछ भी नहीं गिनता है। लेकिन यह बात बिल्कुल युक्त है कि मनुष्य न्याय अन्याय कुछ भी करे, नियम से उसका फल भोगना पड़ता है। यह तो एक निमित्तनैमित्तिक संबंध है, किसी की बनायी हुई बात नहीं है। यह जीव जो भी कर्म करता है उसका फल स्वयं भोगता है। कभी कभी अन्याय करते हुए में भी धनवृद्धि होती, खूब यश प्राप्त होता लेकिन यह एक पूर्वकृत पुण्य का फल है कि अन्याय करते हुए भी ये सब बातें दिख रही हैं। कोर्इ छोटा मोटा पुण्यकर्म होता तो उस अन्याय के करने से तुरंत नष्ट हो जाता, पर अन्याय करते हुए भी संपदा की अधिक प्राप्ति हो तो समझना चाहिए कि यह पूर्वकृत किसी उत्कृष्ट पुण्यकर्म का फल है।

दुर्गतिबीजभूत वित्तजाल का परिहार कर संतोषराज्य का लाभ लेने का अनुरोध- संग संगम पुण्यफल तो है किंतु इसका परिणाम होता क्या है कि यह धन वैभव पाकर यह जीव विषयों में प्रवृत्त होता है, कषायों में बढ़ता है, अहंकार में बढ़ता है, अपने आपको को भूल जाता है। उस समय इसके ऐसे कर्मों का बंध होता है कि इसे नरकादिक के घोर दु:ख भोगने पड़ते हैं। हे मुनि ! इस धन वैभव को दुर्गति का बीज जानकर तू छोड़ दे, और जो मुनिसमूह को आनंद देने वाला है ऐसे संतोष राज्य का अनुसरण कर। देखिये जो बात जैसी है उसे वैसी मानना ही चाहिए। धन हमसे भिन्न वस्तु है, इस धन वैभव के संसर्ग से इस आत्मा को कुछ भी सिद्धि न होगी। आत्मा का जो सत्य आनंद है उसे प्राप्त करो। इस धन वैभव का संसर्ग तो इस संसार में भटकाने वाला है। भले ही इस शरीर के संबंध से यह आवश्यक हो गया है कि भोजन करने का साधन रखें। अपनी व्यवस्था के लिए आजीविका का ढंग भी बनाना पड़ता है, उदरपूर्ति के लिए अनेक साधन बनाने पड़ते है। यह सब करते हुए भी अंतरंग में ऐसी भावना रहे कि ये सब क्रियायें तो मेरे आत्मा के अनर्थ के लिए हैं। किसी तरह से ये सारे झंझट भी छूट जायें, एक शुद्ध अवस्था प्राप्त हो जाय यही बात उत्तम है। जो बात सर्वोत्कृष्ट है उसे ज्ञान से अलग न करना चाहिए। जब भी कल्याण होगा तो इसी विधि से होगा। तो यह मार्ग मुनिसमूह को आनंद देने वाला है, इस ही आत्मनिष्ठा से संतोष का राज्य प्राप्त होता है। मुझे चाहिए कि उसका अनुसरण करें और जंमबंध के विनाश की अभिलाषा रखें। कुछ भी स्थिति आये यह मानते ही रहें कि यह परिग्रह आत्मा की वस्तु नहीं है, इससे आत्मा का हित नहीं है, सबसे निराले अपने आपके स्वरूप को निरखने में ही कल्याण की प्राप्ति है।


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