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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 856

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एवं तावदहं लभेय विभवं रक्षेयमेवं तत-स्तद्वृद्धिं गमयेयमेवमनिशं भुंजीय चैवं पुन:।

द्रव्याशारसरुद्धमानस भृशं नात्मानमुत्पश्यसिक्रुद्धयत्क्रूरकृतांतदंतपटलीयंत्रांतरालस्थितम्।।

धन वैभव की लालसा में अपने सर्वस्वविनाश की योजना- हे बहिरात्मन् ! धन की आशा के रस से तू भर गया है और उस आशारस के द्वारा तेरा मन रुक गया है अतएव तू ऐसा विचार करता है कि मैं प्रथम तो धन का उपार्जन करके वैभववान बनूँगा और फिर उसकी रक्षा करूँगा, वृद्धि करूँगा और इस उपाय से उसे में भोगूँगा ऐसी तू अपनी कल्पनाएँ बनाता है किंतु तुझे यह पता नहीं कि यह यमराज किसी दिन उठा लेगा अर्थात् आयुक्षय किसी दिन अचानक हो जायेगा। कोई गर्भ में ही मर जाता है, कोई जन्मते ही मर जाता, कोई जवानी में और कोई वृद्धावस्था में मर जाता है। यहाँ मरण का कोई समय निश्चित नहीं है। मृत्यु हम आप सबके सिर पर मंडरा रही है यह कहना अत्युक्ति न होगा। जब संसार की ऐसी स्थिति है तो हे आत्मन् ! तू अनेक ऐसी कल्पनाएँ जोड़ता है कि कोई तो पंचवर्षी योजनाएँ बनाते हैं पर तू तो एकदम से जीवनभर की कल्पनाएँ बना डालता है। अरे जुलाहा भी जब कपड़ा बुनता है तो वह भी कुछ किनारा बुनने से छोड़ देता है पर यह मनुष्य अपने जीव में कभी भी इन कल्पनाजालों से विराम नहीं लेता है। यह मोही जीव अपने जीवनभर का ऐसा ताना पुरता है कि यह अपनी जिंदगी में कभी विराम नहीं लेता है। हम आप भगवान की मूर्ति के समक्ष आकर क्या शिक्षा पाते हैं? अरे उन्होंने इस रागद्वेष मोह का परित्यागकर अपने आत्मा में विश्राम पाया, ऐसा ही करना हम आपका कर्तव्य है, यही तो शिक्षा हम आप उस प्रभु की मूर्ति से लेते हैं। पर यहाँ तो क्या हो रहा है लोग यही कल्पनाजाल पूरा करते हैं कि मैं यों यों धन कमाऊँगा, यों यों खर्च करूँगा, यों करूँगा, यों करूँगा ऐसा ही सोचते रहते हैं पर मैं मरूँगा, मैं मरूँगा ऐसा कभी नहीं सोचते। हे आत्मन् ! तू स्वरूप से ज्ञानमय है, आनंदमय है, तेरे स्वरूप में कोई कमी नहीं है, ज्ञान ही तेरा स्वभाव है और निराकुलता ही तेरा वैभव है। यह कहीं से माँगा हुआ गुण नहीं है, किसी परचीज से प्रकट किया हुआ गुण नहीं है, यह आत्मा में स्वयं ही है। जब तू स्वयं ही ज्ञानानंदमय है तो अब पर की ओर उपयोग देकर अपने में व्यग्रता क्यों मचाये हुए है? जो होना है सो हो रहा है, होने दो। तू अपने आपकी ओर दृष्टि कर, अपने आपमें प्रसन्न रह, विश्राम पा। ये कर्म भी उन्हें ही सताते हैं जिन्हें धन की आशा अथवा जीवन की आशा लगी है। सभी मनुष्य अपने अपने हृदय से सोच लें कि ये दो बातें लगी हैं- धन की आशा लगी है और जीवन की आशा लगी है। यदि यह कल्पना जग गयी कि कहीं धन न नष्ट हो जाय, जीवन न नष्ट हो जाय तो अंदर से एक घबड़ाहट सी मालूम होती है। तो आप यह समझिये कि इन दो बातों में यह मोही जीव बड़ा कष्ट मानता है- धन न रहे और जीवन न रहे। क्योंकि कर्मों के और विकट उपद्रव हो ही क्या सकते है। लेकिन ये कर्म उनको ही सता सकेंगे जो धन और जीवन की आशा रखते हैं।

अंतस्तत्त्व के अतिरिक्त सर्व संगम की आशा से रहित पुरुषों को कल्याणलाभ- जिन संतों को न धन की आशा है, न जीवन की आशा है अर्थात् किसी भी चीज की आशा को जिनके कोई गंध नहीं है- जीवन रहे तो, न रहे तो इसलिए ये संतजन इस आशा का पूर्ण परित्याग कर देते हैं। और, ऐसे ही संतजन इन कर्मबंधनों को तोड़ सकते हैं जिन्होंने इस आशा का पूर्ण परित्याग कर दिया है। जो बाह्य में सर्व की आशा का त्यागकर मृत्यु का सहर्ष स्वागत करें उनका कर्म क्या करेंगे? किसी भी चीज की आशा बनाना यह अपने अनर्थ का ही कारण है। समस्त पापों का कारण है परिग्रह का संग्रह। इस परिग्रह के संसर्ग से अनेक कल्पनाएँ बनाना यह अनर्थ का कारण है, समस्त पापों का कारण है ऐसा निर्णय रखना चाहिए। पूर्ण सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र के पालन में ही अपना हित है। कहीं वैभव की आसक्ति होने के कारण, उसके संचय हो जाने के कारण मेरा हित नहीं हो सकता है। ऐसा निर्णय रखने वाले पुरुष कभी दु:खी नहीं होते। यहाँ आचार्यदेव मुनिजनों को समझा रहे हैं क्योंकि उनको ही संबोधने के लिए यह ग्रंथ बना है कि यदि निर्वाण चाहते हो, आत्महित चाहते हो, शांति चाहते हो तो आत्मा का ध्यान करो। और, आत्मा का ध्यान तभी बन सकता है जब किसी बाह्यपरिग्रह की ममता न हो। अतएव समस्त पर का परित्याग करें और आत्मध्यान करके अपने आपमें प्रसन्न होवें। इससे अपन को भी यह शिक्षा लेना चाहिए कि इन बाह्य परिग्रहों को हटाने में ही लाभ है और आत्मा के शुद्धस्वरूप में प्रवेश करने में ही लाभ है।

अथ सप्तदश प्रकरणम्


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