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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 860

From जैनकोष



यद्याशा शांतिमायाता तदा सिद्धं समीहितम्।

अन्यथा भवसंभूतो दु:खवार्धिर्दुरुत्तर:।।

आशा के शमन में समीहितसिद्धि- यदि ऐसी शांति प्राप्त हो जाती है तो फिर समझिये कि उसी समय सर्व मनोवांछित कार्यों की सिद्धि हो जाती है। मन में कोई इच्छा न पैदा होना यह समस्त मनोवांछित सिद्धि का देने वाला है, जो चाहा सो मिल गया। जब हम कुछ चाहे ही नहीं, कोई आशा न रखें तो हमें सब कुछ मिल गया। यदि हम चाह रखते हैं, आशा करते हैं तो जिसकी चाह रखी वह तो है ही नहीं, अन्यथा चाह किसकी कर रहे? तो चाह के मिटने पर सब कुछ मिटता है और चाह के रहने में स्पष्ट ही है कि वह चीज नहीं मिली हुई है। यदि आशा शांत हो जाय तो समझिये कि समस्त मनोरथ शांत हो गए, और यदि आशा शांत नहीं हुई तो फिर यह संसार से उत्पन्न हुआ दु:खरूपी समुद्र दुस्तर हो जायगा, तिरा न जा सकेगा अर्थात् संसार का दु:ख मिट न सकेगा। भ्रम में यही तो हो रहा है कि जिस कुबुद्धि से क्लेश आते हैं उसी कुबुद्धि का प्रयोग करते हैं। तो जैसे खून से रंगा हुआ कपड़ा कोई खून से ही धोना चाहे तो क्या वह धुल सकेगा? नहीं धुल सकता, वह तो और दगीला बन जायगा, ऐसे ही इच्छावों से तो दु:ख उत्पन्न होता और उन दु:खों को शांत करने के लिए हम इच्छा जगायें तो दु:ख शांत होगा क्या? दु:ख तो बढ़ेगा। तो हे प्रभो ! मेरे में ऐसी सुगति जगे कि किसी भी परपदार्थ की मुझमें वांछा न उत्पन्न हो। निरीहता की चाह होती है ज्ञानी पुरुष के। जबकि अज्ञानी अपनी सुख समृद्धि के लिए वैभव की चाह करता रहता है और उस चाह में उसे दु:ख ही दु:ख भोगना पड़ता है।

परिग्रहसंबंध का परिहार करके ही संतजनों द्वारा शांति का उपलंभ- थोड़ा समागम है धन का तो वहाँ थोड़ा क्लेश है। जब बहुत समागम हो जाता तो बहुत क्लेश है। काहे के लिए इतना अधिक क्लेश जोड़ना? किसको प्रसन्न करना चाहते हो? कौन यहाँ तुम्हारा ईश्वर है? तुम किसी को प्रसन्न नहीं कर सकते। दो प्रसन्न होंगे तो दो अप्रसन्न होंगे। संसार में ऐसा कोई भी उपाय नहीं है जिससे संसार के सभी जीव हम पर प्रसन्न हो जायें और मान लो हो गए कुछ लोग प्रसन्न, तो तुम्हारे आत्मा का उससे क्या हित हो जायगा? प्रत्येक पदार्थ का स्वरूप अभेद्य है। किसी भी पदार्थ में कोई दूसरा पदार्थ कुछ प्रसन्नता नहीं कर पाता ऐसे सर्वपदार्थ अपने अपने स्वरूप में मौजूद हैं। जब हम किसी भी पर में कुछ नहीं कर पाते, कोई भी पर जीव मुझमें कुछ नहीं कर सकता तो फिर ये व्यर्थ के श्रम संचय के, वैभव के, यश बढ़ने के, नामवरी करके ये सब प्रयत्न मूढ़ता नहीं तो फिर क्या है? यह मोहभाव मिटे और आत्मा में ज्ञान जगे तो आत्मा को शांति मिलेगी, पर के मोह में आत्मा को त्रिकाल भी शांति नहीं मिल सकती। पुराणों में पढ़कर देख लीजिए। वर्तमान के लोगों को देख लीजिए, मोह करके किसने सुख पाया? रामचंद्र जैसे महापुरुष जिनके विषय में सब लोग एक मत होकर श्रद्धा से देखते हैं ऐसे प्रभु राम भी जब तक विरक्त नहीं हुए घर में बसते रहे तब तक यह बतलावो कि उन्होंने कौन लोकव्यवहार में माना जाने वाला सुख पाया? प्रथम तो स्वयंवर के समय ही कितने और प्रतिद्वंद्वी खड़े हो गये। सीता का विवाह हुआ तो उसके बाद ही उन्हें और और तरह की विपत्तियाँ आयी। जब राजतिलक होने को था तो एकदम भरत को राज्य होगा यह हुक्म दिया गया। रामचंद्र को वनवास हुआ। वन में क्या वे विश्राम से रहते थे? अरे जंगल तो जंगल ही है लेकिन वहाँ भी पुण्यानुसार कोई न कोई राजा महाराजावों का आदर पाते रहे, यह उनके पुण्यविशेष की महिमा है। लेकिन वहीं सीता का हरण हुआ उसके वियोग में क्लेश पाया, यों और और भी क्लेश पाये। तो बड़े-बड़े पुरुषों ने भी पुण्य के प्रभाव में कष्ट ही पाया। तो यह आशा जैसे जैसे फैलती है वैसे ही वैसे क्लेश होता है, मोह की गाँठ दृढ़ होती है, ऐसा सच्चा ज्ञान और वैराग्य जगे, परिग्रह का संबंध टूटे, अपने आपमें अपना ध्यान करने की धुन बने, स्वयं लीन होकर निर्मल और प्रसन्न रह सकें यह कला जग जाय आत्मा में तो हमारा क्लेश दूर हो सकता है, पर की आशा में, पर की भीख में आत्मा को शांति नहीं प्राप्त हो सकती।


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