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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 867

From जैनकोष



तस्य सत्यं श्रुतं वृत्तं विवेकस्तत्त्वनिश्चय:।

निर्ममत्वं च यस्यापिशाची निधनं गता।।

आशापिशाची के दूर होने पर ही श्रुत की सत्यता- जिस पुरुष के आशारूपी पिशाची निधन को प्राप्त हो गई है, नष्ट हो गई है उसका शास्त्राध्ययन करना सार्थक है और जिसकी आशापिशाची नष्ट नहीं हुई उसका शास्त्राध्ययन भी कुछ मूल्य नहीं रखता। एक बहुत ऊँचा पंडित बनारस में था। बहुत पुरानी बात नहीं दो तीन पीढ़ी की ही बात है। उस पंडित का बड़ा यश फैल चुका था। खूब वृद्ध होने पर भी वह रात्रिभर शास्त्राध्ययन करते थे। लोगों ने उनसे कहा कि पंडित जी अब आप बहुत वृद्ध हो गए, आपका यश भी खूब फैल चुका है, अब तो आपको इतना श्रम करने की आवश्यकता नहीं रही। तो पंडित जी बोले कि हमारा यश खूब फैल गया है। अब यदि हम किसी से शास्त्रार्थ में हार गए तो हमें कुवें में गिरकर ही प्राण देने होंगे। सो कहीं हार न जायें इस कारण इतना श्रम अभी करते रहते हैं। आखिर एक दिन हुआ भी ऐसा ही। किसी जवान विद्वान से शास्त्रार्थ में हार गए तो रात्रि को कुवें में गिरकर अपने प्राण त्याग दिया। तो इस आशा राक्षसी का जिसके निवास है उसे अपने आपका लाभ कुछ नहीं सूझता। जो कुछ उद्वेग में आया उसी कर्तव्य के करने पर उतारू हो जाता है। शास्त्राध्ययन उसका निरर्थक हो जाता है। जिसने आशापिशाची को नष्ट किया वही पुरुष सम्यग्ज्ञान के द्वारा अपने इस स्वतंत्रस्वरूप को समझ पाता है। वस्तु के स्वतंत्रस्वरूप की समझ आती है सम्यग्ज्ञान से। और, वह ज्ञान बनेगा द्रव्यगुण पर्याय की समझ से। सो द्रव्यगुण पर्याय की सही समझ बनायें तो उसकी परंपरा से फिर यह आशापिशाची दूर हो जायेगी।

आशापिशाची के नष्ट होने पर ही चारित्र विवेक निर्ममत्व व तत्त्वनिश्चय की समीचीनता- यह आशा का गड्ढा इतना विलक्षण है कि ज्यों ज्यों इसे पूरा करते जावो त्यों त्यों यह और खाली होता जाता है। और, जमीन के गड्ढों में तो यह बात नहीं है, उनको तो कूड़ा करकट डालते जाइये, भरते जायेंगे, पर यह आशा का गड्ढा ऐसा विचित्र है कि जितना ही धन वैभव का कूड़ा करकट डालते जावो उतना ही खाली होता जाता है। अनेक श्रम करके कभी कोई सुख और विश्राम का समय आये तो फिर झट कोई ऐसी आशा उपजती है कि सारा सुख किरकिरा हो जाता है। कभी बहुत अच्छा समय आये, सर्वसंपन्न है लेकिन उस समय कोई आशा जगे तो वह सब कमाई हुई स्थिति बिल्कुल खतम हो जाती है, यह आशापिशाची जिसकी नष्ट हुई है वही सच्चे चारित्र को पाल सकता है। सच्चा चारित्र पालने का प्रयोजन यही है कि यह आत्मा अपने स्वरूप में मग्न हो जाय। यह बात तब बनती है जब किन्हीं बाह्यपदार्थों की आशा नहीं रखी जाती है। आशा के भेद से ही विवेक सार्थक है। आशावान को विवेक कहाँ जगता? उसके तो पक्षपात, अन्याय ये सभी प्रवृत्तियाँ चलती हैं। जिनके आशापिशाची जागृत है उनको तत्त्व का निश्चय नहीं होता, ममत्व परिणाम का अभाव भी नहीं होता। आशा जिस पदार्थ की लगी हो उसको एक विलक्षण बंधन हो जाता है। जैसे गाय या भैंस को ले जाने के लिए एक बढ़िया उपाय यह है कि उसके बच्चे को उठाकर आप चल दें, फिर तो वह गाय या भैंस अपने आप पीछे-पीछे भागती चली आयगी, ऐसे ही जिस पुरुष को जिस पदार्थ से बंधन है, आशा है वह पदार्थ तो उसके बंधन में बंधकर यों ही चलता रहता है। जिसकी आशापिशाची नष्ट हुई हो वह स्वतंत्र है, उसका शास्त्राध्ययन करना, चारित्र पालना, विवेक होना, तत्त्व का निर्णय होना, निर्भयता होना ये सब बातें यथार्थ हैं। आशा दूर करें और आत्मध्यान पायें और इसके प्रसाद से आत्मीय शुद्ध आनंद का अनुभव करें।


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