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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 897

From जैनकोष



साधुसंवृतवाग्वृत्तैर्मौनारूढस्य वा मुने:।

संज्ञादिपरिहारेण वाग्गुप्ति: स्यान्महामुने:।।

साधुत्वसाधना में वाग्गुप्ति का स्थान- वचनगुप्ति उन महामुनियों के होती है जिन्होंने वचनों की परिणति का सम्वरण किया है, मौन से रहते हैं और समस्या आदिक का त्याग करके पूर्ण मौन से जो आरूढ़ होते हैं उन महामुनियों के वचनगुप्ति होती है। जो कम बोलता है उसके ही वचनों में एक बहुत बड़ी विशेषता झलकती है। अधिक बोलने वाले के वचन कभी न कभी ऐसे अनर्थरूप निकल जाते हैं कि पीछे अपनी मूर्खता पर बोलने वाले को पछतावा होता है। तो वचनों का जो अधिकाधिक सम्वरण करते हैं, मौन से रहते हैं और समस्या आदिेक का भी त्याग करते हैं, हाथ से संकेत करने या लिखकर देना आदि का भी त्याग करके जो मौन में आरूढ़ रहते हैं उन महामुनियों के वचनगुप्ति होती है।


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