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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 918

From जैनकोष



यस्य हेयं न वाऽऽदेयं नि:शेषं भुवनत्रयम्।

उन्मीलयति विज्ञानं तस्य स्वान्यप्रकाशम्।

ज्ञान का विशुद्ध अभ्युदय प्राप्त होने पर हेय आदेय के विकल्पों का भी अभाव- जिस मुनि के ये तीनों लोक हेय भी नहीं, उपादेय भी नहीं उस मुनि के स्व और पर का यथार्थ निर्णय कराने वाले ज्ञान का उदय होता है क्योंकि जब तक हेय और उपादेय बुद्धि में रहेगा तब तक ज्ञान निर्मलता से फैल नहीं सकता है। जीवों के उत्थान के क्रम से सोपान है। सर्वप्रथम तो यह जीव कुछ भी जाने बिना अपने कुल के संस्कार से या किसी सत्संग से सद्व्यवहार में लगता है। सत्संग, देवदर्शन, पूजन, विधान इन सबमें लगता है और इसके पश्चात् फिर वह ज्ञान उत्पन्न करता है। मैं पूजन कर रहा हूँ तो किसका कर रहा हूँ? प्रभु का क्या स्वरूप है, सो ज्ञान करके प्रभु के स्वरूप में उसकी भक्ति बढ़ती है। पहिले भक्ति व्यवहार की थी, अब गुणों की भक्ति करने लगा है यह भक्त, फिर और ज्ञान बढ़ा, तत्त्वनिर्णय किया, आत्मस्वरूप परिचय किया, जब उसका ज्ञान और निर्मल बना तो इस ज्ञान की स्थितियों में पहिले कुछ हेय समझता था, कुछ उपादेय समझता था पर ज्यों और ज्ञान की स्थिति निर्मल होने लगी तो जिन्हें पहिले हेय समझता था उन्हें तो हेय ही समझता रहेगा, किंतु जिन्हें उपादेय समझता था उनमें से अनेक अंश अब उसे हेय लगने लगते हैं। ज्यों ज्यों ज्ञान बढ़ता है त्यों हेय की कोटि बढ़ती जाती है और उपादेय इसके निकट आता रहता है। जब परिपक्व ज्ञान हो जाता है उस समय जगत के किसी भी पदार्थ में अथवा अपनी किसी भी प्रवृत्ति में हेय और उपादेय की बुद्धि नहीं रहती। जैसे प्रथम वचन सत्संग ये सब उपादेय हैं और जब ऐसी स्थिति आ जाती है कि जहाँ ज्ञान का अनुभव होने लगता है, ज्ञान ज्ञान को जानकर एक अनुभवरूप बन जाता है तो वहाँ फिर ये सब न हेय रहते हैं, न उपादेय रहते हैं। एक निर्विकल्प ज्ञान का अनुभव चलता रहता है। तो जब ऐसी ऊँची परिणति हो जाती है कि ये तीनों ही लोक और अपने आपकी ये समस्त औपाधिक परिणतियाँ चाहे वे विशुद्ध रूप हों, चाहे संक्लेशरूप हों, चाहे धर्म में लगाने के विकल्प हों या अन्य कुछ हों, वे सबके सब एक अपेक्षा बन जाते हैं, अब वे हेय न रहे, न उपादेय रहे, हेय और उपादेय का विकल्प जहाँ टूट जाता है ऐसे विज्ञानी मुनि के अपना और पर का प्रकाश करता हुआ उदित होता है और जब तक इस जीव के हेय और उपादेय की बुद्धि रहती है, यह हेय है इसे छोड़ो, यह उपादेय है इसे ग्रहण कर लीजिए यों छोड़ने और ग्रहण करने में जिनका चित्त लगा रहता है उनके ज्ञान का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। जिन भी पुरुषों का ज्ञान का पूर्ण प्रकाश हुआ है, अरहंत अवस्था प्राप्त हुई है उनको एक निर्विकल्प ज्ञानानुभव के उपाय से ही मिली हुई है। निर्विकल्प ज्ञानानुभव में हेय और उपादेय का भाव नहीं चलता, अमुक हेय है और अमुक उपादेय है। जब हेय और उपादेय के विषय से भी परे हो जाते हैं फिर तो ज्ञान पूर्ण विकसित हो जाता है। रागद्वेष विकल्पों के दूर होने पर ज्ञान के विकास को कौन रोके, अथवा रोकने की क्या पड़ी? ज्ञान का विकास तो अभीष्ट है, होने तो दीजिये विकास।। तो सर्वप्रकार के विकल्प जब दूर हो जाते हैं तो अपने आपमें आपका विकास होने लगता है।


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