• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 934

From जैनकोष



हत्वा स्वपुण्यसंतानं मद्दोषं यो निकृंतति।

तस्मै यदिह रुष्यामि मदन्य: कोऽधमस्तदा।।934।।

निंदक के प्रति उपकारिता की भावना― ज्ञानी पुरुष अपने आपमें क्रोध भाव न आने देने के लिए कैसा विचार करते हैं उसका इस छंद में वर्णन है। ज्ञानी पुरुष ऐसी भावना करते हैं कि यदि कोई पुरुष मेरे दोषों को कहता है तो वह अपने पुण्य का क्षय करके ही तो मेरे दोषों को कहता है। जो पुरुष किसी दूसरे की निंदा करता है वह अपने पुण्य को समाप्त कर देता है ना, क्योंकि निंदा करने के परिणाम से पुण्य समाप्त हो जाता है। तो यह कोई दूसरा पुरुष जो मेरे दोषों को काढ़ रहा है वह अपने पुण्य का विनाश करके मेरे दोषों को निकाल रहा है। उस पर यदि मैं रोष करुँ तो जगत में मेरे समान नीच और कौन है। दोष कहने वाला मेरी भलाई कर रहा है और इतनी अधिक भलाई कर रहा है कि वह अपना बिगाड़ करके भलाई कर रहा है क्योंकि जो दोष कहता है वह अपने पुण्य को नष्ट कर देता है। क्रोध पर विजय करने के लिए ज्ञानी पुरुष कैसी भावना करता है उसका यह वर्णन है। ज्ञानी सोचता हे कि कोई पुरुष अपना धन खर्च करके दूसरे का उपकार करता है और दोष कहने वाला पुरुष तो अपने पुण्यरूप परिणाम को बिगाड़कर और अपने पहिले बंधे हुए पुण्य का विनाश करके मेरे दोष निकाल रहा है तो वह मेरा कितना बड़ा उपकार कर रहा है। जैसे कोई पुरुष अपना धन खर्च करके उपकार करें तो हमें तो उसका एहसान मानना चाहिए। उससे भी बढ़कर यह दोष कहने वाला उपकारी है जो अपना सर्वस्व बिगाड़ करके मुझे सावधान बना रहा है अथवा मेरे दोष निकाल रहा है। ऐसे पुरुष को यदि मैं क्रोध करूँ तो मुझसे अधम और कौन होगा। वह तो मेरा उपकारी है। उससे विरोध रखने का नाम कृतघ्नता होगा। जो किए हुए उपकार को भूल जाय उस पुरुष को कृतघ्न कहते हैं। यों दोषवादी पुरुष को अपना उपकारी मान रहा है जिससे अब उसे क्रोध नहीं आता। क्रोध तब आता जब अपने चित्त में यह बात आये कि यह मेरा अपकारी है। जब दोष कहने वाले को अपना उपकारी मान लेगा तो उस पर क्रोध न आयगा।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_934&oldid=84548"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki