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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 943

From जैनकोष



अप्यसह्ये समुत्पन्ने महाक्लेशसमुत्करे।

तुष्यत्यपि च विज्ञानी प्राक्कर्मविलयोद्यत:।।943।।

ज्ञानी का क्लेश में भी संतोष― ज्ञानी पुरुष ऐसा विचार करता है कि जो ज्ञानी पूर्व कमाये हुए कर्मों को नष्ट करने में तत्पर होता है वह बड़े-बड़े असह्य क्लेशों के प्राप्त होने पर संतोष भी करता है। कष्ट तो एक निशानी है उन्नति की। जिस पुरुष को कभी जीवन में कष्ट नहीं आता, माँ बाप भी उसका बड़ा ख्याल रखते हैं और लोग भी उसका बड़ा ध्यान रखते हैं तो ऐसी स्थिति में उसमें धीरता का गुण न जगेगा, न बुद्धि का कौशल होगा, उसमें गुणों का विकास न होगा। दु:ख आता है भले के लिए ऐसा ज्ञानी पुरुष विचार करता है। इस मायामय संसार में यदि बड़े आराम से भी जी गए, एक जीवन मौज में, विषयों में, प्रेम में खो दिया तो इससे इस जीव को लाभ क्या मिला? इतना दुर्लभ मनुष्य जन्म पाने से इसे कोई अद्भुत लाभ लेना था, सदा के संकटों से छूट जाय ऐसा तत्त्वज्ञान करना था। परंतु मौलिक उपाय न करके और मन माफिक शांति के लिए कुछ विषय कषायों के उपाय बनाया तो उसमें मनुष्य होने का लाभ कुछ नहीं लिया। वह विचारता है ज्ञानी पुरुष कि पूर्व जन्म में जो कर्म उपार्जित किया था उनका उदय अवश्य होता है। अब उदय आकर यह खिर रहा है तो यह अच्छा ही तो है। ऐसा समझकर संतोष करता है। सत्यता तो यह है कि जिस आत्मा को अपने आपके सहज स्वरूप की प्रतीति है मैं तो इतना ही मात्र हूँ, जो ज्ञानानंद स्वरूप है वही मैं आत्मतत्त्व हूँ ऐसी जिसे अपने सहज ज्ञानस्वरूप की प्रतीति जगती है उसे अन्य किसी पर क्रोध नहीं जगता। यहाँ किस पर क्रोध करना? जैसे कुछ बालक यह समझते हैं कि मेरा रक्षक पिता है सो क्लेश आने पर पिता दिख जाने पर झट उसकी शरण गहता है क्योंकि उसकी समझ में उसका पिता रक्षक बना हुआ है। तो रक्षक कोई हो लोक में तो उसके प्रति कुछ अपनी ठिनक चलाये, कुछ रोष करे, पर जगत में मेरा रक्षक है कौन? कोई भी जीव नहीं है। जो आज बहुत-बहुत प्रेम दिखाते हों वे भी इस आत्मा के रक्षक नहीं है। मोह में स्नेह के कारण ऐसा सोचते तो हैं कि मैं बड़ा सुखी हूँ, मैं बहुत मौज में हूँ, मुझ पर इनका बड़ा स्नेह है, पर उस स्नेह से होता क्या है? क्या सदा संयोग रहेगा उस स्नेही मित्र से? मेरा ही उदय खराब आ जाय, बुद्धि बिगड़ जाय, पागलपन आ जाय तो क्या वहाँ कोई मित्र स्नेही साथ दे सकेगा? कोई मेरा सहाय नहीं है। मेरा तो मात्र मैं हूँ। अपने को सम्हालें तो सत्य सहारा मिल गया ऐसा ज्ञानी संत विचार कर रहे हैं इस ही कारण बड़े-बड़े क्लेश उत्पन्न होने पर तुष्ट ही रहते हैं दु:खी नहीं होते।


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