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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 948

From जैनकोष



अयत्नेनापि सैवेयं संजाता कर्मनिर्जरा।।

चित्रोपायैर्ममानेन यत्कृता भर्त्सयातना।।948।।

विराधक द्वारा भर्त्सयातना होने पर ज्ञानी के अयत्नसाध्य कर्मनिर्जरा के लाभ का चिंतन― फिर मुनिराज ऐसा विचार करते हैं कि इस शत्रु ने मेरा अनेक प्रकार के उपाय से तिरस्कार करके जो पीड़ा की है, इससे तो मुझे बड़ा लाभ हुआ है। बिना यत्न किए सहज ही मेरे बहुत से कर्मों की निर्जरा हो गयी। सधर्मीजन यदि तिरस्कार करे तो वह कर्मनिर्जरा का कारण है। उस समय समता का परिणाम रख सके तो जो कर्म पूर्व जन्म में कमाये हैं वे तो खिरते हैं और अब कोई हमारा तिरस्कार कर रहा है तो वे कर्म खिर ही तो रहे हैं। किसी ने हमें गाली दी तो उसमें क्या खेद मानना? जब ज्ञान रहता है उस समय कोई दुर्वचन बोले, कोई तिरस्कार करे तो यह सब कर्मनिर्जरा के लिए होता है। ज्ञानी संत मुनिराज ऐसा विचार करते हैं कि इस प्रवृत्ति से इस शत्रु ने जो मुझे अनेक प्रकार से पीड़ा दी है, तिरस्कार किया है इससे मेरा लाभ ही है। यह बात केवल कहने भर की नहीं है ऐसी प्रवृत्ति होती है उनकी जिनको यथार्थ ज्ञान है। जो कर्म कमाये हैं पूर्व में वे उदय में आयेंगे, खिरेंगे उनका फल भोगना होता है। तो जब फल भोगना होगा तो उस समय तो वे कर्म खिर जायेंगे। तो कर्म खिर गये यह तो लाभ की बात है। तो जिसमें विपदा आये, कोई अपमान करे तो वह स्थिति भले के लिए है। ऐसे हृदय से ठीक प्रकार से विचार करते हैं ज्ञानी पुरुष, कि यह उपकार की ही तो बात है। इस पर क्रोध क्यों करना? क्रोध कषाय के विजय का उपाय बताया जा रहा है कि हम कैसा चिंतन करें कि क्रोध कषाय हमारा दूर हो।


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