• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 956

From जैनकोष



स एव प्रशम: श्लाध्य: स च श्रेयोनिबंधनम्।

अदयैर्हंतुकामैर्यो न पुंस: कश्मलीकृत:।।956।।

प्रशमभाव की श्लाध्यता― वही प्रशमभाव प्रशंसनीय है और वही कल्याण का कारण है जिसे हनन की इच्छा करने वाले निर्दय पुरुष ने मलिन नहीं किया, अर्थात् बड़े-बड़े उपसर्ग आये तिस पर भी क्रोध रूप मल से मलिनता न आये वह शांतभाव सराहने योग्य है। उत्तम क्षमा तो उन संत पुरुषों के होती है जिन्होंने अपने आत्मा का अंतस्तत्त्व पहिचाना है और आत्मा सहज ज्ञायकस्वरूप सबसे न्यारा है ऐसी जिनकी प्रतीति हुई है उनके क्षमा सहज बनती है। बाह्य में कोई कुछ करता हो, किसी की कोई परिणति हो वह उनकी उनमें है। उससे मेरा क्या बिगाड़ है। मैं अपने आपमें अपनी कल्पनाओं से अपनी परिणति से परिणमता रहता हूँ ऐसा जिनके निर्णय है उन पुरुषों के क्रोधभाव उत्पन्न नहीं होता और वे ही प्रशंसा के योग्य हैं।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_956&oldid=84571"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki