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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 959

From जैनकोष



वासीचंदनतल्यांतर्वृत्तिमालंब्य केवलम्।

आरब्धं सिद्धिमानीतं प्राचीनैर्मुनिसत्तमै:।।959।।

ज्ञानी की वासीचंदनतुल्यांतर्वृत्ति― प्राचीन बड़े-बड़े मुनिराजों ने प्रारंभ में किए हुए मोक्षमार्ग की साधना किया है सो चंदन की तरह अपना अंतश्चित् बना करके ही किया है। जैसे कुल्हाड़े से चंदन को काटा जाय तो चंदन का वृक्ष कुठार की धार को भी सुगंधित बना देता है और काटने वाले को भी सुगंधी देकर प्रसन्न कर देता है। इसी तरह मुनिराज पर कोई उपसर्ग करता हो तो वह मुनि महाराज उसका हित ही चाहते हैं, वे किसी का अहित नहीं चाहते। तो चंदनवृक्ष की तरह उपकार करने वाले मुनिराज की वह वृत्ति प्रशंसा के योगय है और मुक्ति की सिद्धि देने वाली है, इस बात का अभ्यास सभी को ही करना चाहिए। क्रोध में भी जो जितना सहनशील होगा, गम खाने वाला होगा, अपने व्यवहार से किसी दूसरे का चित्त न दु:खाये ऐसा महापुरुष होगा, वह प्रसन्न रहेगा, सुखी रहेगा उसे कोई शल्य भी न होगी। और, जो पुरुष दूसरों को सताते हैं, सताने के दुर्वचन कहते हैं उन पुरुषों को शल्य रहता है, तत्काल दु:खी भी होते हैं और कहो उनकी मरम्मत भी हो जाय, तो यह महापुरुषों का लक्षण नहीं है कि वे जरा-जरासी बात पर घबरा जायें और अपनी धीरता खो दे। मुनिजनों की अंतर्वृत्ति चंदन की तरह है। जैसे चंदन वृक्ष कुल्हाड़े की धार को भी सुगंधित बना देता है, पेड़ काटने वाले को भी सुगंधित वातावरण देकर प्रसन्न बनाता है ऐसे ही मुनिराज भी उपसर्ग करने वाले का भी हित ही चाहते हैं। ऐसा जानकर हमें यह शिक्षा लेना चाहिए कि क्रोध में हो कोई, तब भी अधिकाधिक यही यत्न करें कि मेरा अपकार करने वाले के प्रति भी मुझसे दुर्वचन न निकलें।


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