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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 966

From जैनकोष



वयमिह परमात्मध्यानदत्तावधाना:, परिकलितपदार्थास्त्यक्तसंसारमार्गा:।

यदि निकषपरीक्षा सुक्षमा नो तदानीं, भजति विफलभावं सर्वथैष प्रयास:।।966।।

उपसर्गकाल में उपशमभाव रखकर परीक्षा में सफल होने की भावना―यह प्रकरण चल रहा है क्रोध कषाय के विजय का और क्रोध कषाय के विजय के पूर्ण अधिकारी मुनिजन होते हैं अतएव उनकी ही भाषा में यह वर्णन चल रहा है। देखो हम लोग परमात्मा के ध्यान में चित्त देकर सावधान हो गए। हम लोगों का प्रोग्राम क्याहै? परमात्मस्वरूप का ध्यान करना। जैसे किसी साधारण रागी गृहस्थ का प्रोग्राम क्या है? धन बढ़ाना, विषयसाधना बढ़ाना और विषयों का भोगना। एक ही उनकी धुन है। तो यहाँ इन ज्ञानी जनों की क्या धुन है? परमात्मस्वरूप में चित्त को लगाना, ऐसा ही संकल्प करके इस पद में आये हैं और हमारी स्थिति क्याहै कि पदार्थ के स्वरूप को जानें और संसारमार्ग को त्यागे। तत्त्वस्वरूप जानना, संसार के मार्गरूप रागद्वेष मोह के कष्ट को अलग कर देना और परमात्मस्वरूप में ध्यान बनाये रहना यह हमारा काम है। और इस काम के लिए किसी साधन की जरूरत बाहर में नहीं है। यह तो अपने ज्ञान द्वारा साध्य बात है। इसी कारण कोई भी वस्तु, कोई भी परिग्रह मुनिजन नहीं रखते। क्योंकि जिस काम को करने के लिए हम चले हैं वह काम तो मेरे भीतर आत्मा के ज्ञान के आधीन है। अब जरूरत किस बात की रही? तो हम रागद्वेष के ध्यान में चित्त लगाने वाले हैं, तत्त्व के स्वरूप को यथार्थ जानने वाले हैं, संसारमार्ग को त्यागने वाले हैं, तो ऐसी हमने अपनी स्थिति बनाया, संकल्प किया और चल भी रहे हैं। यदि ऐसा होकर भी हम परिग्रहों की कसौटी की परीक्षा में फैल हो जायें, असमर्थ हो जायें, हम वहाँउपशम भाव न कर सकें तो मुनिधर्म के पालन करने का सब प्रयास व्यर्थ हो जायगा। इतना एक प्रोग्राम दृढ़ता से प्रतीतिपूर्वक बना लें, फिर उस प्रोग्राम में चलते रहने के लिए उसके विरुद्ध कोई बात नहीं आती। आती है तो उसको सह लेना बिल्कुल आसान हो जाता है।

एक लक्ष्य होने की धुन में उपसर्गसहन की सुगमता― भला यही बताओ मुनियों के लिए 22 परीषह बताये हैं, लेकिन गृहस्थ लोग कितने परीषह सकते हैं? उनके परीषहों की तो गिनती ही क्या की जाय? दु:ख कल्पनायें करके बना लिए जायें यह बात अलग है, दु:ख अज्ञान से आते यह बात अलग है। हम ऊपरी कष्ट के हिसाब से बात कर रहे हैं। गृहस्थ लोगों को कितने कष्ट सहने पड़ते हैं और वे कष्टों को कितना आनंद से सह लेते हैं। यह भी देख लीजिए क्रोध, मान, माया, लोभ के वश होकर, किसी चीज की तृष्णा में आकर उसकी प्राप्ति की धुन में अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। कोई पीटता भी है, कोई गाली देता है, कहीं समुद्र की सैर करना होता है, जहाज से जा रहे हैं, भाग रहे हैं, कोई गाली देता है। कितने तरह के कष्ट हैं। कोई लड़का प्रतिकूल हो गया, स्त्री आज्ञा नहीं मानती है, निरंतर घर में क्लेश बना रहता है। कितनी तरह के कष्ट हैं। पर यह बतलाये कि इतनी तरह के कष्ट सहते हुए भी घर में क्यों रह रहे हैं? मगर मोह ऐसा है घर में रुचि ऐसी है, एक प्रोग्राम अपना ऐसा बनाये रखते हैं कि वे हजारों कष्ट सह लेते हैं, पर घर नहींछोड़ते। भीतरी बातों को नहीं छोड़ते। यहाँ हम बतला रहे हैं धुन वाले मनुष्यों की प्रकृति की बात। गृहस्थों को धुन हैएक विषय साधन की अथवा धनी होने की। तो एक इस धुन के पीछे हजारों कष्ट सहने पड़ते हैं और उन हजारों कष्टों को ये सह लेते हैं। जैसे एक छोटा सा दृष्टांत है कि कोई एक बूढ़ा व्यक्ति अपने दरवाजे पर बैठा हुआ था। उसके नाती पाते उसे हैरान कर रहे थे। कोई बालक उसके सिर पर बैठता, कोर्इ हाथ झकझोरता, कोई पीठ पर चढ़ता, कोई मूंछ पटाता। वह बूढ़ा दु:खी हो रहा था। उधर से एक संन्यासी निकला। संन्यासी ने पूछा अरे बूढ़े बाबा तुम क्यों रो रहे हो? तो उस बूढ़े ने बताया कि हमारे ये नाती पाते हमें बहुत तंग करते हैं इसलिए हम रो रहे हैं। तो संन्यासी बोला― कहो हम तुम्हारे सारे संकट मेट दें।...हाँमहाराज मेट दीजिए, आपकी बड़ी कृपा होगी। वह बूढ़ा जानता था कि संन्यासी जी कोई ऐसा मंत्र पढ़ देंगे जिससे ये नाती-पोते हमारे सामने हाथ जोड़ते फिरेंगे। पर संन्यासी ने कहा ! चलो तुम घर द्वार छोड़कर हमारे साथ चलो, तुम्हारे सारे संकट मिट जायेंगे। तो वह बूढ़ा बोला― अरे ये नाती पोते हमें चाहे जो कुछ करें, पर ये हमारे नाती-पोते ही रहेंगे, ये तो न मिट जायेंगे। तुम बीच में कौन बहकाने वाले आ गए? तो देखिये कष्ट है घर में, पर घर नहीं छोड सकते। अरे जब यह बात समझ में आ गई कि घर भारी दु:ख है तब फिर उस घर के त्यागने में क्या दिक्कत है? लेकिन जो एक मोहभरी धुन बनी हुई है उस धुन में ये घर के हजारों कष्ट सह लिए जाते हैं। तो भला गृहस्थ तो इतने कष्ट सह लें और मुनिजन, साधु उन्होंने भी एक धुन बनाया है। आत्मा का शुद्ध स्वरूप जानने की धुन बनाया है। तो इस धुन में 22 परीषह आ जायें तो उन्हें सह लेना क्या कठिन बात है? परीषह सहने की बात तब कठिन लगती है जब भीतर की धुन का पक्का न हो, वहाँसाधुजन चिंतन करते हैं कि यदि कोई परीक्षा का अवसर आये और उसमें हम सफल न हो सकें, अपना समतापरिणाम न रख सकें तब तो हमारा मुनिधर्म को धारण करने का प्रयास ही व्यर्थ रहेगा। जब उपसर्ग आया और समभाव रहे तब ही तो उपशमभाव की प्रशंसा है। तो ये सब भी चाहिए अपनी-अपनी शक्ति के माफिक। अपना ज्ञानबल बढ़ायें।

तत्त्वज्ञान, कष्टसहिष्णुता व विशुद्ध परोपकार से प्रसन्नता का अभ्युदय― जो मनुष्य कष्टसहिष्णु होगा। दूसरे की सेवा करने में प्रमाद न करता होगा, परोपकारी होगा वह मनुष्य सांसारिक जीवन में आनंद में रहता है। और, जो कष्टों से डरते हैं, कष्ट आयें तब भी दु:खी, न कष्ट आयें तब भी दु:खी। जो लोग परसेवा से कतराते हैं वे प्रमादी बनकर भीतर ही भीतर कल्पनायें बनाते हैं और दूसरों के अनादर के पात्र होते हैं। जो लोग ज्ञान की ओरदृष्टि नहीं रखते वे अज्ञान में व्याकुल होते रहते हैं। हमारा कर्तव्य है तत्त्वज्ञानी बनना। कष्ट सहिष्णु बनें, परोपकारी बनें। अरे कोई सोचे कि हम परोपकारी तो है ही, भला बताओ कि हमको कुछ मिलता जुलता नहीं किसी दूसरे जीव से, फिर भी स्त्रीपुत्रादिक की जो सेवा की जा रही है वह परोपकार ही तो है। रात-दिन बहुत-बहुत श्रम कर रहे हैं, बड़े-बड़े कष्ट उठा रहे हैं। कष्ट सहते हुए भी उनको कष्ट नहीं गिन रहे हैं, आप रात-दिन उन कुटुंबी जनों की सेवा की धुन में बने रहते हैं। और दूसरों के प्रति तो ऐसा है कि यदि कोई किसी नाली वगैरह में गिर गया हो तो उसे उठाने तक के लिए भी समय नहीं है। वहाँ यह सोचते हैं कि कहीं छींटे न लग जावें। देख लो इनका कितना बढ़िया परोपकार है। बस घर के इन दो चार जीवों के लिए ही मेरा तन-मन-धन आदि है। चाहे कर्ज लेकर भी उनको खुश करना पड़े फिर भी उनको खुश रखना चाहते। तो पर का ही तो उपकार कर रहे, लेकिन वह उपकार नहीं, वह तो एक अज्ञानता है, कोरा मोह है, अपने आपकी हिंसा है, बरबादी है।

निरालंबना कृपा की महिमा― बौद्ध ग्रंथों में 3 प्रकार की कृपायें बतायी गई हैं। एक तो जिन जीवों से अपना कुछ संबंध है, कुछ अनुराग है उन जीवों की दया करना, दूसरा बताया गया हे कि जो अपने धर्म के साथी है, धर्मात्माजन हैं उन पर कृपाकरना, और तीसरी कृपा बतायी गई है कि न तो धर्मात्मापन का नाता हो और न घर के मोह राग का नाता हो, किंतु एक जीवत्व के नाते से ही कृपा करना उसे कहते हैं निरालंबना कृपा। जैसे कोई मेंढक पत्थर के नीचे दबा है और उसका पत्थर हटा देना। उसका दु:ख दूर कर देना, देखो इसमें न कुछ मोह वाली बात है और न धर्मात्मा संबंधी बात है तो फिर क्यों कृपा की? केवल एक जीव के नाते से? तो यों ही समझिये कि कृपा उसकी बड़ी कहलाती है जो सब जीवों में समता भाव रखता है। हम आप लोग परमात्मा को दयालु कहते हैं― हे भगवान जिनेंद्र देव, हे परमात्मदेव आप दयालु हो, पर प्रभु में तो जरा भी बात नहीं दिखती। अभी आप मंदिर में भगवान के दर्शन करने आयें और सिर में कोई भींत वगैरह लग जाय, कोई चोट आ जाय तो वहाँ भगवान कहाँदया करते हैं? वे तो पास आकर देखते भी नहीं। मान लो साक्षात् अरहंतदेव ही विराजमान हों तो वह भी तो कुछ दया नहीं करते। फिर भी उनकी परम कृपा मानी जाती है क्योंकि सर्व जीवों में उनकी समान दृष्टि है। सब जीवों पर कृपादृष्टि किया है। तो यह कितनी कृपा है। स्त्री पुत्रादिक की बड़ी खबर रखना, उनको बहुत-बहुत श्रृंगार से सुख से भरपूर बनाना, आदिक यह तो एक अज्ञान अंधकार की गति है। यह कोर्इ कृपा नहीं कहलाती। जीवपने के नाते से होने वाली जो कृपा है, वह परम कृपा है। तो यहाँ हम ऐसा परोपकारी जीवन बनायें, वहाँऐसी पात्रता होगी कि हम प्रसन्न होंगे, निर्मल बनेंगे और भीतर ही अपने ज्ञानस्वभाव को अपने ज्ञान में लेंगे, निर्विकल्प ध्यान बना सकेंगे। स्वानुभूति जगेगी और हम वास्तविक अपनी कृपा करेंगे।




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