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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 980

From जैनकोष



कूटद्रव्यमिवासारं स्वप्नराज्यमिवाफलम्।

अनुष्ठानं मनुष्याणां मन्ये मायाबलंबिनां।।980।।

मायावलंबी मनुष्यों के अनुष्ठान की नि:सारता―माया का आलंबन करने वाले पुरुषों का अनुष्ठान ऐसा है जैसा कि कूटद्रव्य असार है। इसके अर्थ में हिंदीकार ने लिखा है निर्माल्यद्रव्य। निर्माल्य द्रव्य के समान असार समझिये मायाचारी व्यक्ति के अनुष्ठान कर्तव्यों को। निर्माल्य द्रव्य कैसे असार है? जैसे निर्माल्य द्रव्य अपने किसी काम का नहीं है। वह तो हे, पडा है, उसे अपना न सके, उसे खा न सके, उसे अपने उपयोग में न ले सके। निर्माल्य द्रव्य किस काम का? जैसे वह अपने काम न आयगा अतएव असार है इसी प्रकार मायाचारी पुरुषों का धार्मिक अनुष्ठान भी असार है। असार किसे कहते हैं? जो अपने काम न आये वह ही असार है। जैसे संसार असार है, यह आत्मा के काम नहीं आता। तो धार्मिक मंदिरों का संख्याओं का द्रव्य भी असार है क्योंकि वह अपने काम नहीं आने का। इसी प्रकार निर्माल्य द्रव्य भी असार है। जो मंदिर में द्रव्य वगैरह चढ़ा दिए गए उन्हें फिर कौन अपने काम में लेता? जो द्रव्य मंदिरों में चढ़ाया जाता है तो उसका लेने वाला माली है। उसको देने के बदले में मंदिर की झाडू बोहारी सफाई आदि का काम कराते हो तब वहाँ समझना कि हमने इस चढ़ाये हुए द्रव्य तो स्वीकार किया। ऐसे उस द्रव्य को कोई नहीं स्वीकार करता। तो जैसे यह निर्माल्यद्रव्य असार है इसी प्रकार मायाचारी का अनुष्ठान भी असार है। अथवा जैसे स्वप्न में पाया हुआ राज्य फलहीन है उसी प्रकार मायाचारी पुरुषों के द्वारा किया गयाधर्मकार्य भी फलहीन है। देखो― स्वप्न तो प्राय: सभी ने देखे होंगे, जरा स्वप्न की घटना का अंदाज करिये जिसने स्वप्न में राज्य सुख पाया, बड़ा धनवैभव आदिक का ठाठ पाया तो क्या वह उसेमिल गया? अरे वह तो स्वप्न का राज्य है। वह तो निष्फल है, इसी प्रकार मायाचारी पुरुष का भी धर्म निष्फल है। बल्कि स्वप्न में राज्यसुख भोगने वाला तो जितने समय तक स्वप्नदशा में है उतने समय तक तो वह कुछ मौज मानता ही है, कुछ तो वह प्रसन्नता में रहता ही है, पर मायाचारी पुरुष तो उन धार्मिक अनुष्ठानों में भी हर समय अप्रसन्न रहता है। उसके अंदर निर्मलता नहीं आती, उसमें भय बना हुआ रहता है, तो धार्मिक अनुष्ठान मायाचारी पुरुष करे तो वे निष्फल हैं। तो फिर ऐसी मायाचारी क्यों करना? यहाँएक बात और विशेष समझना कि धार्मिक कर्तव्यों के प्रसंग में क्रोध जगे, मान जगे, लोभ जगे तो ये तीव्र क्रोध मान, माया, लोभ कहलाते हैं। घर गृहस्थी में रहकर, दूकान व्यापार में रहकर मायाचार होता रहता है वह भी बुरा है। पूजापाठ में, ध्यान स्वाध्यान में, व्रत तप संयम में या अन्य बातों में कोई मायाचार करे तो यह मायाचार तो उन व्यापार आदिक के सिलसिले में होने वाले मायाचारों से तीव्र है या नहीं? तो जो मायाचार का आलंबन लेकर धार्मिक अनुष्ठान करता है उसका सब अनुष्ठान नि:सार है।


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