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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 993

From जैनकोष



यत्र तत्र प्रसूयंते तव क्रोधादयो द्विष:।

तत्तत्प्रागेव मोक्तव्यं वस्तु तत्सूतिशांतये।।993।।

कषायों के आश्रयभूत त्याग का आदेश―हे आत्मन् ! जिस-जिस पदार्थ का आश्रय लेकर तेरे में और, जब इंद्रियाँ उन्मत्त हो गई तो उनके वश होकर वह पुरुष कठोर क्रोधादिक कषायों को अपनाये हुए हैं फिर भी वह कषायों के आधीन हो जाता है आज मनुष्य लोग परेशान हैं, परेशान तो सभी प्राणी हैं पर मनुष्यों की बात देख लीजिए एक छोर से दूसरे छोर तक जो मनुष्य दिखते हैं प्राय: सभी परेशान नजर आते हैं, परेशानी ही परेशानी है। परेशानी का क्या अर्थ है? जरा संस्कृत शब्द की पद्धति से देखो परेशानी के शब्द में दो शब्द हैं पर और ईशानी। ईशान का अर्थ है स्वामी। पर मायने दूसरा और ईशानी मायने मालकियत स्वामीपना, याने जो किसी दूसरे को अपना स्वामी मानता हो, जिसमें किसी दूसरे की पराधीनता स्वीकार की हो वह है परेशानी। तो मूल में वे विषयभाव पर हैं और इनकी आधीनता स्वीकार कर ली है, विषयों की आधीनता है इसलिए यह परेशानी है। आत्मा तो एक अकेला है, अकेला ही था और अकेला ही रहेगा। ज्ञानमात्र है, अमूर्त है, इनमें किसी दूसरी चीज का लाग लपेट नहीं है। आज की स्थिति में कुछ इंद्रिय संपर्क होने के कारण कोई ऐसी विकट दशा बन रही है कि उपयोग इंद्रिय द्वारा होता है, और इससे ऐसा लगता है कि मेरे साथ विषयों का संबंध हुआ है। किंतु हो रहा है केवल विषयसंबंधीज्ञान, उसके साथ लगा है राग। तो परिचय और राग इन दोनों का मिश्रण होने से इस जीव को परेशानी आ गई, तो वस्तुत: मेरी आत्मा में किसी दूसरी चीज का लाग लपेट नहीं होता। जब कोई चीज मिले तो इसमें बढ़ोत्तरी क्या और कोई चीज न रहे तो इसमें घाटा क्या? अपने आपको अकेला ही निरखो, संतोष ही संतोष मिलेगा। लोग जो कषायों की आशा में दब गए हैं उनका यह इंद्रियहस्ती विकार को प्राप्त होता हे और फिर वह ही पुरुष बड़े कठिन क्रोधादिक भावों में आ जाता है। और, जो कषायों में हैं उनके पीडा प्रकट है। जो क्रोध कर रहा हो उसके दु:ख देख लो कितना दु:खी है। खुद आपे में नहीं है, वचन भी अटपट निकलते हैं, शरीर भी कंपित हो जाता है, ओंठ काँप जाते हैं, दाँत काँप जाते हैंउसकी स्थिति तो बड़ी दु:खमय है, साफ दिखता है। इसी प्रकार मान, माया, लोभ आदिक कषायों से पीड़ित पुरुषों की जो दु:खमयी स्थिति हे वह स्पष्ट नजर आती है। तो भाई ऐसी कषायों के दु:ख अगर सहन नहीं करना है तो इंद्रियविषयों का निरोध करना होगा।


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