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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 1

From जैनकोष



काऊण णमुक्कारं जिणवरवसहस्स वड्ढमाणस्स ।

दंसणमग्गं वोच्छामि जहाकम्मं समासेण ।। 1 ।।

(1) जिनवाणी के मूल प्रणेता आप्तदेव को नमस्कार―जिनवरवृषभ वर्तमान को नमस्कार करके संक्षेप से यथाक्रम दर्शन मार्ग को कहूंगा । यहाँ नमस्कार जिन्हें किया है उनके विषय में दो पद दिये हैं । जिनवरवृषभ और वर्द्धमान । इन दोनों को विशेष्य भी मानकर अर्थ किया जा सकता और विशेषण विशेष्य मानकर भी अर्थ किया जा सकता । जहाँ विशेषण विशेष्य कर अर्थ करें वहाँ अर्थ होगा, अपने ज्ञानादिक गुणों में बढ़ते हुए जिनवर वृषभ को नमस्कार हो । इस अर्थ में जिनवर वृषभ के तीन शब्दों के तीन अर्थ हैं । जिनवर वृषभ । जो जिन हैं उनमें जो वर हैं, उनमें भी जो वृषभ हैं, श्रेष्ठ हैं उनको नमस्कार हो ꠰ इस अर्थ में जिनका अर्थ होगा, जो मोह को जीत लेता है, सम्यग्दृष्टि है और उसमें भी जो यथायोग्य संयम धारण करता है ऐसा ज्ञानी जीव जिन कहलाता है याने श्रावक और मुनि, उनमें वर मायने श्रेष्ठ गणधर आदिक उनमें जो भी वृषभ श्रेष्ठ तीर्थंकर, आप्त सर्वज्ञदेव, उनको यहां नमस्कार किया गया है, जो कि वर्द्धमान हैं, पूरे पहुंचे हुए हैं । आप्त किसे कहते हैं? आप्त तो सर्वज्ञदेव को कहते याने जो जिनवाणी है यह जिसके मूल से उद̖गत हुई है वह आप्त कहलाता, पर आप्त का शब्दार्थ क्या है? पहुंचे हुए । जैसे किसी पुरुष के बारे में प्रशंसा करके कहते हैं कि यह तो यह तो बहुत पहुंचे हुए पुरुष हैं, कहां पहुंचे हुए हैं? ज्ञान में, आचरण में, तपश्चरण में । तो ऐसे ही आप्तदेव को कहा कि यह तो पहुंचे हुए है, कहां पहुंचे हुए हैं? ज्ञान की उत्कृष्टता में, आनंद की उत्कृष्टता में ये पहुंचे हुए हैं ।

(2) निर्दोष वाणी से आप्त के आप्तत्व की सिद्धि―जिसके सत्य पूर्ण ज्ञान प्रकट है और सत्य पूर्ण आनंद प्रकट है उसकी वाणी ही निर्दोष होगी । जिसके ज्ञान कम है और वह ज्ञानी पुरुष भी है, पर अल्पज्ञता है तो खोटे अभिप्राय से भले ही सदोष वचन न निकले, पर ज्ञान की कमी से संभव है सदोष वचन हो सके । तो जिसके ज्ञान के परिपूर्णता है और इस ही कारण आनंद की परिपूर्णता है ऐसा ज्ञानानंद निधान आप्त सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि में जो बात निकली है वह निर्दोष है ꠰ सर्वज्ञ सिद्धि में सयुक्तिक साधन निर्दोष वाणी है, जिसके मूल से ये ग्रंथ निकले, वह सही है, सर्वज्ञ है, इसको सही जानने का और क्या उपाय है? सिर्फ यह ही उपाय है कि युक्ति अनुमान आदिक साधन प्रमाण से यह निर्णय करें कि ये वचन निर्दोष हैं । निर्दोष वचन से ही सर्वज्ञता की सिद्धि बनती है, आप्त की । आप्त और सर्वज्ञ इन दोनों का भले ही स्थूल रूप में एक अर्थ है, पर सूक्ष्म रूप में आप्त की प्रसिद्धि है, दिव्यध्वनि से उपदेश जिसका चलता है ऐसे सर्वज्ञ में । सर्वज्ञ तो सभी सर्वज्ञ है और इस दृष्टि से सभी सर्वज्ञों को आप्त नहीं कहते, किंतु जिस सर्वज्ञ से वाणी खिरी है उन्हें आप्त कहते हैं, ऐसा एक सूक्ष्म मनन में अर्थ आता है । कभी आगम का जहाँ लक्षण किया हैं, न्यायशास्त्र में तो बताया है ‘आप्तवचनादि निबंधनम्’ याने आप्त के वचन आदिक के कारण से जो अर्थ परंपरा आयी है उसे आगम कहते हैं ।

(3) तीर्थंकरों के स्मरण का मुख्य कारण―जिनवरवृषभ मायने तीर्थंकर देव । सभी तीर्थंकरों के दिव्यध्वनि खिरती है, उनके ऐसा ही तीर्थंकरप्रकृति का योग है । सभी सर्वज्ञों के दिव्यध्वनि नहीं खिरती । अनेक केवली होते हैं, कितने ही तो उपसर्गसिद्ध केवली होते हैं, दिव्यध्वनि का अवसर ही क्या? कितने ही मूक केवली होते हैं, उनके दिव्यध्वनि नहीं खिरती । तो जिनवर वृषभ तीर्थंकर केवली से दिव्यध्वनि खिरी ही है और उससे यह वाणी परंपरा चली है । किसी भी ग्रंथ को पढ़ने से पूर्व जिसके प्रति ग्रंथकार कृतज्ञ हैं उसको स्मरण किया करते हैं, जिनसे उपकार पा चुके हैं उनका स्मरण किया करते हैं । तो यहाँ जिनवरवृषभ को नमस्कार किया । वे है वर्द्धमान, ज्ञानादिक गुणों में पूर्ण बढ़े हुए हैं । यह तो विशेषण विशेष्य भाव का अर्थ ꠰ जहां दोनों ही विशेष्य लिये जावे वहाँ अर्थ होगा―जिनवरवृषभ मायने आदिनाथ भगवान और वर्द्धमान मायने महावीर भगवान, इन दो तीर्थंकरों को नमस्कार हुआ ꠰ दो के करने से बीच के तीर्थंकरों का निमित्त अपने आपमें अंतर में सिद्ध होता है । ऐसे वर्द्धमान जिनवर वृषभ को नमस्कार करके अब यहाँ दर्शनमार्ग को कहेंगे, सम्यग्दर्शन का मार्ग, सम्यग्दर्शन के लाभ का उपाय, सम्यग्दर्शन का स्वरूप ।



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