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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 15

From जैनकोष



जिणवयणमोसहमिणं विसयसुहविरेयणं अभिदभूयं ।

जरमरणवाहिहरणं खयकरणं सव्वदुक्खाणं ।। 15 ।।

(60) जिनवचनपरमौषधसेवन से क्लेशप्रक्षय―इससे पहले की गाथा में यह बताया गया था कि सम्यक्त्व से ज्ञान बना, ज्ञान से पदार्थ का निर्णय हुआ, पदार्थों के निर्णय से कल्याण अकल्याण की जानकारी हुई, कल्याण अकल्याण की जानकारी से दूशील, सदा के लिए मिटा और यह शीलवान बना मायने आत्म स्वभाव में उपयोग बनने लगा तो उस शील के फल से सद्गति मिलती है, अभ्युदय मिलता है और उससे उसके बाद फिर निर्वाण प्राप्त होता है । जब तक सम्यग्दृष्टि जीव संसार में रहता है तब तक वह उत्तम गतियों में ही रहता है, अंत में मोक्ष होता है । तो उस मोक्ष की विधि बने यह जिन उपायों से होता उन उद्यमी का भी मूल क्या है? जिन वचन । जैसे बताया गया था कि साधारण ज्ञान हुए बिना सम्यक्त्व भी नहीं होता । तो ऐसे साधारण गुण अनुभवरहित ज्ञान ही सही, मगर वहां ज्ञान भी तो जिनवचन के बिना नहीं हो सकता । स्वाध्याय करे, जिन वचनों को अपने हृदय में बैठाये, उसका रहस्य जाने तो ये सब बातें होती हैं । और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान होने के बाद भी वह सम्यग्ज्ञान में बढ़ता रहे, चारित्र को पाले चारित्र में वृद्धि होवे इसके लिए भी जिनवचनों का स्वाध्याय चाहिए । इस प्रकार जिनेंद्र भगवान के ये वचन औषधिरूप हैं ।

(61) सहज सत्य आराम के लिये विषयसुखगंदगी के विवेचन की अत्यावश्यकता―जैसे किसी को अफरा चढ़ गया, बुखार हो गया, कुछ भी यह रोग होता है तो वह पेट के रोग से होता है अजीर्ण से रोग की शुरुआत होती है । जुकाम हो, बुखार हो, बड़े से बड़ा रोग हो, जैसे जलोदर है या अन्य कुछ है, सबकी जड़ है अजीर्णता । उदराग्नि सही न होना । मंदाग्नि होने पर उसे सब रोग घेर लेते हैं । जब कोई कठिन रोग हो गया तो उसका उपाय वैद्य लोग करते हैं कि इसको वमन कराओ । जल्दी किसी की तबीयत ठीक करना हो तो वमन की औषधि देते हैं जिस औषधि को देने से वमन हो जाता है और वमन होने के बाद उसकी तबीयत ठीक हो जाती है । न भी औषधि देवे और किसी का जी मिचला रहा, बुखार सा आ रहा, सिरदर्द सा भी करने लगा तो ऐसा रोगी जानता है कि उस काल में प्राय: वमन होता है और वमन होने के 10-5 मिनट बाद ही उसको आराम हो जाता है, तो ऐसे ही जिनवचनरूपी परम औषधिक पान करने से इंद्रियसुख का विरेचन होता है । जीव के साथ रोग लगा हुआ है इंद्रियविषयसुख की इच्छा और उसका ही ख्याल, उसकी ओर ही धुन, ये जीव को बड़े विकट रोग हैं और इस रोग, प्राय: सारा संसारी प्राणी व्यस्त है । तो जब इस जीव को ऐसी अफरा चढ़ा है इसको विषयसुख रुचने से, विषयसुख भोगने से निरंतर आकुलता लगी रहती है तो उस पीड़ा को नष्ट करने का उपाय क्या है कि विषयसुख इसको न रुचें, विषय सुखों का यह विरेचन कर दे । यह ही एक उपाय है कि यह जीव सुख शांति में रह सकता है । इस समय भी अपने आप में निरखों तो जब चित्त प्रसन्न है, शारीरिक आधिव्याधि कोई नहीं है, किसी तरह का शारीरिक कष्ट नहीं है, कुछ सुख चैन में आ गया तो अब उसका विषयों में चित्त जाने लगा । जब यह कठिन विपत्ति में होता है तब तो विषय सुखों की ओर चित्त नहीं जाता, उन कठिन विपत्तियों में भी वह घबड़ाता नहीं है और उन विपत्तियों के दूर करने का ही उपाय करता है । जब वे विपत्तियां दूर हुई, व्याधियां खतम हुई तो उसका दिल अब चलने लगता है विषयों की और । विषयों की ओर उसका चित्त जाता है और उसके जो चित्त की अस्थिरता बनती है, चित्त कहीं ठिकाने सही जगह नहीं रह पाता, उस समय का रोग तो उस शरीर को वेदना से भी भयंकर रोग है मगर मोह के कारण वे इस बात का परिचय नहीं कर पाते । तो विषय सुखों का विवेचन आवश्यक है और उसकी औषधि है जिनवचन । जो स्वाध्याय में चित्त देता है, स्वाध्याय द्वारा नये-नये तथ्यों को जानता है उन तथ्यों को अपने आपके आत्मा में घटित करता है तो उसके समस्त विषय सुखों का वमन हो जाता है । फिर यह अपने को हल्का अनुभव करने लगता है ।

(62) जिनवचनपरमौषधसेवन से विषयसुख विरेचनपूर्वक जरामरणादिरोग का परिहार―अनेक पुरुष ऐसा कहने लगते है कि मुझ पर तो बहुत बड़ा बोझ है । अन्य लोगों को कुछ बोझ नहीं दिख रहा कि इस पर क्या बोझहैं । बल्कि टोपी तक का भी बोझ उसके सिर पर नहीं है लेकिन लोग कहते हैं कि मुझ पर बड़ा बोझ आ गया । तो बताओ वह किस चीज का बोझ है? वह बोझ है विषय सुखों की इच्छा का । विषय सुख के साधन मिलने की उसकी बड़ी वासना है और यह ख्याल आ गया कि अब विषय सुख के साधनों के मिलने में बड़ी कठिनाई होगी, बस उसका बोझ है इस जीव पर, अन्यथा कोई बोझ नहीं । यदि भीतर में विषय सुखों की वांछा नहीं है । अपने आपके सहज स्वरूप का अनुभव बन गया है और इस ही कारण जगत के समस्त पदार्थों से वह उदासीन है, ज्ञानानंदघन अंतस्तत्त्व की उपासना में ही उपयोग लगता है उस पुरुष पर काहे का बोझ? बोझ तो उन पर है जिनको अंतस्तत्त्व का अनुभव नहीं । जिन्होंने इस शरीर को ही माना कि यह मैं हूँ और इस ही खोंटी मान्यता के कारण शरीर को तुष्ट रखने का, शरीर की कीर्ति सुनने का, शरीर के नाते दूसरों को अपना मानने का उसके विकल्प जगने लगता है । जितने भी जगत के नाते हैं, वे सब शरीर के नाते से नाते हैं । यह शरीर जिसके शरीर मल से उत्पन्न हुआ वे माता पिता हैं । इस शरीर के मल से जो उत्पन्न हो जायेगा वह बेटा बेटी है । यह शरीर जिस उदर से उत्पन्न हुआ उसी उदर से जो शरीर उत्पन्न होता है वह इसका भाई है । इस शरीर को रमाने के लिए जो आश्रय पड़ गये हैं वे स्त्री पुरुष हैं, अन्य भी जितने रिश्ते आप देखेंगे डायरेक्ट, इन्डाइरेक्ट वे सब इस शरीर के नाते से हैं । जैसे बताओ फूफा के मायने क्या? शरीर जिस पुरुष के शरीरमल से उत्पन्न हुआ है वह पिता है ना? वह पिता का शरीर जिसके उदर से उत्पन्न हुआ उसी उदर से जो लड़की उत्पन्न हुई वह इसकी बुवा है, और उस बुवा के शरीर को रमाने वाले जो शरीर है वह फूफा है बताओ कौन सा ऐसा रिश्ता है जो आत्मा से संबंध रखता हैं? सारे रिश्ते इस शरीर से संबंध रखते हैं । सास मायने क्या? इस शरीर को रमाने वाला शरीर जिसके उदर से उत्पन्न हुआ वह सास । यों ही मौसी, नानी, दादी आदिक कोई भी रिश्ता ले लो, आपको शरीर के रिश्ते से सब रिश्ते मिलेंगे, वहाँ आत्मा के रिश्ते की बात रंच नहीं है । तो यह जीव इस शरीर के आश्रय से विषयसुख भोगना चाहता है वही दुःख है । तो जिन, वचन की औषधि पियें जिससे विषय सुखों का वमन हों जाये और जन्म, जरा, मरण आदिक रोग नष्ट हो जाये । यह ही परम औषधि सर्व दुःखों के क्षय का कारण है । इससे अगर कल्याण चाहते हो तो जिनवचनरूपी परम औषधि का पान करो ।


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