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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 18

From जैनकोष



जीवादी सद्दहणं सम्मतं जिणवरेहिं पण्णत्तं ।

ववहारा णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्मत्तं ।। 18 ।।

(102) व्यवहार और निश्चय से सम्यक्त्व का स्वरूप―अब तक यह बताते आये हैं कि सम्यक्त्व के बिना मोक्षमार्ग में गति नहीं है और इतना ही नहीं, सम्यक्त्वरहित होकर व्रत तप धारण करके भी इस जीव के यदि कुछ लोकेषणा रहा करती है, तो उसके कारण कुछ उल्टा ही फल भोगना पड़ता है । तो जिस सम्यक्त्व की इतनी महिमा कही गई कि सम्यक्त्व से निर्वाण का मार्ग मिलता है, सम्यक्त्व बिना संसार में रुलना पड़ता है, उस सम्यक्त्व को यह लक्षण कहा जा रहा है । जीवादिक 7 तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान होना सम्यक्त्व है, ऐसा जिनेंद्र देव ने व्यवहारनय से बताया है और निश्चयनय से देखा जाये तो यह आत्मा ही सम्यक्त्व है । सम्यक्त्व उत्पन्न होने में जो साधन चाहिए उन साधनों को सम्यक्त्व कहना व्यवहार है । तो जीवादिक 7 तत्त्वों का श्रद्धान बनाना यह सम्यक्त्व का साधन है । सम्यक्त्व क्या है? संकल्प विकल्प एक चैतन्यरस मय अंतस्तत्त्व का अनुभव यह है सम्यग्दर्शन । तो उस सहज अखंड अविकार चैतन्यमात्र का अनुभव किया जा सके उसके लिए यह अनादिकाल से कर्मों में उड़ने रुलने वाले पुरुष क्या करें, पहले कि जिससे सम्यक्त्व का लाभ ले सके । तो सर्वप्रथम तो ज्ञान को बताया गया है । जानकारी करें, मैं क्या हूं? पर क्या है, पर का मेरे साथ संबंध क्या है? यह संबंध किस तरह मिट सकता है? सम्यक्त्व होना मिट जाये और अकेला यह आत्मा रह जाये तो यह ही एक उत्कृष्ट आनंद की दशा है । तो इस ही बात को 7 तत्त्वों में दर्शाया गया है ।

(103) सात तत्त्वों में संसारविधि और मोक्षविधि के दर्शन की भूमिका―संसार कैसे हुआ और मोक्ष कैसे मिलेगा, यह बात 7 तत्त्वों के स्वरूप में पड़ी हुई है । कैसे हुआ संसार? जीव और अजीव इन दोनों का संबंध होने से संसार हुआ । जीव और कर्म ये दोनों कब से बँधे हैं? अब सोचिये कि कर्म बंधन है जीव के रागद्वेष विभाव का निमित्त पाकर और जीव के रागद्वेष भाव जगते हैं बँधे हुए कर्मों के उदय का निमित्त पाकर तो जो बँधे हुए कर्म हैं वे बंधे कैसे थे? जीव के विभावों का निमित्त पाकर । तो वे विभाव हुए किस तरह थे? बंधे हुए कर्मोदय का निमित्त पाकर । तो अब इस तरह पहले की बात सोचते जाइये, कोई कर्मबंध ऐसा नहीं है जो जीव के विभावों का निमित्त पाये बिना हो गया हो । और कोई जीव का विभाव ऐसा नहीं है जो कर्मोदय का निमित्त पाये बिना हो गया हो । तो एक बात कोई कह सकता क्या कि सबसे पहले क्या था? जीव के रागद्वेष थे या कर्मोदय था? या कर्मबंध था? सबसे पहले एक चीज क्या थी? जिससे पहले दूसरी बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता । तो यह कर्म संबंध इस जीव के साथ अनादि काल से चला आ रहा है और जीव का सत्त्व भी अनादि से है, जीव का परंपरा सत्त्व भी अनादि से है और जीव और कर्म का संबंध भी अनादि से है । एक कैसे कहा जाये? कोई इसका ही उत्तर देवे जो आज मनुष्य है वह बाप से पैदा हुआ और वह बाप? अपने बाप से, और वह बाप? अपने बाप से अब सोचते जाइये और कहते जाइये, क्या कोई बाप ऐसा भी मिलेगा जो बिना बाप के पैदा हो गया हो और यों ही उठ आया हो? न मिलेगा । तो इसका अर्थ यह ही तो हुआ कि यह परंपरा अनादि से चली आ रही है । पहले कुछ एक व्यक्ति था क्या कि जो किसी से पैदा न हुआ हो और उससे संतान चली हो? ऐसा कुछ नहीं है ।

(104) संसार की अनादिता व निमित्तनैमित्तिक भाव का निर्णय न होने से सृष्टिकर्ता के खोज की आवश्यकता का वातावरण―संसार के इस अनादिपने का निर्णय लोगों को झट ध्यान में नहीं आता तो अनेक कल्पनायें जग जाती है कि कोई पहले एक शक्ति थी, उसने सबको पैदा किया । जो लोग एक ईश्वर को समस्त जगत की रचना के फंद में डाल रहे हैं उसके कारण यह अनादिपने का निर्णय नहीं होता है, एक बात । दूसरी बात उपादान और निमित्त दृष्टि से जब कार्य विधि का निर्णय किया जाता है तो यह ही तो निर्णय होता है कि निमित्त सन्निधान में उपादान इन-इन सृष्टियोंरूप बन जाता है । तो सृष्टिरूप बना कौन? यह उपादान, और उसमें भी एक जीव का उदाहरण ले लीजिए, क्योंकि सब द्रव्यों में ज्ञाता द्रष्टा समर्थ जीवद्रव्य है, उसको जानने के कारण और उसके ही चमत्कार की बहुत बड़ी महिमा की जाती है । तो यह जीव किसने रचा? तो उत्तर आया कि जीवने अपने उपादान से अपने में अपनी सृष्टियां रची । ऐसे ही तो सब जीव हैं । अगर सबका ओघ उपादान देखा जाये तो एक समान चैतन्यमात्र हैं । सो दृष्टि में एक तरफ तो यह रख लिया कि चिन्मात्र तत्त्व यह दृष्टि का मूल है और यह बात भूल गए कि ऐसे अनंत चेतन हैं और उनका-उनका अपना-अपना उपादान अपनी सृष्टियों का कारण है । तो इस मूड में यह बात बैठ गई कि एक चैतन्य शक्ति सब सृष्टियों का कारण है ।

(105) संसारविधि―बतलाया यह जा रहा था कि इस चेतन का और कर्म का संबंध अनादि से चल रहा है वह निमित्तनैमित्तिकभावपूर्वक एक ही कर्म नहीं है उनकी संख्या अनंत है किसी न किसी का संबंध बना अनादि से है, क्योंकि कर्म की परंपरा अनादि से है । तो जीव और कर्म इन दोनों का जो संबंध है उसका नाम संसार है । जीव रागद्वेष करता है उसका निमित्त पा कर्मों का आस्रव होता है । कर्मों के आस्रव का अर्थ है कि जो कार्माण वर्गणायें विश्रसोपचयरूप में जीव के साथ लगी हैं उनमें कर्मपना आ गया, उससे पहले वह एक पुद्गल धूल जैसा था, कर्मपना न था । यद्यपि वे पुद्गल कार्माण जाति के ही थे; सभी पुद्गलों में कर्मरूपता न आती थी । जो दिख रहे चौकी भींत वगैरह ये कहीं कर्मरूप नहीं बन जाते? कार्माणवर्गणा जाति के ही पुद्गल कर्मरूप बनते हैं । सो जब तक कर्मरूप नहीं बने तब तक वे साधारण कर्म वर्गणायें थी; उनमें कर्मपना आया, इसी के मायने आस्रव हुआ ꠰ वे कर्मस्कंध जीव के एक-एक क्षेत्रावगाह में तो थे ही कहीं बाहर से नहीं खींचने पर, पर उनमें कर्मरूपता न थी और अब कर्मरूपता आयी तो इस ही का नाम कर्म का आना कहलाता है । तो जीव में कर्म आये सो आस्रव । आये तो है, पर ये कितने दिनों के लिए आये हैं और कितने समय तक जीव में ठहरेंगे, यह बात भी एक साथ पड़ी हुई है, तो जितने समय ठहरे उतनी स्थिति भी तुरंत बँध गई कि ये कर्म जीव में इतने समय तक ठहरे रहेंगे । यह स्थितिबंध हुआ और जो कर्म जीव में आये, बँधे उनमें फलदान शक्ति भी तो आयी याने कितना अनुभाग पड़ा है वहाँ कर्म में कर्म का स्वयं अनुभाग बंध जाता है । यह है अनुभाग बंध, और उन कार्माण स्कंधों का बनना सो यह ही हुआ प्रदेश बंध । इस तरह से बंध होता रहता है । जो कषायवान जीव है उसके कर्म का आस्रव आये और चला जाये तुरंत, ऐसा नहीं होता, आये तो बँधकर ही रहता है । यह तो है संसार । उस बँधे हुए कर्म का उदय हुआ, जीव दुःख पाने लगा, भाव बिगड़ते जाये, कर्म बँधते जायें, बस यह परंपरा चलती रहती है और उसके फल में जन्म लेता जाये, मरण करता जाये, यह भी परंपरा चली आयी है, इसके मायने है संसार ।

(106) मोक्षविधि―अब जिस जीव को यह पता हो जाता है कि यह संसार तो बड़े दुःख से भरा हुआ है, बाहर के संसार की बात नहीं कह रहे किंतु खुद जीव में जो विकारभाव आता है, कर्मोदय होता, जन्म मरण होता और इस प्रवाह में चलना पड़ता है यह है इस जीव का संसार । यह संसार तो बड़े दुःखों से भरा हुआ है ꠰ जिस जीव को यह पता पड़ जाये तो वह फिर मनन करता है कि यह संसार मिटे कैसे और निर्णय करता है कि जिस तरीके से संसार बना वह तरीका बदलना चाहिए, तब तो यह संसार दूर हो सकता है । वह तरीका क्या था? मोह रागद्वेष के भाव करना और उन भावों में रम जाना, यह अज्ञानी जीव का तरीका था इस तरीके को बदलें । यदि मुक्ति चाहते हो तो संसरण का तरीका बदलना चाहिए । तरीका बदला ज्ञानी जीव ने । भेदविज्ञान किया, यह मैं आत्मा चैतन्य मात्र हूँ और ये खटपट गड़बड़ यह कर्मरस का फोटो मात्र है, प्रतिफलन है, यह मेरा स्वरूप नहीं । मैं चूंकि स्वच्छ हूँ अतएव यहाँ कर्मविपाक झलकता है । जब यह भेद जाना और अपने आपके चैतन्यस्वरूप का ग्रहण हुआ तो उस काल फिर कर्मों का आना रुक गया । यहाँ भी जितने अंश में इस जीव ने अपने स्वरूप को ग्रहण कर स्वरूप में रमा उतने अंश में कर्म का सम्वर है, सबका नहीं है, पर उपाय एक यह ही है कि अपने स्वरूप को जानकर उस ही में स्थिरता से लीन होना यह ही कर्मों के निर्जरण का उपाय है । सो यह जीव कारण है । कर्म रुके और बँधे हुए कर्मों की निर्जरा हुई कि कोई समय ऐसा आयगा कि यह जीव कर्मरहित हो जायेगा । इस ही का नाम मोक्ष है ।

(107) व्यवहार सम्यक्त्व और निश्चयसम्यक्त्व का नैकट्य―ऐसे जीवादिक 7 तत्त्वों का श्रद्धान करना यह व्यवहार सम्यक्त्व है । देखिये―इतना ऊँचा ज्ञान और इतनी ऊँची रुचि भी चल रही फिर भी इसे व्यवहार सम्यक्त्व कहा है, क्योंकि निश्चय सम्यक्त्व में कोई विकल्प नहीं, कोई लहर नहीं आ सकती । कोई स्वच्छता वर्णन करेगा क्या? मैल का तो वर्णन किया जा सकता, पर स्वच्छता का कोई निरूपण क्या कर सकता? एक कमरे को बहुत स्वच्छ कर दिया, झाड़कर पानी डालकर खूब मलकर, अब कोई पूछता है कि तुमने कमरे को स्वच्छ कर दिया? कैसे स्वच्छ किया? उस स्वच्छता की बात बताने को शब्द नहीं हैं, किंतु इस तरह कहा जायेगा कि हमने झाड़ा, कूड़ा कचरा बाहर निकाला और पानी से साफ कर कूड़ा कचरा बिल्कुल धो दिया, इन ही शब्दों में वह स्वच्छता की बात कह सकेगा । तो ऐसे ही आत्मा की स्वच्छता का नाम सम्यग्दर्शन है । जो विपरीत अभिप्राय चल रहे थे वे सब दूर हो गए तो आत्मा में स्वच्छता आयी । अब उस स्वच्छता का कोई सही-सही वर्णन करके तो दिखावे । तो क्या है वह स्वच्छता? स्वच्छ आशय क्या बन गया? तो इसका प्ररूपण ‘खोटा आशय न रहा यह कहकर बन पाता है । यह जीव अब तक देह में आत्मबुद्धि मानता आया था, पर पदार्थ को अपनाता आ रहा था । वे सारे विकल्प अब धुल गए, जीव ऐसा स्वच्छ हो गया । कूड़ा करकट का वर्णन करना सरल है, पर स्वच्छता का वर्णन करना कठिन है । कोई स्वच्छता का वर्णन करे तो कूड़ा करकट का नाम लेकर ही कर पाता है । वहाँ कूड़ा करकट नहीं रहा । ऐसे ही सम्यग्दर्शन का स्वरूप कोई समझाना चाहे तो मिथ्यात्व की बात कह कर ही समझा पायगा । जैसे अब वहाँ रंच भी मिथ्या आशय नहीं रहा । अब वहाँ परपदार्थ विषयक कोई विकल्प नहीं रहा । केवल एक स्वच्छ अविकार निज चैतन्यस्वरूप का अनुभव हो रहा । तो यह है जीवादिक 7 तत्त्वों की बात । इसमें अभी विकल्प चल रहा है । बन तो रही समझ मगर भेद चल रहा है । तो जहाँ भेद हो उपयोग में वहाँ सम्यक्त्व का अनुभव नहीं तो यह भेद मिटा और अभेद अंतस्तत्त्व का अनुभव बना उससे सम्यग्दर्शन हुआ । तो जीवादिक 7 पदार्थों का श्रद्धान करना, सम्यक्त्व है । सो यह व्यवहार सम्यक्त्व है ।

(108) भूतार्थविधि से तत्त्वपरिचय की निश्चयसम्यक्त्व साधनता―अब इस सप्ततत्त्वश्रद्धान ही में और सुधार करियेगा । इन जीवादिक 7 तत्त्वों को भूतार्थ विधि से जानना सम्यक्त्व है, सो यह भी सम्यक्त्व का साधन है मगर यह बड़े निकट का साधन है । भूतार्थ से श्रद्धान करने के मायने क्या है कि जिस पदार्थ में जो परिणमन चल रहा है उस परिणमन को उस पदार्थ से हुआ निरखें और ऐसा एकत्व की और जाये कि वह परिणमन तो गौण हो जाये और जिससे परिणमन चला वह तत्त्व मुख्य हो जाये । यह कहलाती है भूतार्थ की कला । जैसे निरखा कि ये खोटे भाव जीव में हुए, ये जीव के परिणमन हो रहे हैं, तो वह जीव क्या है जिसके ये परिणमन हैं, उस पर दृष्टि जायेगी ना? द्रव्य पर दृष्टि जायेगी जैसे कोई कहे कि यह लड़का इसका लड़का है या पूछे कोई कि यह लड़का किसका है, तो बताता है कोई कि यह लड़का फलाने चंद का है तो अब लड़का गौण हो गया और फलाने चंद उसकी नजर में मुख्य हो गया ꠰ तो इसमें उस लड़के से अधिक प्रयोजन नही रहा जितना कि उसके पिता से प्रयोजनपना आया । तो ऐसे ही ये आश्रव परिणाम किससे हैं? किसके निकले हैं ? ऐसे प्रश्न का उत्तर पाने पर यह आस्रव और यह पर्याय गौण हो गई और फिर जीवद्रव्य उसके उपयोग में मुख्य बन गया । अब और आगे चले तो उस जीव द्रव्य का जो सहज स्वरूप है वह सहजस्वरूप मुख्य बना । ऐसे अपने आपके उस मूल एकत्व पर उपयोग जाये तो विकल्प हटते हैं, निर्विकल्प अनुभव बनता है वही सम्यग्दर्शन का प्रथम समय है । तो निश्चय से सम्यक्त्व क्या रहा ? वह आत्मा ही सम्यक्त्व है, क्योंकि अपने आत्मा का सहज स्वरूप का, इस अखंड अंतस्तत्त्व का भेद किए बिना, विकल्प किए बिना, कथन किए बिना, तरंग उठाये बिना एक अलौकिक अनुभूति बनी । वह अनुभूति आत्मा ही तो है । तो निश्चय से आत्मा ही सम्यक्त्व होता है ।


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