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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 23

From जैनकोष



अमराण बंदियाणं रूवं दट्ठूण सीलसहियाणं ।

जे गारवं करंति य सम्मत्तविवज्जिया होंति ।। 23 ।।

(118) अमरवंदित यथाजातरूप को देखकर गारव करने वालों की सम्यक्त्ववर्जितता―इस मनुष्यभव में ऊंचा पद तो अरहंत भगवान का है, पर अरहंत भगवान के बाद मुनियों का पद है । यह मुनियों का रूप यथाजात रूप है । जैसे―उत्पन्न हुआ बालक शरीर मात्र है ऐसे ही साधु के भी वह शरीर मात्र है, और यह साधुपद देवों और इंद्रों के द्वारा भी वंदनीय है । सांसारिक सुखों की दृष्टि से देव बहुत ऊँचे हैं ꠰ उनको श्वांस पखवाड़े में एक बार लेनी होती है । जिसको जितनी जल्दी श्वांस होती है वह तो बीमार माना जाता है, किसी को श्वांस आधा मिनट में आता है मनुष्यों में, किसी को पौन मिनट में । देवों का श्वांस किसी को 15 दिन में, किसी को तीन पखवारे में, किसी को दो पखवारे में एक बार श्वांस लेना होता है । इसी से अंदाज कर लो कि देवों में कितना सांसारिक सुख है । और भूख प्यास की वेदना तो हजार-हजार वर्ष में होती है । तो जैसे ही भूख की वेदना हुई कि कंठ से अमृत झड़ जाता है । वह अमृत क्या है ? जैसे हम आपका थूक है वैसा ही उनका भी कुछ है । तो इस दृष्टि से भी देखें तो देवगति में सांसारिक सुख विशेष हैं । उनको कोई धंधा नहीं करना पड़ता । वे खाली रहते हैं । तो जो अच्छे देव हैं वे धर्मचर्चा में अपना समय बिताते हैं और जो खोटे देव हैं वे ऊधमबाजी में अपना समय बिताते हैं । सांसारिक सुखों की दृष्टि से देवों में बहुत सुख है और इंद्रों की जिनकी सब पर हुकूमत चलती है ऐसे देव और इंद्र के द्वारा भी वंदनीक है साधुपद, मगर साधु साधु होना चाहिए । अत्यंत विरक्ता न किसी से राग, न किसी से द्वेष, न हँसी, कोई प्रकार का उनमें विकार नहीं होता, क्योंकि अरहंत के बाद का स्थान है । इसीलिए तो बताया है कि जो साधुपद रख ले और आत्मा में योग्य नहीं है तो वह मरकर लूला गूंगा होता है अथवा मरकर नरक निगोद में जाता है । जैसे पंचम काल में कितने करोड़ मुनि निर्ग्रंथ नरक में जाते हैं और केवल वे ही नहीं जाते, उन मुनियों के मानने वाले श्रावक भी नरक में जाते हैं, ऐसा आगम का वचन है ꠰

(119) शीलसहित यथाजातरूप का महत्त्व और उसका अनादर करने वालों का पतन―जो अरहंत के बाद का (पूर्व का) पद है वह तो बहुत निर्विकार निर्दोष होना चाहिए । उस पद में निरंतर आत्मदृष्टि है । जैसे बच्चों को निरंतर खेल ही रुचता है, वे बड़ी मुश्किल में भोजन करते हैं, उन्हें जबरदस्ती भोजन कराया जाता । कुछ पेट में खाना गया कि भूखे ही खेल खेलने लगते हैं, ऐसे ही मुनियों का आत्मा में ही ध्यान हैं, रुचि है, बहुत तेज भूख लगी तो यह ज्ञान विवेक ही उसे समझाता है कि अरे उठा लो, खा लो नहीं तो वे इतना विरक्त है कि भूख होने पर भी खाना उन्हें रुचता नहीं । उनको रुचता है आत्मध्यान, चर्चा करेंगे तो आत्मा की । दूसरी कोई चर्चा नहीं । असंयमी जनों से वार्ता भी नहीं करते । निषेध किया गया है, वे आपस में ही धर्मवार्ता करते है । और असंयमी जनों से सिर्फ उसी समय बात करने की आज्ञा है जब कि कोई विपत्ति पड़ी हो । कोई साधु मर गया हो या कोई बात हो तो असंयमी जनों से बात करेंगे । नहीं तो वार्तालाप भी नहीं है ꠰ ऐसे आत्मस्वरूप में रहने वाले योगी, उसका पद है अरहंत के बाद का पद । याने तीसरा पद । सो ऐसे मुनिजन देवों के द्वारा वंदनीय हैं । अब उनके स्वरूप को देखकर जो मुनि शील सहित है, अपने आत्मा के स्वभाव में जिनकी निरंतर दृष्टि रहती है ऐसे यथाजातरूप निर्ग्रंथ साधु के रूप की देखकर जो मनुष्य घमंड करता है, अविनय करता है वह पुरुष सम्यक्त्व से रहित होता है । यदि कोई साधु भी अन्य साधुवों का आदर न करें तो वह भी सम्यक्त्वरहित हो जाता । गृहस्थ भी हो, साधु का आदर न करे तो वह भी सम्यक्त्वरहित हो जाता है । अगर हो तो गया हो कोई बाह्य भेष में साधु, किंतु भीतर में न आत्मध्यान है, न आत्मसंयम है तो ऐसे साधु वंदनीय नहीं होते । इस बात को अब अगली गाथा में बताते हैं ।


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