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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 26

From जैनकोष



वंदमि तवसावण्णा सीलं च वंभचेरं च ।

सिद्धिगमणं च तेसिं सम्मत्तेण सुद्धभावेण ।। 26 ।।

(124) तपःश्रमणों को वंदना―अब साधु के संबंध में बहुत कुछ वर्णन करने के बाद उपसंहार रूप से आचार्यदेव इस गाथा में कहते हैं कि जो तप से सहित मुनि हैं उनको मैं वंदना करता हूँ । और उनके मैं शील की वंदना करता हूँ, उनके गुणों की वंदना करता हूँ, और जो इस प्रकार सम्यक्त्वसहित शुद्ध भाव से वंदना करता है साधु परमेष्ठी को, वह निर्वाण को पायेगा, और जो साधु परमेष्ठी तप, शील, गुण, ब्रह्मचर्य से युक्त हैं वे भी निर्वाण को पायेंगे । तप 12 प्रकार के बताये गए हैं―6 बाह्य तप और 6 अंतरंग तप । जिन तपों में मुख्यता पर पदार्थ के संयोग वियोग की होती हैं वे तप बाह्य कहलाते हैं ꠰ और जिन तपों में मुख्यता आत्मा के परिणामों की ही होती है वे अंतरंग तप कहलाते हैं । सो बाह्य तप और अंतरंग तप से सहित जो साधुजन हैं उनकी मैं वंदना करता हूँ, उनके तपश्चरण को भी वंदना करता हूँ । तप है इच्छा निरोध का नाम न इच्छावों का रोकना सही मायने में सम्यग्दृष्टि ज्ञानी के ही बन सकता है ꠰ वैसे अज्ञानी भी इच्छाओं को रोकता हैं मगर वह रोकता नहीं है किंतु दबाता है । जिसको यह बोध हो कि इच्छा औपाधिक परिणति है, कर्मों के उदय से होने वाला विकार है ꠰ इस इच्छा से मेरा संबंध क्या? मैं तो इससे निराला केवल ज्ञाता दृष्टा हूँ, ऐसी जिनको सुध है उन्होंने भीतर से ही इन इच्छाओं को मिटाया, इच्छावों की जड़ दूर कर दिया और जिसको इस अंतरंग तथ्य का पता नहीं सो भले ही कुछ बाह्य ज्ञान के कारण उपवास करे, गर्मी में तपश्चरण करे, किसी भी प्रकार का काय क्लेश करे उसकी इच्छायें मूल से नहीं मिटी किंतु इच्छायें दब गई । इच्छाओं को दूर किया है, धर्ममार्ग में चलने के लिए कदम यहां से उठाना चाहिए । मैं आत्मा केवल एक चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ, जिसका किसी दूसरी वस्तु से रंच भी संबंध नहीं है । सत्ता ही न्यारी-न्यारी है, संबंध कैसे? और, कर्मों के उदय से होने वाली जो मेरे में माया की छाया है, विभावों का प्रतिफलन है, कर्मरस की फोटो है वह भी मेरा स्वरूप नहीं है । वह औपाधिक है, उससे भी मैं निराला हूँ, ऐसी जिसको श्रद्धा है वही पुरुष इच्छाओं को मूल से नष्ट कर पाता है । तो इच्छा निरोध नामक तप सम्यग्दृष्टि के, अविकार आत्मस्वभाव के अभ्यासी के इस भगवंत आत्मा की उपासना में ही जिनकी धुन लगी हो उनके ही यह तपश्चरण हो पाता है । तो सही मायने में जिनको तप हुआ है ऐसे साधुवों की मैं वंदना करता हूँ ।

(125) शीलगुणवान आत्मरत साधुवों को वंदना―शीलवंत साधुवों की मैं वंदना करता हूं । शील मायने उत्तर गुण जैसे मूल गुण 28 हैं, उनमें कहीं यह नहीं आया कि गर्मी में पहाड़ पर बैठकर ध्यान लगाओ, ये बातें मूल गुण में नहीं हैं वे उत्तर गुणों में भी प्रवीण रहते हैं । तो शील मायने उत्तर गुण । रात्रि पद्मयोग । रात्रि भर खड़े रहें या पद्मासन से खड़े रहें, निद्रा न ले, लेटे नहीं, यह भी एक साधुवों का चारित्र है, मगर यह मूल गुण में नहीं है । मूल गुण न हो तो साधुता नहीं रहती, उत्तर गुण न हों तो वह उनकी प्रगति की कमी है मगर साधुपना नहीं मिटता । तो जो साधु शील में भी बड़े हैं, उत्तर गुणों में भी वृद्ध हैं, बढ़े चढ़े है उनको मैं वंदन करता हूँ, और गुण के मायने मूल गुण । साधु के जो 28 मूल गुण बताये हैं―5 महाव्रत, 5 समिति, 16 आवश्यक, 5 इंद्रिय का विजय और वस्त्र त्यागना, केशलोच करना, एक बार भोजन होना, खड़े-खड़े भोजन होना, दंतमंजन न करना, स्नान न करना, भूमि पर सोना आदि ये सब मूल गुण कहलाते हैं । इनके बिना साधुता नहीं रहती है । तो ऐसे मूल गुणों से युक्त साधुवों को मैं शुद्ध भावों से वंदना करता हूँ । ब्रह्मचर्य युक्त साधुवों की मैं वंदना करता हूँ । ब्रह्मचर्य के मायने आत्मस्वरूप में रम जाना । जिसे आत्मतत्त्व का अनुभव हुआ वह ही पुरुष तो उसमें रम सकता । तो यह भगवान आत्मा ही जिसकी दृष्टि में सतत रहता है वह कहलाता है ब्रह्मचर्यधारी । यहाँ सामान्य ब्रह्मचर्य की बात नहीं कह रहे, वह तो होता ही है, मगर आत्मा मे मग्न हो जाये, ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो, यह स्थिति आये, ऐसे ब्रह्मचर्यधारी साधुवों को शुद्ध भाव से मैं वंदन करता हूँ ।


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