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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 31

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कल्लाणपरंपरया लहंति जीवा विसुद्धसम्मत्तं ।

सम्मद्दंसणरयणं अग्घेदि सुरासुरे लोए ।। 31 ।।

(146) कल्याणपरंपरा से सम्यक्त्वलाभ व सम्यक्त्व से कल्याणपरंपरापूर्वक मुक्तिलाभ―निर्मल सम्यग्दर्शन होना यह एक ऐसा उत्तम रत्न है कि जिसके बल पर यह जीव कल्याण की परंपरा सहित उच्च पद को प्राप्त करता है । तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है । तो वहां यह आवश्यक नहीं है कि मुनि हो सो वह तीर्थंकर प्रकृति का बंध करे । इतना तक भी आवश्यक नहीं है कि वह श्रावक की 11 प्रतिमा में हो तब तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर सके । सम्यक्त्व चाहिए । अविरति सम्यग्दृष्टि चौथे गुणस्थान वाला मनुष्य भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लेता है । तो सम्यक्त्व भी निर्मल हो और साथ ही समस्त जीवों के कल्याण की भावना हो तो तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है । जो जैसा परिणाम करता है उस-उस प्रकार से उसका भवितव्य बनता है । चूंकि तीर्थंकर प्रकृति के बँधते समय लोक कल्याण की भावना थी तो अब तीर्थंकर प्रकृति के उदय होने पर लोककल्याण होता रहता है । खोटे भाव कोई करे तो खोटी बात उसके सामने आती है और भली बात करे कोई तो भली बात सामने आती है ।

(147) भावानुसार कर्मबंध व कर्मोदयानुसार देहरचना―कर्म 8 प्रकार के हैं और प्रत्येक के अनेक प्रकार हैं सो शास्त्र में 148 भेद बताये गए हैं मगर ये 148 ही नहीं हैं, असंख्यात हैं, अनगिनते हैं । जैसे पंचेंद्रिय जाति और मनुष्यगति का उदय होने पर मनुष्य हुए मगर उसके अंगोपांग नामकर्म है एक, उसके उदय से अंग हुए, नाक है, कान हैं, मुख है, ये सब बने, मगर एक की नाक लंबी, एक की ऊँची, एक की चपटी,....यों जितनी भी नाकें हैं उन सबमें भेद है । उतने ही उन कर्मप्रकृतियों में भेद हैं । उतनी ही बात नहीं, कान, नाक, हाथ, पैर, एक के एक से नहीं मिलते, कुछ न कुछ फर्क है, तो ऐसा फर्क होना उस-उस प्रकार की प्रकृति का उदय है तो ये कितने फर्क आप पहिचान सकते? कोई गिनती न बन सकेगी । अनगिनते फर्क है मनुष्य ही मनुष्य में, तो इतनी तरह के तो नामकर्म हो गए, अब गुणविकास की बात देखो―एक में कम ज्ञान, एक में अधिक ज्ञान, एक में उससे अधिक ज्ञान अथवा एक में प्रेम, एक में द्वेष, कम प्रेम, अधिक प्रेम, यों कितनी ही तरह की बातों में अंतर देखा जाता है । ये अंतर स्वभाव से तो होते नहीं कि जीव अपने स्वभाव से अंतर डाल लेता हो । यह अंतर उपाधि के संबंध से होता है । तो जितना आपको अंतर नजर आया उतनी ही आपकी कर्म उपाधि है । तो जीव जैसे भाव करता है उस प्रकार के कर्म का बंध करता है ꠰

(148) सम्यक्त्व और विश्वकल्याण भावना का फल तीर्थंकरत्व―जिन्होंने सम्यक्त्वसहित होकर सर्व जीवों के कल्याण की भावना की उन्हें तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता और पंचकल्याणक उनको प्राप्त होता । तो जिसके निर्मल-सम्यक्त्व है वह कल्याण की परंपरा सहित तीर्थंकर न हो तो और तरह के वैभव सुख मिलें, उनकी परंपरासहित यह प्रगति करता है । अथवा जो कल्याण है, उपाय है, साधन हैं उनके उपाय से यह विशुद्ध सम्यक्त्व को पाता है । वह सम्यग्दर्शन देव, सुर असुर इंद्रादिक के द्वारा पूज्य है । सम्यग्दर्शन से युक्त कोई छोटी जाति का भी मनुष्य हो वह भी देवों द्वारा पूज्य होता है । तो वहाँ भी वह मनुष्य नहीं पूजा गया, किंतु सम्यग्दर्शन ही पूजा गया । ऐसा सम्यग्दर्शन रत्न ही इस पुरुष को सारभूत है । अन्य किसी भी बाह्य पदार्थ का महत्त्व चित्त में न लावे, एक सम्यक्त्व का ही महत्त्व चित्त में लावें ।


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