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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 33

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विहरदि जाव जिणिंदो सहसट्ठसुलक्खणेहिं संजुत्तो ।

चउतीसअइसयजुदो सा पडिमा थावरा भणिया ।। 33 ।।

(156) प्रभुविहार की विशेषता―सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के प्रताप से यह जीव अरहंत परमात्मा होता है, तीर्थंकर परमात्मा होता है । तो तीर्थंकर हुए बाद, केवलज्ञानी हुए बाद उनके भव्यों के उपकार के लिए विहार होता है । प्रभु नहीं यह विचार करते हैं कि मैं इस जगत के जीवों का कल्याण करूँ, यहाँ चलूं । वे तो अब वीतराग हो गए । यह भाव उन्हें पहले रहा था विश्वकल्याण का और उसी का निमित्त पाकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध हुआ था अब तो वह वीतराग हैं और ऐसा मालूम पड़ता है जैसे कि स्थावर प्रतिमा हो । मायने जैसे प्रतिमा किसी से कुछ बोलती नहीं क्योंकि उसे किसी से राग नहीं । राग तो चेतन के साथ आता है, उस अचेतन पदार्थ में राग कहां । राग पहले था प्रभु में मगर अब मिट गया, वीतराग बन गए । तो वीतराग होने पर ऐसा लगता कि जैसे संसारी जीवों में पायी जाने वाली हलन-चलन क्रिया, संज्ञा, चेतन इनसे निराला है । वहाँ देव और इंद्र उनकी भक्ति में बहुत बड़े-बड़े अतिशय करते हैं । सो अतिशय सहित वीतराग सर्वज्ञ सकल परमात्मा होते हैं । उनका विहार वहाँ होता है जहाँ के भव्य जीवों का अच्छा भाग्य होता है । सो विहार भी होता है और समय पर उनकी दिव्यध्वनि भी खिरती है सो ऐसा समझिये कि जैसे बादल भी तो चलते हैं और गरजते भी हैं, पर उन बादलों में कोई संकल्प या राग नहीं होता कि मैं चलूं या गरजूं, मगर होती तो ये दो बातें मेघों में भी ऐसे ही अरहंत भगवान में संकल्प न होने पर भी राग विचार नहीं आते, ऐसा विहार होता है और दिव्यध्वनि खिरती है, तो उसमें कारण जीवों का भाग्योदय है ।

(157) सुलक्षणसंयुक्त प्रभु का जगत पर उपकार―ये जिनेंद्रदेव जो―1008 लक्षणों से सहित हे, जैसे कि प्रतिमाओं में दिखता है कि वक्षस्थल पर बीच में एक निशान उभरा हुआ रहता है, वह उन सब लक्षणों में प्रधान लक्षण है ऐसे ही अनेक लक्षण पैर में, हाथ में, सिर में, अंग-अंग में अनेक शुभ लक्षण होते है और इसके अतिरिक्त ज्ञानविषयक तो कितने ही लक्षण बताये जायें । इन सब लक्षणों से युक्त अरहंत जिनेंद्र 34 अतिशयों से सहित जब तक विहार करते हैं तब तक वे मानो स्थावर प्रतिमा ही हैं, क्योंकि किसी से बातचीत वे करते नहीं, इन सब प्रसंगों में चाहे मोटा राग न हो पर कोई छोटा सूक्ष्म राग कारण है जो मात्रा अक्षर बदल-बदलकर बोला जाता है । ये अरहंत प्रभु कब तक विहार करते हैं । जब तक कि ये अपना योग निरोध नहीं करते ꠰ जैसे किसी के अरब खरब वर्ष की आयु है, अरहंत होने पर भी, तो वे अरब खरब वर्षों तक विहार करते रहते हैं, समवशरण की रचना होती है, दिव्यध्वनि खिरती है ।

(158) प्रभु का योगनिरोध व मुक्तिलाभ―कुछ समय शेष रहने पर कोई 15 दिन शेष रहने पर, कोई और कम बढ़ शेष रहने पर योग का निरोध करते हैं मायने विहार दिव्यध्वनि आदिक ये सब बंद हो जाते हैं, यह कहलाया स्थूलनिरोध। एक ही जगह आसन से रह गए, जरा भी हिले डुले नहीं, इतने पर भी भीतर में प्रदेशों का योग चलता रहता है सो यह योग धीरे-धीरे नष्ट होता है। मनोयोग नष्ट हुआ, फिर वचनयोग नष्ट हुआ, श्वासोच्छ̖वास दूर हुआ, ये सब योग में आते हैं, निरोध होता है, ऐसा फिर औदारिक काययोग रह गया और उनका समुद्घात होना हो तो औदारिक मिश्र, फिर कार्माण काययोग, फिर औदारिक मिश्र, फिर कार्माण काययोग में आ गया, उसके बाद सूक्ष्मयोग का भी निरोध होता है । तब वहाँ तीसरा शुक्लध्यान जगता है, इसे कहते हैं सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती ꠰ उस ध्यान से, उस योग से कोई मन से ध्यान नहीं करता। कोई कोशिश नहीं है, ध्यान भी कुछ नहीं है। मगर कर्मों का निर्जरण देखकर उसको ध्यान कहते हैं । उसके बाद अयोगकेवली होता है और फिर सिद्ध हो जाता है। तो वे सकल परमात्मा वीतराग होने के कारण ऐसा दर्शनीय हैं कि चेष्टा की ओर से तो थावर प्रतिमा की तरह लगते और भीतर गुणविकास की ओर से वे सारे लोकालोक के जाननहार हैं। वे परमात्मा वंदनीय हैं। अब इस दर्शनपाहुड में अंतिम गाथा में यह बताते हैं कि जीव कर्म का नाश कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं꠰


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