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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:दर्शनपाहुड - गाथा 5

From जैनकोष



सम्मत्तसलिलपवहो णिच्चं हियए पचट्टए जस्स ।

कम्मं वालुयवरणं बंधुच्चिय णासए तस्स ।। 5 ।।

(30) सम्यक्त्वसलिल प्रवाह से कर्मरज का नाश―जिसके हृदय में सम्यक्त्वरूपी जल का प्रवाह निरंतर प्रवर्तमान होता है उस जीव के कर्मरज ऐसा नष्ट हो जाता है कि पूर्व में बद्ध भव-भव के कर्म भी दूर हो जाते हैं । कर्म क्या चीज हैं? एक पौद्गलिक वर्गणायें हैं, धूल क्या चीज है? पौद्गलिक वर्गणायें है, धूल मिट्टी जैसी चीज है,? कार्माण वर्गणायें सूक्ष्म चीज हैं । जो कार्माण वर्गणायें कर्मरूप बन जाती हैं वे सब अभी से ही इस जीव के साथ लगी हुई हैं, कहीं बाहर से नहीं लानी पड़ती कि ये कर्म बंध जाये, किंतु जीव के ही साथ विश्रसोपचय लगे हुए हैं । विश्रसोपचय का अर्थ है―विश्रसा उपचय, स्वभाव से ढेर, याने वे कार्माण वर्गणायें स्वभाव से ही लगी हुई हैं, ऐसी उनकी आदत है, जितने कर्मरूप पुद्गल बंधे हुए हैं उससे अनंत गुण से विश्रसोपचय जीव के साथ लगे हुए हैं । जीव ने कषाय किया कि तुरंत वह कर्मरूप हो जाती है । कोई पुरुष सोचे कि मैं अकेले ही अकेले पाप कर रहा हूँ, मेरे को कोई देखने वाला नहीं है इस कारण मुझे कुछ नुक्सान नहीं, मगर नुक्सान क्या दिखने से होता है? कार्माण वर्गणायें तो जीव के साथ सदा लगी हुई हैं संसार में । जहाँ ही जीव ने कषाय किया वहाँ वह कर्मरूप हो जाती है । इस बात को कौन टाल सकता है? इससे सदा यह ध्यान रखना कि यदि मैं खोटे भाव करूँ तो तुरंत ही मेरे विश्रसोपचय कर्मरूप हो जायेंगे । तो जो जीव के साथ कर्म लगे हैं वे हैं धूल माफिक, इसी कारण धूल का आवरण है यह समझिये । जीव के साथ कर्मरज का आवरण है । जैसे धूल बिखर जाये ऊपर, तो प्रकाश कम हो जाता है ऐसे ही कर्मरज जब जीव के साथ बँधी है तो इसके ज्ञानसूर्य का प्रकाश कम हो जाता है । मिटता नहीं है । जैसे दिन में कितने ही बादल सूर्य के आड़े आये फिर भी उसका कुछ आभास रहता कि यह दिन हैं, बिल्कुल रात नहीं मालूम होती, ऐसे ही इस आत्मा के आड़े कितने ही कर्म आये तो भी इसका ज्ञान पूरा नहीं मिटता, आभास रहेगा । जहां जीव एकेंद्रिय हो, निगोद हो वहाँ भी इसका ज्ञान पूरा मिटा नहीं । स्वभाव कभी मिटता नहीं, और इस ज्ञान का तो कुछ न कुछ प्रकाश सदा रहता है ।

(31) कर्मबंधविधान―जैसे ही जीव ने कषाय किया वैसे ही जीव के साथ लगे हुए विश्रसोपचय कर्मरूप बँध जाते हैं । अब ये कर्म बँध गए । बँधने के साथ ही इन कर्मों में आदत भी बँध गई कि यह कर्म इस प्रकार के फल का निमित्त है या इस प्रकार की इसमें आदत हो गई, उसमें स्थिति भी बन गई कि ये कर्म इस जीव के साथ इतने समय तक रहेंगे । उसमें अनुभाग भी बंध गया कि ये कर्म इतनी डिग्री का फल देने वाला होगा, और उसमें परमाणु तो हैं ही, तो ऐसे ही, बँधे हुए कर्म जब अपने काल में उदय में आते हैं या किसी कारणवश कर्मों की उदीर्णा होती है अर्थात् स्थिति से पहले ही वे फल देने लगते हैं तो उस समय इस जीव के उपयोग में उनकी झाँकी होती है, इस जीव का भाव बिगड़ता है, जहाँ जीव का भाव बिगड़ा कि नवीन कर्मों का आस्रव होता है । आस्रव के मायने क्या है? आना । पर ऐसा आना नहीं कि कोई दूर से दौड़कर आये, किंतु चूकर आना । जैसे पहाड़ में से पानी चूकर आता है अथवा जैसे बरसात में छत के नीचे बूंद सी हो जाती हैं ऐसा चूकर आने का नाम है आस्रव । तो चूकर आना तब ही होगा जो उस जगह पड़ा हुआ हो । तो ये कर्म के विश्रसोपचय इस आत्मा के प्रदेशों में पड़े हुए हैं, जब जीव के भाव खोटे होते हैं तो वे कर्मरूप बन जाते हैं, ऐसे ये क्लेश के कारणभूत कर्म परमाणु स्कंध हैं ।

(32) कर्मधूलि धुलने का मंत्र―ये बद्ध कर्मरज कैसे मिटेंगे? कैसे बहेंगे? यह कर्मधूल सम्यक्त्वरूप जल के प्रवाह से धुलेगी । पानी का प्रवाह होता है तो धुल बह जाती है । कमरे में धुल बहुत आ गई हो तो उसे थोड़ा झाड़ते भी हैं, बाद में पानी से उसे बहाते हैं, तब फर्श बिल्कुल साफ हो जाता है, तो ऐसे ही आत्मा में बँधी हुई यह कर्मरज सम्यक्त्वरूपी जल के प्रवाह से धोयी जा सकती है । तो जिसके हृदय में सम्यक्त्वजल का प्रवाह बह रहा है उनकी भव-भव की बांधी हुई कर्मरज भी धुल जाती है । कितने ही दिन की धूल पड़ी हो कमरे में तो जल के प्रवाह से उसे बहा दिया जाता है ऐसे ही ये कितने ही भवों के कर्म बँधे पड़े हुए हैं, सम्यक्त्व जल के प्रवाह से वे सब कर्म बहा दिए जाते हैं । सम्यक्त्व का प्रवाह भी कहीं बाहर से नहीं आता है । अपने आपके सहजस्वभाव की दृष्टि हो, प्रतीति हो, अनुभूति हो तो यह ही सम्यक्त्व जल का प्रवाह है । अपना प्रयत्न यह होना चाहिए कि हम अपने को अधिकाधिक क्षण ऐसा अनुभव करें, ऐसा, मनन करें कि मैं तो स्वयं सहज अपने आप अपने ही स्वरूप के कारण केवल एक चैतन्यमात्र हूँ, जिनमें विकार का कोई प्रसंग नहीं । इस स्वरूप में कोई विकार नहीं है ꠰ उसका तो एक शुद्ध चैतन्यस्वरूप है । समस्त परभावों से विविक्त है ।

(33) कर्मोदय का प्रतिफलन―विकार तो कर्मरस की फोटो है, छाया प्रतिफलन है, वह मेरा स्वरूप नहीं । मैं तो शुद्ध जाननहार हूँ, इस तरह अपने आपको जिसने ग्रहण किया उसने क्या पाया? उसने वह तत्त्व पाया कि जिसकी तुलना तीन लोक के वैभव से भी नहीं हो सकती । क्या करेगा तीन लोक का वैभव? वह तो पड़ा है अपनी जगह, कोई सुख तो नहीं देता वैभव । भोगने के प्रसंग में भी जो सुख होता है वह वैभव से आया हुआ सुख नहीं है, किंतु अपने में बसा हुआ जो आनंदगुण है उस आनंदगुण के विकास का सुख है । वह विकास विकृत है इसलिए सुख कहलाता है । यदि यह विकास विकाररहित हो तो इसी को अनंत आनंद कहते हैं । मेरा सुख किन्हीं बाहरी पदार्थों से नहीं मिलता, किंतु मेरे ही ज्ञान में उस प्रकार की बात उठी कि जिससे सुख का अनुभव किया ꠰ यहाँ भी देखा जाता है कि मानो किसी धनिक का कोई व्यापार कलकत्ता में चल रहा है, उसे किसी तरह खबर मिल जाये । चाहे झूठमूठ ही मिले कि इस बार व्यापार में 5 लाख का फायदा हुआ तो यह यहाँ दुःख की स्थिति में रहता हुआ भी अपने को सुखी अनुभव करता है और मानो हुआ हो तो फायदा और तार में उल्टी समझ बन जाये कि इस वर्ष व्यापार में 5 लाख की हानि हुई तो यह सुख की स्थिति में रहता हुआ भी अपने को दुःखी अनुभव करता है । तो भाई यह धन-संपदा किसी को सुख दुःख नहीं देता, किंतु सारा सुख दुःख जीव की कल्पना पर निर्भर है । इसी कारण वे पुरुष धन्य हैं । जिनका ऐसा सत्संग हुआ वहाँ अटपट कल्पनायें ही न जगें, जहाँ ज्ञानानंदमय आत्मतत्त्व का ध्यान रहे । मैं स्वयं आनंदस्वरूप हूँ, मेरे में रंच भी कष्ट नहीं है, दूसरे जीव अज्ञान से दुःखी हो रहे हैं । तो अज्ञान से दुःखी होने वाले को दुःखी देखकर अपने आप पर मोह का भार क्यों चढ़ाया जा रहा है? घर में रहने वाले जीव उतने ही जुदे हैं जितने कि जगत् के अनंते जीव जुदे हैं । रंच भी संबंध नहीं है, अज्ञान के वश होकर अनंते जीव दुःख पा रहे हैं । उनके दुःख से यह मोही दुःखी नहीं है, पर जिनको मान लिया कि ये मेरे हैं उनको दुःख होवे तो यह स्वयं दुःखी हो जाता है ꠰ इसका कारण क्या है? दया नहीं, किंतु मोह । ऐसी दया को तो मोह बताया गया है । जो उपेक्षा के योग्य हैं । उन पदार्थों में करुणा बसायी जायेगी तो वह मोह है । करुणाबुद्धि होती हो तो सब पर क्यों नहीं होती? केवल दो चार जीवों पर ही क्यों होती? उसका कारण है मोह । तो जहाँ मोह नहीं रहता, स्वतंत्र-स्वतंत्र सत्ता का परिचय हो जाता हैं और अपने आनंदस्वरूप आत्मा का अनुभव हो जाता है वहां सम्यक्त्व प्रकट होता है । जहाँ ऐसा आशय है, यथार्थ अभिप्राय है वहाँ पर कर्मरज बह जाता है । वह जमकर नहीं रह सकता । पौरुष होना चाहिए तो अपने स्वभाव की दृष्टि का पौरुष हो, और यही सच्चा रक्षाबंधन है । इस बाहरी रक्षाबंधन में क्या रखा है? आत्मा की जिस दृष्टि के द्वारा रक्षा हो सकती है उस दृष्टि को बांधना, उस दृष्टि में रहना, यह ही आत्मा की सच्ची रक्षा कहलाती है ।


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