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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 12

From जैनकोष



समणा अमणा णेया पंचेंदिय णिम्मणा परे सव्वे ।

वादर सुहमे इंदी सव्वे पज्जत्त इदरा य ।।12।।

अन्वय―पंचेंदिय समणा अमणा णेया, परे सव्वे णिम्मणा, एइंदी वादर सुहमे, सव्वे पज्जत्त य इदरा ।

अर्थ―पंचेंद्रिय जीव समनस्क (संज्ञी) और अमनस्क (असंज्ञी) के भेद से दो प्रकार के हैं । बाकी और जीव याने द्वींद्रिय, त्रींद्रिय व चतुरिंद्रिय जीव असंज्ञी हैं । एकेंद्रिय जीव भी असंज्ञी हैं और वादरसूक्ष्म के भेद से दो प्रकार के हैं । ये सब सातों प्रकार के जीव याने वादरएकेंद्रिय, सूक्ष्मएकेंद्रिय, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिंद्रिय, असंज्ञी पंचेंद्रिय और संज्ञीपंचेंद्रिय ये सब पर्याप्त हैं और अपर्याप्त हैं । इस प्रकार ये 14 जीवसमास हैं ।

प्रश्न 1―पर्याप्त किसे कहते हैं ?

उत्तर―जिनके पर्याप्तिनामकर्म का उदय है उन्हें पर्याप्त कहते हैं ।

प्रश्न 2―पर्याप्तिनामकर्म किसे कहते हैं ?

उत्तर―जिस नामकर्म के उदय से जीव अपने-अपने योग्य 6,5 या 4 पर्याप्तियों को पूर्ण करे उसे पर्याप्तिनामकर्म कहते हैं ।

प्रश्न 3―अपर्याप्त किसे कहते हैं ?

उत्तर―जिनके अपर्याप्तिनामकर्म का उदय है उन्हें अपर्याप्त कहते हैं ।

प्रश्न 4―अपर्याप्तिनामकर्म किसे कहते हैं ?

उत्तर―जिस नामकर्म के उदय से जीव अपने-अपने योग्य पर्याप्तियों को पूर्ण न कर सके और मरण हो जाये उसे अपर्याप्तिनामकर्म कहते हैं ।

प्रश्न 5―पर्याप्त, अपर्याप्त की इस व्याख्या से तो जिनके पर्याप्तिनामकर्म का उदय है वे पूर्वभव के मरण के बाद विग्रहगति में और जन्म के पहिले अंतर्मुहूर्त में भी अपर्याप्त न न कहलावेंगे ?

उत्तर―जिनके पर्याप्तिनामकर्म का उदय है वे जीव विग्रहगति में व जन्म के पहिले अंतर्मुहूर्त में निर्वृत्यपर्याप्त कहलाते हैं ।

प्रश्न 6―निर्वृत्यपर्याप्ति किन्हें कहते हैं ?

उत्तर―जिन जीवों के अपने-अपने योग्य पर्याप्तियां पूर्ण तो अवश्य होनी हैं और पूर्ण होने से पहिले उनका मरण भी नहीं होना, किंतु जब तक उनकी शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तब तक वे निर्वृत्यपर्याप्त कहलाते हैं ।

प्रश्न 7―अपर्याप्त शब्द से यहाँ किन अपर्याप्तों का ग्रहण करना चाहिये ?

उत्तर―यहाँ जिनके अपर्याप्तिनामकर्म का उदय है वे अपर्याप्त, जिनका दूसरा नाम लब्धपर्याप्त है और निर्वृत्यपर्याप्त दोनों अपर्याप्तों का ग्रहण करना चाहिये ।

प्रश्न 8―पर्याप्ति कितनी होती है ?

उत्तर―पर्याप्ति 6 होती हैं―(1) आहारपर्याप्ति, (2) शरीरपर्याप्ति, (3) इंद्रिय पर्याप्ति, (4) श्वासोच्छ᳭वासपर्याप्ति, (5) भाषापर्याप्ति, (6) मनःपर्याप्ति ।

प्रश्न 9―आहारपर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―एक शरीर को छोड़कर नवीन शरीर के साधनभूत जिन नोकर्मवर्गणावों को जीव ग्रहण करता है उनको खल व रस भागरूप परिणमावने की शक्ति के पूर्ण हो जाने को आहारपर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 10―शरीरपर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―गृहीत नोकर्मवर्गणावों के स्कंध में से खल भाग का हड्डी आदि कठोर अवयव रूप तथा रसभाग को खून आदि द्रव अवयवरूप परिणमावने की शक्ति की पूर्णता को शरीरपर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 11―इंद्रियपर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―गृहीतनोकर्मवर्गणाओं के स्कंध में से कुछ वर्गणाओं को योग्य स्थान पर द्रव्येंद्रियों के आकार परिणमावने की शक्ति की पूर्णता को इंद्रियपर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 12―श्वासोच्छ᳭वासपर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―उन नोकर्मवर्गणावों के कुछ स्कंधों को श्वासोच्छ᳭वासरूप परिणमावने की शक्ति की पूर्णता को श्वासोच्छ᳭वासपर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 13―भाषापर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―वचनरूप होने योग्य भाषावर्गणाओं को वचनरूप परिणमावने की शक्ति की पूर्णता को भाषापर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 14―मन:पर्याप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर―द्रव्यमनरूप होने योग्य मनोवर्गणावों को द्रव्य-मन के आकार रूप परिणमावने की शक्ति की पूर्णता को मन:पर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 15―संज्ञी जीवों के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―संज्ञी जीवों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं ।

प्रश्न 16―असंज्ञी पंचेंद्रिय जीव के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―असंज्ञी पंचेंद्रिय जीव के मन:पर्याप्ति को छोड़कर शेष की पाँच पर्याप्तियां होती हैं ।

प्रश्न 17―चतुरिंद्रिय जीव के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―चतुरिंद्रिय जीव के आहार, शरीर, इंद्रिय, श्वासोच्छ᳭वास व भाषा पर्याप्ति ये 5 पर्याप्तियां होती हैं ।

प्रश्न 18―त्रींद्रिय जीव के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―त्रींद्रिय जीव के भी मनःपर्याप्ति को छोड़कर बाकी पांचों पर्याप्तियाँ होती हैं ।

प्रश्न 19―द्वींद्रिय जीव के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―द्वींद्रिय जीव के भी मन:पर्याप्ति के बिना शेष पांचों पर्याप्तियां होती हैं ।

प्रश्न 20―एकेंद्रिय जीवों के कितनी पर्याप्तियां होती हैं ?

उत्तर―वादर और सूक्ष्म दोनों प्रकार के एकेंद्रियजीवों के आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इंद्रियपर्याप्ति और श्वासोच्छ᳭वासपर्याप्ति ये 4 पर्याप्तियां होती हैं ।

प्रश्न 21―चौदह जीवसमासों के पूरे-पूरे नाम क्या हैं ?

उत्तर―चौदह जीव समासों के नाम इस प्रकार हैं―(1) वादर एकेंद्रिय पर्याप्त, (2) वादर एकेंद्रिय अपर्याप्त, (3) सूक्ष्म एकेंद्रिय पर्याप्त, (4) सूक्ष्म एकेंद्रिय अपर्याप्त, (5) द्वींद्रिय पर्याप्त, (6) द्वींद्रिय अपर्याप्त, (7) त्रींद्रिय पर्याप्त, (8) त्रींद्रिय अपर्याप्त, (9) चतुरिंद्रिय पर्याप्त, (10) चतुरिंद्रिय अपर्याप्त, (11) असंज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त, (12) असंज्ञी पंचेंद्रिय अपर्याप्त, (13) संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त, (14) संज्ञी पंचेंद्रिय अपर्याप्त ।

प्रश्न 22―इन 14 प्रकार के जीवसमासों में से कौनसा भेद उपादेय है ?

उत्तर―इनमें से एक भी प्रकार उपादेय नहीं है, क्योंकि ये सब विकृत पर्यायें हैं और इनका आकुलतावों से जन्म है, आकुलतावों की जनक हैं ।

प्रश्न 23―तब कौनसी अवस्था उपादेय है ?

उत्तर―अतीत जीवसमास की अवस्था उपादेय है, क्योंकि वहाँ आत्मा संपूर्ण गुण स्वाभाविक पर्यायपरिणत हो जाते हैं, अत: वह अवस्था सहज अनंतआनंदमय है ।

प्रश्न 24―अतीत जीवसमास होने का उपाय क्या है ?

उत्तर―जीवसमास से पृथक् अनादि अनंत निज चैतन्यस्वभाव की उपासना अतीत जीवसमास होने का बीज है ।

इस प्रकार संसारी जीवों का जीवसमास द्वारा विवरण करके अब इस गाथा में मार्गणा व गुणस्थानों का वर्णन करके नयविभाग से शुद्धता व अशुद्धता का विभाग बताते हैं―


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