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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 27

From जैनकोष



जावदियं आयासं अविभागी पुग्गलाणुवट्टद्धं ।

तं खु पदेसं जाणे सव्वाणुट्ठाणदाणरिहं ।।27।।

अन्वय―जावदियं आयासं अविभागी पुग्गलाणुवट्टद्धं खु तं सव्वाणुट्ठाणदाणरिहं पदेसं जाणे ।

अर्थ―जितना आकाश अविभागी पुद्गल परमाणु के द्वारा अवष्टव्ध याने रोका जाता है, घेरा जाता है निश्चय से उसे सब परमाणुवों को स्थान देने में समर्थ प्रदेश जानो ।

प्रश्न 1―अखंड आकाश में प्रदेशविभाग करना कैसे बन सकता है?

उत्तर―अखंड आकाश का भाव यह है कि यह एक द्रव्य है, है निःसीम विस्तृत । परंतु यह बताओ कि एक पुरुष के दोनों हाथ के अवस्थान का क्षेत्र भिन्न है या वही एक है । एक तो है नहीं, प्रत्यक्ष ही मालूम होता । भिन्न है, तो यही तात्पर्य हुआ कि अविभागी आकाश द्रव्य में विभागकल्पना बन गई ।

प्रश्न 2―आकाश के छोटे से क्षेत्र पर कितने द्रव्य रह सकते हैं?

उत्तर―अंगुल के असंख्यातवें भाग क्षेत्र पर अनंत तो जीव और उससे अनंतानंत गुणे पुद्गल व असंख्यात कालद्रव्य रह जाते हैं । धर्म, अधर्म तो लोकव्यापी है ही ।

प्रश्न 3―आकाश के एक प्रदेश पर कितने द्रव्य रह सकते हैं?

उत्तर―आकाश के एक प्रदेश पर अनंत परमाणु के पुंजरूप सूक्ष्मस्कंध व अनंत परमाणु ठहर सकते हैं ।

प्रश्न 4―फिर पुदगल के एक परमाणु से ही प्रदेश का भाव क्यों बताया?

उत्तर―सूक्ष्मस्कंध परमाणुमात्र प्रदेश में अवगाह करे प्रदेश में आ जाये, इस कारण कितना भी सूक्ष्मस्कंध हो उससे प्रदेश का भाव निर्दोष नहीं होता । एक परमाणु एक प्रदेश से अधिक स्थान कभी घेर ही नहीं सकता । अत: अविभागी पुद्गलाणु से ही प्रदेश का भाव बताया गया ।

प्रश्न 5―पुद्गलाणु के साथ अविभागी विशेषण क्यों दिया?

उत्तर―यद्यपि पुद्गलाणु अविभागी ही याने अविभाज्य ही होता है तथापि सूक्ष्मस्कंधों को भी अणु शब्द से कहने का व्यवहार लोक में पाया जाता है । अत: अविभागी विशेषण पुद्गलाणु के साथ यहाँ लगाया है ।

प्रश्न 6―आकाश में अनंत प्रदेश तो हैं, किंतु वे पूरी संख्या में हैं या ऊनी संख्या में?

उत्तर―आकाश के प्रदेश पूरी संख्या में हैं ।

प्रश्न 7―अलोकाकाश में तो पुद्गल है ही नहीं तब तो वहाँ प्रदेश न होना चाहिये?

उत्तर―लोकाकाश में भी पुद्गल परमाणु है इस कारण प्रदेश हो, ऐसी बात नहीं है । पुद्गल परमाणु से तो प्रदेश का भाव बताया है । अलोकाकाश में पुद्गल परमाणु नहीं हैं तब भी प्रदेश विभाग की कल्पना यहाँ की तरह हो जाती है ।

प्रश्न 8―अखंडप्रदेशी को अनंतप्रदेशी मानने में तो विरोध आता है?

उत्तर―आकाशक्षेत्र की अभेददृष्टि से जानने पर वह अखंडप्रदेशी है और भेददृष्टि से जानने पर वह अनंतप्रदेशी है ।

प्रश्न 9―आकाश के किस भाग में लोकाकाश है?

उत्तर―आकाश के ठीक मध्यभाग में लोकाकाश है, सारे आकाश में यह एक ही ब्रह्मांड हैं, इसलिये आकाश के मध्य में ही ब्रह्मांड (लोकाकाश) सिद्ध होता है । इस लोकाकाश के सर्व ओर अनंत प्रदेशों में आकाश ही आकाश है ।

प्रश्न 10―आकाश में अनंत प्रदेश हैं, यह कैसे जाना जाये?

उत्तर―आकाश के समस्त प्रदेशों से भी अनंतगुणे अविभागप्रतिच्छेद वाले केवलज्ञान में यह जाना गया और दिव्यध्वनि से प्रकट हुआ । अत: अनंत प्रदेश हैं, यह नि:संदेह प्रतीति में लाना चाहिये ।

प्रश्न 11―आकाश के अनंत प्रदेशों में कोई युक्ति भी है?

उत्तर―कल्पना करो कि किसी जगह आकाश का अंत आ गया तो वहाँ कोई ठोस चीज आ गई कि पोल है । यदि ठोस चीज आ गई तो उसके बाद पोल ही होगी । यदि पोल है तो पोल से तो आकाश संकेतित किया जाता है । आकांक्षा का कहीं भी अंत नहीं आ सकता । इसलिये आकाश के अनंत प्रदेश युक्तिसिद्ध भी हो जाते हैं ।

प्रश्न 12―प्रदेश का क्या आकार है?

उत्तर―वस्तुत: तो प्रदेश ही क्या समस्त आकाश निराकार है, फिर जिस दृष्टि से प्रदेश जाना गया उस दृष्टि से विचारने पर प्रदेश परमाणु के आकार वाला सिद्ध होता है । परमाणु यद्यपि निरवयव है तथापि उसमें अन्य परमाणुवों के संयोग से स्कंधत्व हो सकता है, अत: अवयव है । परमाणु षट्कोण है । ऊपर नीचे व चारों दिशावों में संयुक्त परमाणुवों का छिद्ररहित श्लेष होता है । उस परमाणु के सदृश आकाश प्रदेश भी षट्कोण है ।

इति श्री पूज्य मुनिवर नेमिचंद्र सैद्धांतिदेव द्वारा विरचित द्रव्यसंग्रह की 27 गाथाओं में चार अधिकारों द्वारा षट᳭द्रव्य पंच अस्तिकाय का वर्णन करने वाले प्रथम व द्वितीय अधिकार समाप्त हुए ।

इसकी प्रश्नोत्तरी टीका प्रोफेसर श्री लक्ष्मीचंद्र जी एम. एस-सी. जबलपुर निवासी के (जिनसे मैंने इंगलिश का अध्ययन किया) धार्मिक मनन के हेतु हुई ।

―मनोहर वर्णी “सहजानंद”


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