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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 29

From जैनकोष



आसवदि जेण कम्मं परिणामेणप्पणो स विण्णेओ ।

भावासवो जिणुत्तो कम्मासवणं परो होदि ।।29।।

अन्वय―अष्यणो जेण परिणामेण कम्मं आसवदि स जिणुत्तो भावासवो विण्णेयो, कम्मासवणं परो होदि ।

अर्थ-―आत्मा के जिस परिणाम से कर्म आता है वह जिनेंद्रदेव के द्वारा कहा हुआ भावास्रव जानना चाहिये और जो कर्मों का आना है उसे द्रव्यास्रव जानना चाहिये ।

प्रश्न 1―किन परिणामों से कर्म आते हैं?

उत्तर-―शुद्ध आत्मतत्त्व के आश्रय के विपरीत जो भी परिणाम हैं वे पुद्गल कर्मों के आस्रव के निमित्त कारण हैं ।

प्रश्न 2―वे विपरीत परिणाम कौन हैं जिनके निमित्त से कर्मों का आस्रव होता है?

उत्तर―पांच इंद्रियां के विषय भोगने के परिणाम क्रोध, मान, माया, मात्सर्य, लोभ, परवस्तु को अपना मानने का भाव, परपदार्थों के जानने का लक्ष्य आदि विपरीत परिणाम हैं ।

प्रश्न 3―जीवास्रव किसे कहते हैं?

उत्तर―भावास्रव जीवास्रव का ही अपर नाम है । जिन भावों का नाम भावास्रव है वे जीव के ही परिणमन हैं, अत: ये जीवास्रव कहलाते हैं अर्थात् आत्मा के जिन परिणामो से कर्म आते हैं उन्हें भावास्रव या जीवास्रव कहते हैं ।

प्रश्न 4―आत्मा में भावास्रव क्यों होते हैं?

उत्तर―पूर्वबद्ध कर्मों के उदय को निमित्त पाकर आत्मा में भावास्रव होते हैं ।

प्रश्न 5―भावास्रव और द्रव्यास्रव में कारण कौन हैं और कार्य कौन हैं?

उत्तर―वर्तमान भावास्रव नवीन द्रव्यास्रव का कारण है, नवीन द्रव्यास्रव का वर्तमान भावास्रव का कार्य है ।

प्रश्न 6―वर्तमान भावास्रव का कारण कौन है?

उत्तर―वर्तमान भावास्रव का परंपरा कारण पूर्व का द्रव्यास्रव है ।

प्रश्न 7―एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ कार्यकारण भाव कैसे हो सकता हे?

उत्तर―जीवास्रव (भावास्रव) जीव का परिणमन है । अजीवास्रव (द्रव्यास्रव) अजीव का परिणमन है, इस कारण इन दोनों में निश्चय से कार्यकारण भाव नहीं है, किंतु निमित्तदृष्टि का कार्यकारण भाव है ।

प्रश्न 8―द्रव्यास्रव किसे कहते हैं?

उत्तर―अकर्मत्वरूप कार्माणवर्गणावों को कर्मस्वरूप होने को द्रव्यास्रव कहते हैं ꠰

प्रश्न 9―अजीवास्रव किसे कहते हैं?

उत्तर―द्रव्यास्रव का ही अपर नाम अजीवास्रव है । द्रव्यास्रव अजीव कार्माणवर्गणाओं का परिणमन है, अतः यह अजीवास्रव है ।

प्रश्न 10―भावास्रव के स्वरूप में कहे हुए “कम्मं आसवदि” से द्रव्यास्रव का स्वरूप जान लिया जाता है, फिर द्रव्यास्रव का स्वरूप पृथक् क्यों कहा है?

उत्तर―यत् तत् शब्द से जिसका ग्रहण हो उसी का वर्णन होता है । यहाँ “कम्मं आसवदि” शब्द भावास्रव की सामर्थ्य बताने को कहा ।

प्रश्न 11―भावास्रव और द्रव्यास्रव के लक्षण जानने से लाभ क्या है?

उत्तर―यदि भूतार्थनय से भावास्रव व द्रव्यास्रव को समझा जाये तो सम्यग्दर्शन का लाभ होता है ।

प्रश्न 12―भूतार्थनय से थे आस्रव कैसे जाने जाते हैं?

उत्तर―इस तत्त्व को अगली गाथा के प्रश्नोत्तरों में कहा जायेगा, जिस अगली गाथा में भावास्रव व द्रव्यास्रव का स्वरूप बताया है ।

अब भावास्रव का स्वरूप विशेषता से कहते हैं―


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