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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 3

From जैनकोष



तिक्काले चदुपाणा इंदिय बलमाउ आणपाणो य ।

ववहारा सो जीवो णिच्चयणयदो दु चेदणा जस्स ।।3।।

अन्वय―ववहारा जस्स तिक्काले चदु पाणा इंदिय बलं आउ य आणपाणो सो जीवो हु णिच्चयणयदो जस्स चेदणा सो जीवो ।

अर्थ―व्यवहारनय से जिसके तीन काल में इंद्रिय, बल, आयु, श्वासोच्छ᳭वास, ये चार प्राण हों वह जीव है, परंतु निश्चयनय से जिसके चेतना है वह जीव है ।

प्रश्न 1―जिस जीव के संसार अवस्था में तो ये चार प्राण थे । किंतु अब मुक्त अवस्था में आने से प्राणों का अभाव है तो क्या वह व्यवहारनय से जीव नहीं कहा जायेगा?

उत्तर―तीनों काल में हों या केवल भूतकाल में थे, अब नहीं हों तो भी भूतकाल में होने से ग्रहण हो गया, यह “तिक्काले” शब्द का भावार्थ है । इससे यह सिद्ध हुआ कि मुक्त जीव के इस समय ये प्राण नहीं हैं तो भी भूतकाल में थे, सो व्यवहारनय से वह भी जीव हैं ।

प्रश्न 2―इंद्रियप्राण किसे कहते हैं ?

उत्तर―द्रव्येंद्रियों के निमित्त से उत्पन्न हुआ क्षायोपशमिक भाव इंद्रियप्राण है ।

प्रश्न 3―इंद्रियप्राण और इंद्रिय में क्या अंतर है ?

उत्तर―इंद्रियप्राण तो क्षायोपशमिक भाव है, परंतु इंद्रिय से द्रव्येंद्रिय का ग्रहण होता है । इसी कारण सयोगकेवली के इंद्रियप्राण नहीं है, परंतु ये पंचेंद्रिय माने ही गये हैं ।

प्रश्न 4―इंद्रियप्राण कितने प्रकार का है ?

उत्तर―इंद्रियप्राण 5 प्रकार का है―(1) स्पर्शनेंद्रियप्राण, (2) रसनेंद्रियप्राण, (3) घ्राणेंद्रियप्राण, (4) चक्षुरिंद्रियप्राण, (5) श्रोत्रेंद्रियप्राण ।

प्रश्न 5―इन इंद्रियप्राणों के लक्षण क्या हैं ?

उत्तर―स्पर्शन इंद्रिय के निमित्त से जो क्षायोपशमिक भाव उत्पन्न हुआ वह स्पर्शनेंद्रिय प्राण है । इसी प्रकार रसनेंद्रिय आदि के भी अलग-अलग लगा लेना चाहिये ।

प्रश्न 6―बलप्राण किसे कहते हैं और वे कितने प्रकार के हैं ?

उत्तर―अनंत शक्ति के एक भाग प्रमाण मन, वचन, काय के निमित्त से उत्पन्न हुए बल को बलप्राण कहते हैं । ये 3 प्रकार के हैं―(1) मनोबल, (2) वचनबल, (3) कायबल ।

प्रश्न 7―इन बलप्राणों के लक्षण क्या हैं ?

उत्तर―मन के निमित्त से उत्पन्न हुए वीर्य के विकास को मनोबल प्राण कहते हैं । इसी प्रकार वचन और कायबल में भी अलग-अलग लगा लेना चाहिये ।

प्रश्न 8―बल, प्राण, गुप्ति, योग, पर्याप्ति ये मन, वचन, काय के होते हैं, इनमें अंतर क्या है ?

उत्तर―वीर्य के विकास को बलप्राण कहते हैं । मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के विरोध को गुप्ति कहते हैं । मन, वचन, काय के निमित्त से आत्मप्रदेश परिस्पंद के लिये जो यत्न होता है उसे योग कहते हैं । मनोवर्गणा, भाषावर्गणा, आहारवर्गणा को ग्रहण करने की अति की पूर्णता को पर्याप्ति कहते हैं ।

प्रश्न 9―मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के निरोध को जब गुप्ति कहा तो इसमें वीर्य गुण का विकास रोक दिया गया, फिर गुप्ति उपादेय नहीं रहेगी ?

उत्तर―अशुद्ध बल को रोककर आत्मबल के विकास को गुप्ति बढ़ाती है, इसलिये परमार्थबल के विकास का कारण होने से गुप्ति उपादेय है ।

प्रश्न 10―आयुप्राण किसे कहते हैं ?

उत्तर―जिसके उदय से भव संबंधी जीवन और क्षय से मरण हो वह आयुप्राण है ।

प्रश्न 11―आयुप्राण के चार भेद क्यों नहीं कहे गये ?

उत्तर―चारों आयुवों का सामान्यकार्य उस भव में अवस्थान करना है, इस साधारणता के कारण आयुप्राण एक कहा गया है ।

प्रश्न 12―आनप्राण किसे कहते हैं ?

उत्तर―शरीर से किसी भी प्रकार वायु के आने-जाने को आनप्राण कहते हैं । जैसे मुख से श्वास उच्छवास निकलना । रोमछिद्रों से वायु का आना-जाना । नाड़ी द्वारा संचरण होना । पृथ्वी आदि सर्व शरीर से वायु का आना-जाना । वायुकायिक जीव के भी सर्व शरीर से वायु का आना-जाना आदि ।

प्रश्न 13―इन चारों प्राणों का क्या कभी विनाश भी होता है ?

उत्तर―पाँच इंद्रियप्राणों का व मनोबल का विनाश तो क्षीणमोह गुणस्थान के अंत में हो जाता है । वचनबल व आनप्राण का विनाश सयोगकेवली के अंतिम अंतर्मुहूर्त में होता है व कायबल का विनाश सयोगकेवली के अंत में होता है और आयुप्राण का विनाश अयोग केवली के अंत में होता है ।

प्रश्न 14―इन प्राणों के विनाश होने पर इनके एवज में क्या किसी विशुद्ध, प्राण का विकास होता है ?

उत्तर―इंद्रियप्राण के अभाव में अतींद्रिय शुद्ध चैतन्यप्राण का विकास होता है । मनोबल के अभाव में अनंत वीर्यप्राण का विकास होता है । वचनबल श्वासोच्छ᳭वास व कायबल के अभाव में प्रदेशों का निश्चलतारूप बल का विकास होता है और आयुप्राण के अभाव में अनादि अनंत शुद्ध चैतन्य का सर्वथा निश्चल विकास बना रहता है ।

प्रश्न 15―ये प्राण सभी एक साथ होते हैं या किसी जीव के कम भी होते हैं ?

उत्तर―एकेंद्रिय अपर्याप्त जीव के स्पर्शन इंद्रिय, कायबल, आयु, ये तीन प्राण होते हैं । पर्याप्त के श्वासोच्छ᳭वास सहित 4 प्राण होते हैं । द्वींद्रिय अपर्याप्त जीव के दोइंद्रिय, कायबल व आयु ये 4 प्राण होते हैं । पर्याप्त के वचनबल व उच्छ᳭वास सहित 6 प्राण होते हैं । त्रींद्रिय अपर्याप्त के 3 इंद्रिय, 1 बल, आयु ये 5 प्राण होते हैं । पर्याप्त के वचनबल व उच्छ᳭वाससहित 7 प्राण होते हैं । चतुरिंद्रिय अपर्याप्त के 4 इंद्रिय, 1 बल, आयु ये 6 प्राण होते हैं । पर्याप्त के वचनबल व उच्छ्वास सहित 8 प्राण होते हैं । असैनी पंचेंद्रिय अपर्याप्त के 5 इंद्रिय, 1 बल, आयु ये 7 प्राण होते हैं । पर्याप्त के वचनबल, उच्छ्वास सहित 9 प्राण होते हैं । सैनी पंचेंद्रिय अपर्याप्त के 5 इंद्रिय, 1 बल, आयु ये 7 प्राण होते हैं । पर्याप्त के मनोबल, वचनबल व उच्छ᳭वास सहित 10 प्राण होते हैं ।

सयोगकेवली के वचनबल, कायबल, आयु व उच्छ᳭वास―ये चार प्राण होते हैं व अंत में वचनबल रहित 3 व बाद में उच्छ᳭वास रहित 2 प्राण होते हैं । अयोगकेवली के केवल आयुप्राण होता है ।

प्रश्न 16―ये प्राण जीवमय हैं या अजीवमय ?

उत्तर―इंद्रियप्राण तो क्षायोपशमिक भाव है, सो यद्यपि जीव का मलिन भाव है तथापि पुदगल कर्म के निमित्त से उत्पन्न होते हैं, सो वे पुद्गलकर्म के कार्य हैं तथा शेष प्राणों का पुद᳭गल उपादान है । अत: सब प्राण पौद᳭गलिक हैं ।

प्रश्न 17―निश्चयनय से बीच के प्राण कौन-कौन हैं ?

उत्तर―शुद्ध निश्चयनय से ज्ञान, दर्शन, शक्ति सुख के अनंत विकास प्राण हैं व परमार्थ शुद्धनय से चैतन्यप्राण है ।

प्रश्न18―स्पर्शनादि द्रव्येंद्रिय क्या प्राण नहीं है ?

उत्तर―अशुद्ध भावेंद्रियप्राणों का कारण होने से थे द्रव्येंद्रिय भी असद᳭भूत व्यवहारनय से प्राण हैं? इनका अंतर्भाव इंद्रियप्राण में ही कर लेना चाहिये, परंतु भावेंद्रिय न होने से अयोगकेवली के इंद्रियप्राण नहीं मानना चाहिये ।

प्रश्न 19―इन सब कथनों में उपाय उपेय भी कुछ सिद्ध होता है क्या ?

उत्तर―उपेयतत्त्व शुद्ध चैतन्यप्राण है । उसकी सिद्धि का उपाय यह है कि अति प्राथमिक अवस्था में भावेंद्रियप्राण व बलप्राण का उपयोग देव, शास्त्र, गुरु की सेवा, ध्यान मनन स्तुति में लगावे, फिर प्राप्त योग्यता को निज अभेद स्वभाव में पहुंचने के प्रयत्न में लगावे । यद्यपि बुद्धिपूर्वक अभेदस्वभाव में पहुंचने का कार्य नहीं होता तथापि पहुंचने का यत्न करता है, फिर अति ज्ञानाभ्यास व ज्ञानसंस्कार एवं योग्यता से अभेदस्वभावी निज चेतन में उपयोग की स्थिरता हो तब संपूर्ण आत्मबल प्रकट होता है ।

इस प्रकार जीव अधिकार का वर्णन करके अब उपयोगाधिकार की गाथा कहते हैं―


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