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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 9

From जैनकोष



ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मफ्फलं पभुंजेदि ।

आदा णिच्छयणयदो चेदणभावं खु आदस्स ।।9।।

अन्वय―आदा ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मफ्फलं पभुँजेदि, खु णिच्छयणयदो आदस्स चेदणभावं पभुँजेदि ।

अर्थ―आत्मा व्यवहारनय से सुख दुःखरूप पुद्गलकर्म के फल को भोगता है और निश्चयनय से अपने-अपने चेतनभाव को भोगता है ।

प्रश्न 1―व्यवहार के कितने भेद हैं ?

उत्तर―व्यवहार के 4 भेद हैं―(1) उपचरित असद्भूतव्यवहार, (2) अनुपचरित असद᳭भूतव्यवहार, (3) उपचरित अशुद्ध सद्भूतव्यवहार, (4) अनुपचरित शुद्ध सद्भूतव्यवहार । इनमें से उपचरित अशुद्ध सद्भूतव्यवहार का नाम तो अशुद्धनिश्चयनय है और अनुपचरित शुद्ध सद्भूतव्यवहार का नाम शुद्ध निश्चयनय है ।

प्रश्न 2―उपचरित असद्भूतव्यवहारनय से जीव किसको भोगता है ?

उत्तर―उपचरित असद्भूतव्यवहारनय से जीव इंद्रियों के विषयभूत पदार्थों से उत्पन्न सुख दुःख को भोगता है अथवा विषयों को भोगता है । यहाँ “पदार्थों से उत्पन्न” इस अर्थ की मुख्यता है । विषयभूत पदार्थ बाह्य हैं और एकक्षेत्रावगाही भी नहीं, अत: इनका भोक्तृत्व उपचरित है पदार्थ अथवा विषयज सुख आत्मस्वभाव से विपरीत हैं, अत: असद्भूत है और पर्याय है, इसलिये व्यवहार है ।

प्रश्न 3―अनुपचरित असद्भूतव्यवहारनय से जीव किसका भोक्ता है ?

उत्तर―अनुपचरित असद्भूतव्यवहारनय से जीव सुख दुःखरूप पुद्गल कर्मों के फल को भोगता है । पुद्गल कर्म एकक्षेत्रावगाही हैं, अत: उनके फल का भोक्तृत्व अनुपचरित है । कर्म और कर्मफल आत्मस्वभाव से विपरीत है, अत: असद्भूत है, पर्याय है, अत: व्यवहार है ।

प्रश्न 4―निश्चयनय के कितने भेद हैं ?

उत्तर―निश्चयनय के 3 भेद हैं―(1) अशुद्धनिश्चयनय, (2) शुद्धनिश्चयनय, (3) परमशुद्धनिश्चयनय । इनमें अशुद्धनिश्चयनय का प्रतिपादन उपचरित अशुद्ध सद्भूतव्यवहार है और शुद्धनिश्चयनय का प्रतिपादन अनुपचरित शुद्ध सद्भूतव्यवहार है ।

प्रश्न 5―अशुद्धनिश्चयनय से जीव किसका भोक्ता है ?

उत्तर―अशुद्धनिश्चयनय से जीव अशुद्ध चेतनभाव अर्थात् हर्ष-विषादादि परिणाम का भोक्ता है । हर्ष-विषादादि विभाव हैं, अत: अशुद्ध हैं, किंतु हैं जीव के ही परिणमन, अत: निश्चयनय से हैं, पर्यायें हैं, अत: व्यवहार हैं । इस प्रकार जीव हर्षविषादादि अशुद्ध चेतनभाव का अशुद्धनिश्चयनय से भोक्ता है ।

प्रश्न 6―शुद्धनिश्चयनय से जीव किसका भोक्ता है ?

उत्तर―शुद्धनिश्चयनय से जीव अनंत सुख आदि निर्मल भावों का भोक्ता है । अनंत सुख आदि जीव के स्वाभाविक शुद्ध भाव हैं, अत: इनका भोक्तृत्व शुद्धनिश्चयनय से है ।

प्रश्न 7―परमशुद्धनिश्चयनय से जीव किसका भोक्ता है ?

उत्तर―परमशुद्धनिश्चयनय से जीव अभोक्ता है, क्योंकि परमशुद्धनिश्चयनय की दृष्टि से भोक्ता भोग्य आदि कोई विकल्प भेद नहीं है । यह नय तो केवल, शुद्ध, निरपेक्ष स्वभाव को विषय करता है ।

प्रश्न 8―इस भोक्तृत्व के विवरण से हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिये ?

उत्तर―व्यवहारनय से जो भोक्तृत्व बताया है वह तो असद्भूत ही है, इसलिये वस्तुस्वरूप जानकर यह प्रतीति हटा देनी चाहिये कि मैं विषयों से अथवा कर्मों से सुख या दुःख को भोगता हूँ ।

प्रश्न 9―तब मैं यह सुख दुःख किससे पाता हूं ?

उत्तर―सुख दुःख में अपने गुणों के परिणमन से पाता हूँ । कर्मोंदय तो बाह्य निमित्त मात्र है और विषय केवल आश्रयमात्र है ।

प्रश्न 10―यह सुख दुःख क्यों उत्पन्न हो जाता है ?

उत्तर―निज शुद्ध चैतन्यस्वभाव का श्रद्धान, ज्ञान एवं अनुचरण न होने से उपयोग अनात्मा की ओर जाता है और तब बाह्य पदार्थों का आश्रय बनाने से सुख दु:ख का उसमें वेदन होने लगता है ।

प्रश्न 11―इस सुख दुःख का भोक्तृत्व कैसे मिटे ?

उत्तर―स्वाभाविक आनंद का भोक्तृत्व होते ही सूक्ष्म भी सुख दुःख का भोक्तृत्व मिट जाता है ।

प्रश्न 12―जीव स्वाभाविक आनंद का भोक्ता कैसे होता है ?

उत्तर―नित्य निरंजन अविकार चैतन्य परम स्वभाव की भावना से स्वाभाविक आनंदरूप निर्मल पर्याय की उत्पत्ति होती है ।

प्रश्न 13―यह आनंद आत्मा के किस गुण की पर्याय है ?

उत्तर―आनंद आत्मा के आनंद गुण की पर्याय है ।

प्रश्न 14―सुख, दुःख किस गुण की पर्यायें हैं ?

उत्तर―सुख, दुःख भी आनंद गुण की पर्यायें हैं । आनंद गुण की तीन पर्यायें हैं―(1) आनंद, (2) सुख और (3) दुःख । आनंद तो स्वाभाविक परिणमन है और सुख एवं दुःख विकृत परिणमन है ।

प्रश्न 15―अनंत सुख तो स्वाभाविक परिणमन माना गया है, फिर सुख को विकृत परिणमन कैसे कहा?

उत्तर―सुख का अर्थ है―ख-इंद्रियों को, सु-सुहावना लगना । सो यह अशुद्ध परिणमन ही है, क्योंकि आत्मा तो इंद्रियों से रहित है । दुःख का भी अर्थ है, ख―इंद्रियों को, दु:―बुरा लगना । जैसे दुःख विकृत परिणमन है वैसे सुख भी विकृत परिणमन है । परंतु सुख से परिचित प्राणियों पर दया करके आनंद के स्थान में सुख शब्द रखकर अनंत सुख शब्द से आचार्यों ने प्रतिपादन किया है । जिससे ये प्राणी “अनंत समृद्धि मुक्तावस्था में है” यह समझ जावे ।

प्रश्न 16―आनंद शब्द का क्या अर्थ है ?

उत्तर―“आ समंतात् नंदनं आनंद: ।” सर्व प्रकार सर्वप्रदेशों में सत्य समृद्धि होना आनंद है । आत्मा की सत्य समृद्धि सुख दुःख से रहित परमनिराकुलता के अनुभव में है । एतदर्थ आनंद के स्रोतरूप चैतन्यस्वभाव की निरंतर भावना करना चाहिये ।

इस प्रकार “जीव भोक्ता है” इस अर्थ के व्याख्यान का अधिकार समाप्त करके “जीव स्वदेहपरिमाण है” इसका वर्णन करते हें―


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