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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 102

From जैनकोष



एको मे सासदो अप्पा .णाणदंसणलक्खणो।

सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा।।102।।

एकत्वचिंतन- मेरा यह शाश्वत आत्मा ज्ञानदर्शनस्वरूप है। इस ज्ञानदर्शन भाव के अतिरिक्त शेष जितने भी परिणाम हैं, बाह्यभाव हैं, विभाव हैं अथवा अन्य पदार्थ हैं, वे सब संयोगलक्षणात्मक हैं। जो जीव अपने आपके स्वरूप को एकत्व में परिणत निहार रहा है, उसके चिंतन की यह बात चल रही हैं। यह जीव दुष्कृत के कारण जन्म और मरण को प्राप्त होता है तो वहां भी यह अकेला ही जन्मता है और मरता है। यह अपने आपमें जितने भी विकल्प उठाता है, उन्हें भी यह अकेला विकल्प करता है। उन विकल्पों के कारण अपनी स्वरूपदृष्टि से विमुख होकर कर्मोदयजनित जो वैषयिक सुख अथवा दु:ख हैं, इनको यह बारंबार भोगता है तो यह अकेले ही भोगता है। कोई समय उत्तम आये और क्षयोपशमलब्धि प्रकट हो, सद्गुरुवों का उपदेश भी मिले तो उस काल में जब यह जीव अपने स्वभाव की ओर चलता है तो वह अकेला ही चलता है। रुलता है तो अकेला, संसार के संकटों से छूटता है तो अकेला, सर्वत्र यह जीव अपने एकत्वस्वरूप में है। इस प्रकार एकत्व जगने में परिणत जो सम्यग्ज्ञानी पुरुष है, उसका ही यह चिंतन चल रहा है।

आत्मा की ज्ञानदर्शनस्वरूपता- मेरा यह शाश्वत आत्मा ज्ञानदर्शनस्वरूप है। यह किस आत्मा की बात कही जा रही है? व्यवहारदृष्टि से देखे हुए आत्मा की बात नहीं कही जा रही है, बल्कि मेरे स्वरूप में स्वत:सिद्ध विराजमान् जो त्रिकाल निरुपाधिस्वभाव है, उसमें बसा हुआ जो निरावरण ज्ञानशक्ति और दर्शनशक्ति है, उस शक्तिस्वरूप आत्मा की बात कही जा रही है। यह मेरा आत्मा है- ओह, इस प्रकार की प्रीतिपूर्वक आत्मा का सम्वेदन करने में कितना स्वभाव का अनुराग झलक रहा है? प्रीतिपूर्वक इस ज्ञानी के यह व्यवहार चल रहा है कि यह मेरा आत्मा है। आत्मा की समस्त दशावों को छोड़कर उनमें उपयोग न देकर भोग और उपयोग की तरंगों को भी न निरखकर त्रिकाल निरावरण निरुपाधि जो ज्ञानदर्शनस्वभाव है, तन्मात्र आत्मतत्त्व के प्रति कहा जा रहा है कि यह मेरा आत्मा ज्ञानदर्शनस्वरूप है।

आत्मा की अशरीरता- इस मेरे आत्मा में यह शरीर भी नहीं है। इस समय हम आप शरीर में बंधे हैं। बंधे हुए रहे आयें, फिर भी शरीर के बंधन को न निरखें, शरीर को ही अपने लक्ष्य में न लें, है ही नहीं शरीर, इस प्रकार का उपयोग करके अंतर में अपने आपके स्वरूप को निहारो। वहां जो केवल ज्ञानदर्शन स्वभावमय आत्मा है, उसकी बात कही जा रही है कि यह आत्मा शरीर से भी जुदा है। यहां तक कि जिनकी दृष्टि पहुंची है, उनके संसार-संकट समाप्त हो जाते हैं।

शांति का उपाय- भैया ! सब कुछ किया जाये, पर एक यह अपने पते की, अंतर की बात न विदित हो तो कुछ नहीं किया; बल्कि अपनी बरबादी का कारण ही बनाया। यह बाह्य में धन-संपदा लाखों और करोड़ों की भी हो जाये, पर हे आत्मन् ! तू तो अमूर्त आकाशवत् निर्लेप केवल अपने स्वरूपमात्र है और बहुत विशाल संपदा में तेरा यदि ममता का परिणाम जगे तो यह तो तेरे पर पहाड़ ढा गया। तू शांत नहीं रह सकता। तेरी शांति तो तेरे आकिन्चन्य भाव पर निर्भर है। मेरा जगत् में कहीं कुछ नहीं है, केवल मैं ज्ञानदर्शन प्रकाशमात्र हूं- ऐसा भाव बने, ऐसा ही स्वभाव का अनुभव बने तो शांति है अन्यथा शांति नहीं है।

पर की आशा में क्लेश का मिटना असंभव- हे आत्मन् ! जो चीज तेरी नहीं है, उसमें क्यों ममता की जा रही है? भूख, प्यास, ठंड, गरमी की वेदना मिटाने के लिये यदि बाह्य का संचय करते हैं, तब तो कुबुद्धि नहीं कही जा सकती। वह शरीर का धर्म है और उसे तो अभी निभाना पड़ेगा; किंतु इस मायामय जगत् में, मलिन पापी मायामय कषायों से भरे संसार में तू किससे अपने यश की भीख मांगता है? दुनिया के लोग मुझे धनिक कह सकें, इस भाव से व्यामोही पुरुष धन से ममता बढ़ाये जा रहे हैं। ये सब क्लेश इस शरीर के कारण हैं। अपने आपको शरीररहित निरखें तो इन क्लेशों से मुक्त होने का उपाय मिलेगा। जब तक तू अपने को शरीररहित न निरखेगा, तब तक तू इन क्लेशों को न मिटा पायेगा। एक क्लेश मिटायेगा तो दूसरा कष्ट हाजिर है। है कोई ऐसा पुरुष यहां, जिसके क्लेश न आया करते हों? कितने क्लेश मिटावोगे- निर्धनता का या अपयश न हो जाये इसका या अपनी इज्जत की चिंता का? किस-किस का दु:ख मिटावोगे? किसी प्रसंग में मान लो दु:ख मिट गया तो नया दु:ख अवश्य आ जायेगा। यह संसार दु:खों का घर है। इस दु:खमय संसार में ममता करना बड़ी अज्ञानता है। अपनी संभाल कर लो, फिर दूसरों की रक्षा करने की सोचो। स्वयं तो अरक्षित हैं और दूसरे प्राणियों की रक्षा की चिंता लादे हैं।

दुर्लभ समागम के सदुपयोग का अनुरोध- भैया ! जो समय गुजर रहा है, वह वापिस नहीं आ सकता। ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य-जन्म बार-बार नहीं मिला करता। जो मनुष्य नहीं हैं, ऐसे बहुत से जीव जो नजर आ रहे हैं, उनकी जिंदगी तो देखो- भैंसा, बैल, घोड़ा, गधा आदि जोते जा रहे हैं, पीठ पर चाबुके लगती जा रही है और बांय-बांय करते जा रहे हैं। कितने दु:ख वे भोग रहे हैं? हांकने वाले जरा भी यह निर्णय नहीं कर रहे हैं कि इनकी भी हमारी जैसी ही जान है। कीड़े-मकौड़े आदि जीवों की हालत तो देख ही रहे हो, ये सब भी हम आपकी ही तरह चेतन जीव हैं। हम आपने सुखी होने का कोई पट्टा नहीं लिख रक्खा हैं। यह तो थोड़ा पुण्य का उदयकाल है, पर जो दुर्गति अन्य जीवों की हो सकती है, वही दुर्गति अपनी भी हो सकती है। इस कारण संसार से कुछ भय लायें, कुछ धर्म की ओर रुचि करें।

विषवृक्षचिंतन की क्यारी से पार्थक्य- यह मेरा आत्मा शाश्वत है, सर्वसंकटों से मुक्त है, इसमें शरीर का भी संबंध नहीं हैं। यह शरीर संसार के भ्रमण को बढ़ाने का कारण है। इस शरीर का प्रेम संसार के संकटों की बगिया को हरी-भरी रखने के लिये, लहलहाती रखने के लिये जल-सिंचन के आधार जैसा काम कर रहा है। जैसे किसी बाग में क्यारी बनाकर नाली में पानी का प्रवाह करते हैं, उससे यह वृक्ष हरे-भरे बने रहते हैं, बढ़ते चले जाते हैं- ऐसे ही यह शरीर उस क्यारी की नाली की तरह है, जिसमें दुर्भावों का जल प्रवाह किया जा रहा है और उस जल-सिंचन से यह संसार का विषवृक्ष हरा भरा होकर बढ़ता चला जा रहा है। तू इस शरीर से भी जुदा है, शरीर की रुचि से संसार के सारे संकट बनते है। सामायिक में, स्वाध्याय में या कहीं भी बैठे हों, दुकान पर ही क्यों न हों, किसी भी जगह दो-चार सेकिंडों को भी कभी तो अनुभव करें कि यह मैं हूं, यह मैं स्वरूप सत् आत्मा सर्वपरपदार्थों से भिन्न, शरीर से भी जुदा, केवल एक ज्ञानप्रकाशमात्र हूं। इस तत्त्व को न जानने के कारण कितना अंधकार छाया है इन जीवों में? इन्हें शुद्ध यथार्थस्वरूप नहीं सूझता है।

स्व का स्वतंत्र स्वरूप- यह मैं अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत् हूं। यह मैं सदा एक हूं, नानारूप नहीं हूं। जैसे जगत् में ये नाना प्रकार के जीव दिख रहे हैं- गाय, बैल, घोड़ा, भेड़, बकरी आदि ऐसे ही ये हम आप भी जितने दिख रहे हैं, उन सबके संबंध में ज्ञानी पुरुष चिंतन कर रहा है कि मुझे तो कोई दिख ही नहीं रहा है। कहां प्रवेश करके ज्ञानी चिंतन कर रहा है? भिन्न-भिन्न मनुष्यों को निरखकर। एक मानने की बात तो दूर रही, यह तो सुगम बात है; किंतु वृक्ष कीड़े, पशु-पक्षी जैसे अत्यंत भिन्न जीवों को निरखकर भी ज्ञानी इन सबमें एकत्व देख रहा है। ये सब केवल ज्ञानप्रकाशमात्र हैं। ऐसा ही यह मैं ज्ञानमय आत्मा शाश्वत हूं, ज्ञानदर्शनस्वरूप हूं।

स्वरूप की क्रियाकांड विविक्तता- यह मैं शाश्वत आत्मा सर्वप्रकार की क्रियावों से दूर हूं। मैं कुछ करता हूं, मैं अमुक क्रियायें करता हूं, इस प्रकार की दृष्टि में यह मेरा आत्मा ओझल हो जाता है। मैं भावप्रधान हूं, यह केवल अपने परिणाम ही बनाता है। उसी परिणाम पर शांति और अशांति निर्भर होती है। मेरा यह आत्मतत्त्व समस्त क्रियाकांडों से दूर है। ये नाक, कान के आभूषण जो स्वर्ण के हैं, ये नाक, कान की शोभा बढ़ाने के लिये है, किंतु वे ही आभूषण नाक, कान को छेदकर एक घाव बना दें तो वे आभूषण किस काम के हैं? ये क्रियाकांड चलना, उठना, बैठना, शुद्धता से हाथ पैर की वृत्ति करना, दूसरों से अलग रहना, छुवाछूत आदिक इन सब क्रियावों से चलना, इन सबका उद्देश्य तो निश्चय धर्म का श्रृंगार करने के लिये था; किंतु ये क्रियाकांड एक ममता को उत्पन्न करके हमारे ही धर्म में एक बड़ा रोग पैदा कर दें, बुद्धि को सड़ा दें, बहिर्मुखी दृष्टि हो जाये तो ये क्रियाकांड समूह मेरे किस काम के हैं? मैं शुभ, अशुभ, मन, वचन, काय के समस्त क्रियाकांडों से विविक्त हूं।

आत्मा की उपादेयता- भैया ! अपने को न केवल वचन और काय की क्रियावों से रहित होना है, किंतु आत्मा किस प्रकार की अक्षोभावस्था में दर्शन देता है, उस अक्षोभ प्रयत्न का प्रकरण है। सो जहां मन अपना संकल्प करना न छोड़ दे, रागद्वेष विकल्प वितर्क विचार छोड़ दे और वचन भी अंतरंग में न उठें, न बाहर बोले जायें तथा यह शरीर भी सर्वक्रियावों को बंद कर दे, निष्पंद ऐसा निष्क्रियरूप बन सके तो वहां आत्मप्रभु के दर्शन होते हैं। ऐसी विश्क्षोभ स्थिति में सहज शुद्ध ज्ञान चेतनास्वरूप अतींद्रिय आनंद को भोगता हुआ शाश्वत होकर यह आत्मा ही मेरे लिये उपादेय है-

धन, कन, कंचन, राजसुख, सबहिं सुलभ कर जान।

दुर्लभ है संसार में, एक यथारथ ज्ञान ।।

इस दुर्लभ जिनधर्म का अलौकिक लाभ लूटना हो तो चित्त में यह पूर्ण श्रद्धा लावो कि मेरे शाश्वत आत्मा का जो सहजस्वरूप है, उसका दर्शन ही सर्वप्रकार से उपादेय है, वही सच्ची विभूति है।

वास्तविक दरिद्रता- बाहर में क्या है? कदाचित् कभी निर्धनता भी आ जाये और कभी भीख मांगकर भी पेट भरना पड़े तो वह अनर्थ के लिये नहीं है, किंतु बहुत बड़ी संपदा मिल जाये और उसमें यह परिणाम बन जाये कि यही मेरा सब कुछ है। अपने आपके स्वरूप का विस्मरण कर जाये, बाह्य पदार्थों की ओर झुक जाये तो यह दशा अनर्थ के लिये है और दशा वास्तविक दरिद्रता है, इसमें आत्मीयानंद का लाभ नहीं मिल सकता।

वांछनीय तत्त्व- यह मेरा आत्मा शाश्वत है और यही मेरे लिये उपादेय है। कोई कभी पूछे कि तुम्हें क्या चाहिये? तो अंतर में यह उत्तर हो कि मुझे तो उस शुद्ध निराकुल ज्ञानप्रकाशमात्र आत्मतत्त्व का दर्शन चाहिये और कुछ नहीं चाहिये। आखिर कोई संकट न रहे, यही तो सबके मन में बात है ना? ऐसी चीज यदि मिलती है, जिससे कि संकट सदा के लिये दूर हो जायें तो उससे बढ़कर और वैभव क्या हो सकता है? अपनी ही यह कमजोरी है। जो मायामयी जगत् में मायामयी लोगों की वृत्ति निरखकर स्वयं भी तृष्णा बढ़ा लेते हैं, इतनी विभूति हमारे भी होनी चाहिये; किंतु विभूति वाले विभूति पाकर जब अंत में मरण निकट आता है तो वे भी पछताते हैं कि हमने अपना कुछ कार्य न किया। धन बढ़ाया, संपदा बढ़ायी, सारे ऐब भी किये; पर आज मैं रीता का रीता जा रहा हूं।

जीवन-विडंबना- जब इस बालक का लोक दृष्ट जन्म हुआ था, तब तो गांठ में बहुत कुछ था, बहुत पुण्य का उदय था। न होता पुण्य का उदय तो पिता, बाबा, चाचा आदि उसे गोद में क्यों लिये फिरते? अत: उस समय बहुत बड़ा पुण्य का उदय था। ये बड़े-बड़े पुरुष खुद को दु:खी कर लेना मंजूर कर लेते हैं, पर बालक को दु:खी नहीं देखना चाहते हैं। यह पुण्य का ही तो उदय था। पर आज इतनी जिंदगी से जी कर वृद्ध हुए, मरण काल आया, उस समय देखते हैं तो कुछ भी गांठ में नहीं है। इसीलिए यह प्राकृतिक बात बन गई, मानो कवि की कल्पना में कि बालक जब जन्मता है तो मुट्ठी बांधे हुए निकलता है। दुनिया को वह बालक शिक्षा दे रहा है कि पूर्वजन्म में जो तप किया, धर्म किया, उस सबका जो पुण्यबंध है, वह हम साथ ले आये हैं और जब वह मरता है तो हाथ पसारकर मरता है। यह मरने वाला भी दुनिया को यह शिक्षा दे रहा है कि देखो इस जिंदगी में नाना खटपटें करने के बाद अब हम हाथ पसारे जा रहे हैं। जो था, उसे भी हम छोड़कर जा रहे हैं। ये सब विडंबनाएँ है। मैं उन सब विडंबनावों से परे शाश्वत ज्ञानदर्शनस्वभावी आत्मा हूं।

ज्ञानी का आत्मनिर्णय- मैं कौन हूं? इसका यथार्थ निर्णय होना ही संसार से छूटने का उपाय है। मैं वह नहीं हूं, जो मिट जाये। जो त्रिकाल रहे, वह मैं हूं। मैं वह नहीं हूं, जो किसी अन्य वस्तु से दब जाये अर्थात् अपने स्वभाव और अस्तित्त्व में अंतर डाल ले। मैं निरूपाधिस्वभाव हूं। मैं वह नहीं हूं, जो प्रतिभास से रहित हो, मैं ज्ञानदर्शनस्वरूप हूं। रागद्वेष आदिक विभाव एवं अन्य ये सब पर्यायें कुछ जानती नहीं है। राग परिणाम का काम जानना नहीं है। जानना केवल ज्ञानप्रकाश का काम है। यद्यपि हम आप संसारी-जीवों में ज्ञान और राग दोनों साथ-साथ चल रहे हैं, लेकिन राग मैं नहीं हूं। मैं तो ज्ञान हूं, जो कभी उत्पन्न हो, किसी दूसरे पदार्थ का निमित्त पाकर उत्पन्न हो मिट जाये, वह मैं नहीं हूं। मैं ज्ञानस्वरूप हूं। ये रागादिक भाव तो ज्ञानस्वरूप के विरूद्ध हैं। मैं तो ज्ञान की वृद्धि का ही स्रोतभूत जो ज्ञानस्वभाव है, वह हूं। मैं कारणपरमात्मा हूं अर्थात् परमात्मतत्त्व जो प्रकट होता है, वह इस मुझ कारण का ही व्यक्तरूप है, कुछ अन्य तत्त्व नहीं है। मैं एक हूं, शाश्वत हूं, ज्ञानदर्शनरूवरूप हूं। अन्य जितने भी भाव हैं, वे सब मुझ पर लादी हुई चीजें हैं, उन स्वरूप मैं नहीं हूं। चाहे बाह्यपरिग्रह हों और चाहे रागादिक अंतरंग परिग्रह हों- ये सब थापे गये तत्त्व हैं। शुभ और अशुभ कर्म के संयोग से उत्पन्न होते हैं। वे शुभ व अशुभ मेरे स्वरूप से बाह्य हैं। ऐसा ज्ञानी का परमनिर्णय है।

लौकिक बड़प्पन से शांति का अलाभ- लोग अपने को भूलकर बाह्य स्त्री आदिक, धन-संपदा आदिक चेतन-अचेतन परिग्रहों में झुके जा रहे हैं, आकर्षित हो रहे हैं। इन व्यामोही जीवों ने अपने प्रभु पर कितनी विडंबना लाद ली है? यह तो केवल ज्ञानस्वरूपमात्र है, ऐसा अनुभव, ऐसा निर्णय जब तक कोई नहीं कर सकता है। वह चाहे लोक में कितना ही बड़ा बन जाये, धर्म के नाम पर व्रत, भक्ति, पूजा आदिक करके कितना ही आपका लोक में बड़प्पन दिखाये, पर शांति नहीं हो सकती है। शांति तो शांति के ढंग से आ सकेगी। वह ऊपरी दिखावे से नहीं आ सकती है।

उत्तरोत्तर दुर्लभ स्थिति की प्राप्ति और कर्तव्य- हम आप तो अनेक जीवों की अपेक्षा बहुत बड़ी स्थिति में हैं। प्रथम तो निगोद से निकलना ही कठिन था, फिर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति से भी निकलना कठिन रहा। वहां से निकलकर त्रसपर्याय में आये। दोइंद्रिय से तीनइंद्रिय, तीनइंद्रिय से चारइंद्रिय, असंज्ञीपंचेंद्रिय और असंज्ञीपंचेंद्रिय से संज्ञीपंचेंद्रिय होना उत्तरोत्तर कठिन है। संज्ञीपंचेंद्रिय में भी मनुष्यभव मिलना बहुत दुर्लभ बात है। ध्यान में लायें कि हम कितनी ऊँची दुर्लभ स्थिति में आ गये हैं? मनुष्यों में भी श्रेष्ठ धर्म मिलना, पवित्र कुल मिलना, अच्छा समागम मिलना, शास्त्रों की बात समझने की बुद्धि आना और कुछ धर्म में रुचि होना- ये कितनी उत्तरोत्तर दुर्लभ बातें हैं? हम और आप इतना तक प्राप्त कर चुके है। अब केवल एक ही हिम्मत बनाने की जरूरत है। वस्तुस्वरूप को स्वतंत्र यथार्थ जानकर एक बार समस्त परपदार्थों का विकल्प तोड़कर जो संग मिला है, घर आदिक जो समागम हैं, उन सबको उतना ही भिन्न मानकर, जितने भिन्न दुनिया में और लोगों के मकान आदि हैं, उतने ही भिन्न मानकर केवल अपने आपके इस ज्ञानस्वरूप की महिमा पायें तो स्वयं ही अद्भूत अलौकिक ऐसा आनंद प्रकट होगा कि संसार के संकट काटने का मार्ग पा लिया जायेगा और उसी समय से अद्भूत आनंद प्राप्त होगा।

अज्ञानियों की भीख- भैया ! परपदार्थों की आशा रख-रखकर कुछ अपनी इज्जत बनायी, तृप्ति बनायी तो उसमें कौनसी शान है? भीख मांगकर तो भिखारी भी पेट भर लेते है, ऐसे ही लोगों से इज्जत की भीख मांगकर कुछ इज्जत का बनावटपन करें भी लोग, तो उसमें कौनसा यज्ञ जीत लिया? धनसंचय की होड़ लगाना, और भी लौकिक पोजीशन के बढ़ाने में होड़ लगाना- यह क्या है? यह लोगों से भीख मांगना ही तो है। किसी प्रकार लोग यह जान जायें कि यह बहुत बड़ा पुरुष है। अरे, लोगों के इस प्रकार जान जाने से मिल क्या जायेगा और अब तक मिला भी क्या है? हां में हां मिलाने वाले लोग, आपके मन को राजी रखने वाले लोग तब तक के लिये साथी हैं, जब तक आपके निमित्त से उनका कुछ स्वार्थ भी सधता है। आशा रखो तो अपने आत्मदेव की तथा जो शुद्ध आत्मा हुए हैं, परमात्मा हुए हैं, उनके शुद्ध गुणों की दृष्टि करें। शुद्ध आत्मा के शुद्ध गुणस्मरण की आशा करें, उससे तो लाभ होगा; किंतु जो स्वयं आरक्षित हैं, मिट जाने वाले हैं, गंदे आशय के हैं- ऐसे लोगों की आशा करने से लाभ की तो कथा ही छोड़ो, बल्कि उल्टी बरबादी ही बरबादी है। ये समस्त चेतन-अचेतन परिग्रह मेरे स्वरूप से अत्यंत भिन्न हैं।

परमार्थ चिंतामणि- यह मेरा परमात्मा, यह ज्ञानस्वरूप, यह शुद्ध चित्प्रकाश, यह क्षोभरहित सर्वश्रेष्ठ तत्त्व शाश्वत है, एकस्वरूप है। यही वास्तविक चिंतामणि है, जिसकी दृष्टि में आने पर सभी चिंताएं, सभी संकट समाप्त हो जाते हैं। भैया ! रहना तो कुछ है ही नहीं, यह तो निश्चित है। जो कुछ भी जोड़ा है, कमाया है, रक्खा है, जिसमें बुद्धि अटकती है, एक अणुमात्र भी नहीं रहना है। न रहे, इतना ही नहीं, बल्कि इसके कारण बहुत बुरी तरह से संक्लेश होता है और मरण भी बिगड़ता है। लाभ ही न करें, केवल इतनी ही बात नहीं है, बल्कि बाह्यसंबंध तो ये बरबादी करते हैं। कितना व्यर्थ का काम है?

दुर्बुद्धि में अनर्थ- पुण्योदयवश न चाहते हुए भी, यथार्थदृष्टि रखते हुए भी जो कुछ संपत्ति आती है, वह तो बिगाड़ का कारण नहीं बनती, किंतु जिसे चाह-चाहकर जोड़ा है, वह संपदा अवश्य ही बिगाड़ का कारण होती है। जैसे लोग कहते हैं कि न्याय की कमाई हो तो पैसा धर्म में लगता है, अन्याय से जो कमाई हो तो वह पैसा धर्म में नहीं लग पाता है। वह तो यों ही बिखर जाता है। उसका भी यही मर्म है कि जिस पुरुष ने न्यायबुद्धि नहीं रखी है, उसमें ऐसी सुमति कैसे जग सकती है कि वह धर्म कार्य में भी कुछ लगा सके? कुछ पैसे की ही बात नहीं है कि पैसे में न्याय और अन्याय खुदे हुए हैं। न्याय-अन्याय तो पुरुष की भावना में है। जो पुरुष अन्याय करके धनसंचय करते हैं, उनको यह ज्ञानप्रकाश नहीं मिल पाता कि धन का सदुपयोग कर सकें। ज्ञानी पुरुष ही यह साहस कर सकता है कि संपदा आये अथवा न आये, यहां तो कुछ हैरानी नहीं है।

जीवन का विशुद्ध ध्येय- भैया ! ज्ञानी का निर्णय है कि मुझे दुनिया में अपना नाम नहीं करना है, क्योंकि वह व्यर्थ की बात है। मुझे इस शरीर को आराम से नहीं रखना है, क्योंकि इसमें मेरा क्या पूरा पड़ेगा? विषयों के नाना साधन जुटाकर मुझे दिल की तफरी नहीं करनी है, क्योंकि उससे मेरा कुछ लाभ नहीं है। तब फिर संपदा आये तो और न आये तो, जो भी परिस्थिति सामने होगी, उसमें ही मेरी व्यवस्था होगी। मैं परिग्रही बनने के लिये मानव-जन्म में नहीं आया हूं। सदा के लिये संसार-संकट मिटा लेने के लिये मैं मानव हुआ हूं। जिस पुरुष का ध्येय विशुद्ध हो जाता है, उसे फिर व्यवहार में विडंबना नहीं होती है।

अकर्तृत्व का आशय- लोककल्पित लक्ष्मी को कौन कमाता है? सब उदय की चीज है। जब आती है, तब वेग से आती है और जब जाती है तो एकदम से चली जाती है। आने में फिर भी कुछ क्रम है, सिलसिला है पर जाने में तो कोई सिलसिला भी नहीं है, किसी भी समय एक साथ भी चली जायेगी। जाये तो जाये, उससे तो हमें कुछ मतलब नहीं है। हमारा शरण तो परमात्मभक्ति है और परमार्थशरण तो मेरे यथार्थस्वरूप का आलंबन है। मोही जन यह निरखकर दु:खी होते हैं कि मैंने इसको ऐसा पाला-पोसा इसकी मदद की और यह किसी भी बात पर मुझसे विमुख हो जाता है, ज्ञानी इस प्रकार की भावना नहीं करता है, क्योंकि वह जानता है कि मैंने केवल अपनी भावना बनाने के सिवाय और कुछ नहीं किया। मैं दूसरे पदार्थ में कुछ नहीं कर सकता हूं। वह भ्रम नहीं करता कि मैंने अमुक का उपकार किया या अमुक को आराम दिया। वह तो शुद्ध ही समझ रहा है कि मैंने केवल अपना भाव ही बनाया व उस भाव का ही प्रयत्न किया। जीव केवल भाव करता है। बाहरी चीजों का जुड़ना, बिछुड़ना ही तो निमित्तनैमित्तिक संबंधवश हो रहा है।

तकदीर- एक ऐसी किम्वदंती है कि एक बार ब्रह्म किसी की तकदीर बना रहे थे। तकदीर में लिख रहे थे 5) और काला घोड़ा। वहां से गुजरते हुए एक साधु ने पूछा कि ‘‘ ब्रह्माजी ! आप क्या कर रहे हो?’’ ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि ‘‘मैं एक लड़के की तकदीर बना रहा हूं।’’ ‘‘तकदीर में क्या लिख रहे हो?’’ ‘‘ काला घोड़ा और 5)।’’ ‘‘किसके यहां पैदा करोगे?’’ ‘‘अमुक करोड़पति के घर।’’ ‘‘महाराज ! ऐसा क्यों करते हो? जब करोड़पति के यहां पैदा करते हो तो उसका भाग्य करोड़पति के भाग्य जैसा बनावो या फिर किसी गरीब के यहां पैदा कर दो।’’ इस पर ब्रह्मा ऐंठकर बाले कि ‘‘तुम्हें इससे क्या मतलब? जो हमें करना होगा, वही करेंगे।’’ साधु भी अकड़कर बोला कि ‘‘अच्छा, तुम्हें जो लिखना है, वह लिख लो, हम तुम्हारी इस तकदीर को मिटा कर रहेंगे।’’ कालांतर उस लड़के का जन्म एक करोड़पति के घर हो गया।

भैया ! अब हम इस कथा का सार कह रहे हैं- कोई ब्रह्मानाम का पुरुष किसी के भाग्य की रचना करने वाला नहीं है, सब कर्मों की रचना है। आप चाहे ब्रह्मा की जगह कर्म शब्द प्रयोग कर लो। जब लड़का करोड़पति के घर में पैदा हो गया तो उसकी सारी संपत्ति बिकने लगी। थोड़े ही दिनों में सारी संपत्ति समाप्त हो गई और जो फिर भी शेष रह गई, वह दिन प्रतिदिन समाप्त होने लगी। जब लड़का 15-16 वर्ष का हुआ तो उसके पास एक झौंपड़ी, एक काला घोड़ा और 5) रह गये। सब कुछ ब्रह्माजी के कथनानुसार हो रहा था।

तदवीर- कालांतर एक दिन वे साधु उधर से गुजरे और उनके मस्तिष्क में सारा घटनाक्रम घूम गया। वे तुरंत उस लड़के के पास गये। उस लड़के ने साधु को देखकर उन्हें आदरपूर्वक बैठाया और बोला कि ‘‘महाराज ! मेरे योग्य सेवा बताइये।’’ साधु बोले कि ‘‘बेटा ! तेरे पास क्या है?’’ लड़के ने सविनय उत्तर दिया कि ‘‘काला घोड़ा और 5) ।’’ ‘‘अच्छा काला घोड़ा बाजार में बेच आवो।’’ वह लड़का घोड़े को 100 में बेच आया। साधु ने लड़के से कहा कि ‘‘अच्छा, 5) और 100) दोनों को मिलाकर बाजार से आटा, घी, शक्कर आदि मंगाकर उनकी पुड़ियाँ बनवाकर गांव के सब लोगों को खिला दो।’’ लड़के ने वैसा ही किया और इस प्रकार सारे रुपए खर्च हो गये। ब्रह्माजी ने सब कुछ जानकर दूसरे दिन फिर 5) और काला घोड़ा लड़के के पास भेज दिये। साधु ने फिर घोड़े को बिकवा दिया और पहिले दिन की ही तरह से किया। इस तरह से होते-होते 15 दिन बीत गये। अंत में ब्रह्मा ने हार मानकर साधु से कहा कि ‘‘साधुजी ! जैसा तुम कहो, वैसा करूँगा, पर हमारा पिंड छोड़ो। हम 5) तो रोज दे दिया करेंगे, पर रोज-रोज घोड़ा कहां से लायेंगे?’’ ‘‘अच्छा, इसका भाग्य जैसा में कहूं लिखो।’’ ब्रह्मा ने साधु के कथनानुसार लड़के का भाग्य लिख दिया।

आत्मकल्याण की चिंत्यता- भैया ! क्या ये हाथ पैर कुछ कमाते हैं? सब झूठ है, सब भावना की तारीफ है। जिसकी जितनी पवित्र भावना होगी, वह कभी निष्फल न जायेगी। चाहे सारी संपदा कोई कहीं लगा दे, पर जो पुण्य कर्मबंध होता है, उसमें वृद्धि ही होगी, कमी न होगी। किसी न किसी रूप से, किसी न किसी ढंग से वह पुण्य-सुख आगे आयेगा, उसकी चिंता में समय न गुजारो। चिंता करो तो भी उतना ही आता है और चिंता न करो तो भी उतना ही आता है। चिंता करने से बाह्यवस्तुवों में हमारा कुछ असर नहीं हो सकता। आत्मकल्याण की चिंता करें तो कुछ असर भी हो सकता है। यह कल्याण संबंधी चिंता की बात हमारे हाथ है, परंतु परपदार्थ संबंधी चिंता की बात हमारे हाथ नहीं है। यही एक कारणपरमात्मतत्त्व चिंतामणि है, जिसकी दृष्टि में आने पर हमारी तुम्हारी समस्त चिंताएँ दूर हो जाती हैं।

कर्तव्य और अकर्तव्य- यह मैं आत्मा शुद्ध हूं, अलौकिक दिव्य ज्ञानदर्शनस्वरूप हूं, तब फिर बाह्यपदार्थ की ओर दृष्टि देना, ध्यान बनाये रहना- यह निष्फल है, मुझ जैसे श्रेष्ठ तत्त्व के लिये करणीय बात नहीं है। बड़े कुल का बालक कोई निद्य काम करे तो उसे समझाते हैं कि तू बड़े कुल का है, कहीं ऐसा निद्य काम तुझे करना चाहिये? जरा दृष्टि पसारकर तो देखो, सर्वपदार्थों में यह चेतन पदार्थ महान् श्रेष्ठ वस्तु है। जिसका इतना महान् चैतन्य कुल है, सारे विश्व का ज्ञाता रहे और शुद्ध अनंत आनंद में लीन रहे- ऐसे विशुद्ध कुल का होकर भी इन चेतन अचेतन असार बाह्यपदार्थों में आसक्त रहना तुझे शोभा नहीं देता। ये सब विडंबनाएँ तेरे करने योग्य नहीं हैं।

एकत्व के आलंबन का प्रभाव- यह ज्ञानी पुरुष अपने यथार्थस्वरूप का यथार्थनिर्णय कर रहा है। मैं एक हूं, अद्वैत हूं, समस्त परपदार्थों से, परभावों से विविक्त हूं, सदा रहने वाला हूं, प्रभुस्वरूप हूं, सच्चिदानंदमय हूं, मेरा नाता केवल मेरे से ही है, मुझको छोड़कर बाह्य में अणुमात्र भी मेरा नहीं है। यों यह ज्ञानी अपने एकत्वस्वरूप की ओर झुक रहा है। इसी स्वरूप के आलंबन में निश्चयप्रत्याख्यान होता है, तब जो परभाव हैं, वे सब इस अंतरात्मा से दूर हो जाते हैं।


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