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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 114

From जैनकोष



कोहादिसगब्भावक्खयपहुदिभावणाए णिग्गहणं।

पायच्छित्तं भणियं णियगुणचिंता य णिच्छय दो ।।114।।

अविकारस्वभाव के उपयोगरूप निश्चयप्रायश्चित- क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक अपने विकार भावों के विलय की भावना में अपने आपके उपयोग को बनाए रहना और आत्मा के सहजसिद्धस्वभाव का चिंतन करना- यह निश्चय से प्रायश्चित्त कहा गया है। निश्चयप्रायश्चित में यह सामर्थ्य है कि समस्त कर्मों को यह मूल से उखाड़ देता है। जहां अविकारपरिणमन हो, वहां विकारपरिणमन कैसे रह सकता है? जहां अविकारस्वभाव का आलंबन हो, वहां अविकारपरिणमन चलता है। इस अनादिकाल से कर्ममल से दूषित चतुर्गति संसार में भ्रमण करते चले आ रहे हैं, यह सब अपने को विकारात्मक प्रतीत करने का परिणाम है। इस जीव ने कभी भी अपने को अविकारस्वभावरूप से निश्चय नहीं किया है। यदि अविकारी स्वभावरूप से निश्चय कर ले तो न इसे कोई आकुलता रह सकती है, न कोई उलझन रह सकती है।

ज्ञानप्रकाश से निमित्तनैमित्तिक बंधन का त्रोटन- भैया ! उलझन किसी बाहरी क्षेत्र में नहीं है। जगत् में अनंत पदार्थ हैं, ये सब पदार्थ अपना-अपना स्वतंत्र स्वरूप रखते हैं। प्रत्येक पदार्थ में अपना-अपना परिणमन निरंतर चलता रहता है, फिर किसी भी अन्य पदार्थ के परिणमन से किसी अन्य पदार्थ में उलझन कैसे आ सकती है? पुद्गल पुद्गल में निमित्तनैमित्तिक संबंध है, वह विवश है, होता है ऐसा। जीव और कर्म में भी निमित्तनैमित्तिक संबंध है और इस निमित्तनैमित्तिक बंधन में यह जीव भी विवश है, परंतु उसकी विवशता अनुपाय नहीं है। जब यह जीव अपने अविकारस्वभाव को संभालता है तो वही यह लोक है, वही यह शरीर है, वही कुछ काल तक व्यापार भी रहता है, फिर भी ज्ञानप्रकाश में जीव का बंधन और संसारभ्रमण नहीं रहता है। अविकारस्वभाव से इस जीव ने अपने आपको पहिचाना होता तो आज यह दुर्गति न होती।

प्रबल संकट के विनाश का सुगम उपाय- मोह का ऐसा प्रबल प्रताप छाया है कि यह जीव जिस शरीर में पहुंचता है, उस शरीर को ही ‘यह मैं हूं’ यों आत्मारूप से स्वीकार करता है। साथ ही जो समागम इसे मिला है, उस समागम में ‘यह मेरा है’ ऐसा ममत्वपरिणाम करके अपने आपकी अनंत आनंदनिधि को भूल जाता है। ऐसे प्रबल संकट में फंसा हुआ यह जीव आज बहुत अपूर्व अवसर को प्राप्त हुआ है। यह चाहे तो क्या अज्ञान और ममता का परित्याग करके अपने प्रकाश का अनुभव न कर सके? सब ज्ञानसाध्य बात है। यदि कठिन तपश्चरण नहीं बनता है तो कठिन तपश्चरण न करे, उस पर जोर नहीं दिया जा रहा है, परंतु जो केवल एक जानने-मानने के उपाय से ही बहुत बड़ा काम हो सकता है तो उस विधि से जानना और मानना भी न बन सके तो यह महामूढ़ता है। उपयोग द्वारा केवल अंतरंग में अपने आपको सहजस्वरूप में देखना है। इतनाभर कोई काम कर सके तो उसने धर्मपालन किया।

धर्म के आश्रय में सर्वदा आनंद का लाभ- धर्मात्मा पुरुष जब तक संसार में रहता है, तब तक संसार की सुखसमृद्धियों को भोगता है, फिर शीघ्र ही संसार को समाप्त करके यह निर्वाण को प्राप्त कर लेता है। धर्म में सर्वत्र आनंद ही आनंद है। धर्म करते हुए कुछ काल तक संसार में रहता है तो भी आनंद है और धर्म के फल में संसार के संकट नहीं रह सकते हैं। सो संसार के संकटों से छूटकर मुक्तावस्था व्यक्त है तो वहां आनंद रहता ही है। यह धर्म समस्त कर्मों को मूल से नष्ट करने में समर्थ है। इन रागद्वेषादिक कर्मों का कैसे विनाश हो, इसका उपाय एक कारणसमयसार की भावना है। समस्त मोह, राग, द्वेष विभावों को दूर करने में समर्थ ऐसे स्वभाव वाला जो निज कारणप्रभु है, चैतन्यस्वभाव है, उस स्वभाव की भावना होने पर स्वत: ही प्रायश्चित्त हो जाता है।

अपराधों का प्रायश्चित्त अपराध न करना- अपराधों का प्रायश्चित्त अपराध न करना है। इस जीव ने राग, द्वेष, मोह का विकट अपराध किया है, विषय-कषायों में लगे रहने का घोर पाप किया है। अब उसका प्रायश्चित्त यह है कि उन पापों को न करे और परमात्मगुणात्मक जो शुद्ध अंतस्तत्त्व है, उस स्वरूप जो सहज ज्ञानादिक गुण हैं, स्वभावगुण हैं, उनका चिंतन करे। यह ज्ञानी द्वारा किया जाने योग्य निश्चय प्रायश्चित है। प्रायश्चित्त का यह भी अर्थ होता है- प्राय: मायने अपराधों का व चित्त का याने शोधन करना। अपराधों का शोधन निरपराधस्वभाव की भावना में है अपराध शब्द का क्या अर्थ है? अप मायने दूर हो गई है राधा जिससे। ‘अपगता राधा यस्मात् स अपराध:।’ राधा नाम सिद्धि का है। कोई किसी का नाम राधा व सिद्धि रख ले तो यह बात अलग है। राधा नाम है आत्मसिद्धि का। आत्मा के निरपेक्ष सहज चैतन्यस्वरूप का उपयोग होना- इसका नाम राधा है। यह राधा जहां नहीं रहती है, ऐसे परिणाम का नाम अपराध है।

काम बैरी से त्रस्त होने पर भी काम की दासता में मौज मानने की मूढ़ता- काम, क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह- ये 6 जीव के वास्तविक बैरी हैं। यह जीव दूसरे जीवों को बैरी समझ रहा है- ऐसी जो उसकी समझ है, वह समझ है उसका बैरी। दूसरा जीव बैरी नहीं है। इन 6 बैरियों के स्वागत में लगे हुए संसारी प्राणी कितने क्लेश पा रहे हैं? यह भी अनुभव में कुछ-कुछ है, फिर भी उन बैरियों की शरण में ही यह जाता है। कोई मूढ़ पुरुष बैरियों से सताया जाये और उन बैरियों का ही आदर करे तो यह विवेक तो नहीं है ना? इसी प्रकार हम आप सब जीव काम, क्रोध आदिक 6 बैरियों से सताये हुए हैं और फिर भी इन्हीं को शरण मानते हैं। जो पुरुष कामवासना से आसक्त है, उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, सज्जनता नहीं रह सकती है। वह धर्म का पात्र ही क्या, जिसके चित्त में दुर्गंधित, अपवित्र मायामय शरीर ही रुच रहे हैं? जो नाक, थूक, खून आदि अशुचि पदार्थों से भरी हुई थैली है- ऐसे इस शरीर को ही जो अपना हितकारी समझ रहा है, वह धर्म कहां से करे? धर्म नाम तो आत्मा के स्वभाव का है। जिसकी दृष्टि ही पर की ओरफंसी है, वह धर्म नहीं कर सकता है।

क्रोधवैरी की गुलामी करके चतुराई मानने की मूढ़ता- क्रोध चांडाल बताया गया है। जो क्रोध करता है, जिसकी नाक-भौंह चढ़ रही हैं, लाल मुख हो गया है, कबूतर की तरह नेत्र खड़े हो गये हैं- ऐसा पुरुष शक्ल-सूरत में कितना भद्दा नजर आता है? क्रोध करते हुए की हालत में कोई पुरुष अचानक फोटो ले ले और फिर उसे खूब निरखे तो पता पड़ेगा कि क्रोध चांडाल है, लेकिन यह मोही जीव किसी बात पर क्रोध करता है तो यह क्रोध की करतूत को अपनी चतुराई समझता है।

मान के विनाश में अपराधों का प्रायश्चित्त- मान कितना घृणित विभाव है? मान करने वाले पुरुष लोगों की दृष्टि में कितने निंद्य दृष्टि से नजर आते हैं? मानी जानता है कि मैं बड़ा हूं और लोग जानते हैं कि यह अभिमानी है, मूर्ख है। यह मानी मानकषाय में रत होकर अपनी कल्पनाएँ बुन रहा है। लोग उसे नीच समझ रहे हैं। मान करके तो कोई बड़प्पन नहीं मिलता है, फिर वास्तविक परमार्थ, बड़प्पन कैसे मिले? इस जीव को गुप्त ही गुप्त मुर्दा चोटों से यह मान सता रहा है, लेकिन इसे सद्बुद्धि नहीं आती है कि मैं कभी भी मान न करूँ। मान किस पर करूँ? सर्वजीव स्वरूपत: एक समान हैं और जो गरीब, अमीर, बुद्धिमान, मूर्ख नजर आ रहे हैं, वह जीव का स्वरूप नहीं है। ये कर्मोपाधिकृत बातें हैं। मान करने का तो कुछ ठौर ही नहीं है। यह मान बैरी है। इसके विनाश से भावशुद्धि होती है और अपराधों का प्रायश्चित्त बनता है।

माया की सेवा में अपनी बरबादी- मायाकषाय जो वक्रता के रूप से उदाहरण में आती है। यह बड़ा कुटिल है, टेढ़ा है, इसकी माया ऐसी दुर्गम है कि इसके हृदय की कोई परख नहीं कर सकता है। भला इस असार संसार में कौनसी वस्तु ऐसी है, जिसको पाने के लिये मायाचार किया जाये? प्रत्येक पदार्थ छूटे हुए हैं, न साथ आए हैं और न साथ जायेंगे। इन बाह्यपदार्थों की प्राप्ति के लिए मायाचार करके अपना भविष्य और बिगाड़ लिया जाता है। इस माया के अपराध को दूर करने में समर्थ सरलता है।

लोभ की विडंबना में शरण मानने की मूढ़ता- लोभकषाय में तो यह सारा जगत् रंगा हुआ है। एकेंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक समस्त प्राणी चारों कषायों में रंगे हैं, पर लोभकषाय की तो रंगीनता प्रत्येक जीव, व्यक्ति में नजर आती है। चींटी-चींटा, कीड़ा-मकोड़ा भी अपने आहार की तलाश में रहा करते हैं, आहार को खींचे-खींचे फिरते हैं। मनुष्य तो लोभियों में सरताज है। पशु पक्षी क्या लोभ करते हैं? समय पर खाने को मिल गया तो खा लिया और संतुष्ट हो गये, कल के लिए कोई चिंता नहीं है। पक्षियों को दाने मिल गए तो खा लिए और उड़ गये, वे प्रसन्न हैं, कल के लिए संचय करके कुछ नहीं रखते। देखा होगा कि जब उन्हें वेदना होती है तो तलाश करके खा लिया और पेट भर गया काम खत्म हो गया। पर ये मनुष्य इतना संचय करते हैं कि उस धन से कई पीढ़ी बैठकर खायें, खा सकें। उतने धन से तो भी संतोष नहीं हो पाता है। अरे, फिर संतोष कब किया जाएगा? बडे-बडे गरीब, दीन, भिखारी इस लोक में अपना गुजारा कर रहे हैं। अरे उनकी अपेक्षा हम आप सबकी स्थिति कितनी उच्च है? लेकिन तृष्णा के कारण इस प्रकार की पाई हुई स्थिति में भी चैन से नहीं रह सकते हैं। यह लोभ भी इस जीव को बुरी तरह से पीड़ रहा है, लेकिन यह मोही प्राणी अज्ञानवश इस लोभ की ही शरण में बना रहता है।

ज्ञानस्वभाव की भावना में अपराधों का विलय- जो आत्मा में सहज अनादि अनंत अहेतुक परमपारिणामिक भाव है, उसकी भावना होने पर ये सब प्रायश्चित स्वयमेव हो जाते हैं। ये कामादिक 6 प्रकार के विकारों के किए जाने का जो महान् अपराध है, उस अपराध के क्षय की संभावना अथवा उन अपराधों के क्षय करने में ये समर्थ अविकार ज्ञानानंदस्वरूप को सम्यक्भावना ही उग्र प्रायश्चित्त है। जैसे किसी घर में छोटे बालक उद्दंडता कर रहे हों, ऊधम मचा रहे हों तो किसी एक घर के महापुरुष की ललकार से ही वे सब बच्चे ऊधम छोड़कर एक कोने में शांत होकर बैठ जाते हैं और फिर उस कमरे को त्याग भी देते हैं, इस ही प्रकार इस अध्यात्म क्षेत्र में ये काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह आदिक विभाव ऊधम मचा रहे हैं। एक अविकारी ज्ञानस्वभाव की दृष्टि थोड़ा ही किलकार देती है तो ये समस्त विकार अपना ऊधम छोड़कर शांत हो जाते हैं और निकट समय में ही इस आत्मा को छोड़ भी देते हैं। एक ज्ञानस्वभाव की भावना के सिवाय अन्य कुछ इस जीव का शरण नहीं है।

प्रभुता के प्रयोग का अनुरोध- बड़े-बड़े ऋषि-संतों ने तपश्चरण के द्वारा शुद्ध पद का आनंद भोगकर, उससे तृप्त होकर जगत् के जीवों पर करुणा करके यह बात कही थी कि लोक की विभूति में कुछ आनंद नहीं है, इसकी ओर दृष्टि आकुलता को पैदा करती हुई ही होती है। आत्मा रोता ही जाता है जब यह बाहरी पदार्थों में लगता है। सूना, हल्का प्राणी जैसे अधीर होकर डोलता रहता है ऐसे ही अपने उपयोग से सूना यह जीव भी जगत् में बाहरी पदार्थों की आशा कर करके डोलता रहता है। इसे अपने आपके पद में ठौर न मिलने के कारण चैन नहीं मिलती है। सुख के लिए यह जीव अनेक उपाय करता है। अनेक उपाय करके देख भी लो, किन्हीं भी उपायों से आत्मा में शांति आ नहीं सकती। केवल एक सम्यग्ज्ञान के अर्जन का उपाय ही सत्य उपाय है। जिस उपाय से, नियम से शांति उत्पन्न होगी। शांति आत्मा की परिणति है, वह किसी बाह्य पदार्थ के आश्रय से कहाँ प्रकट हो सकती है? शांत स्वभाव की ज्ञानप्रकाशमय जो आत्मा की प्रभुता है उस प्रभुता के उपयोग में ही शांति मिल सकती है।

आत्मोद्धार का उपाय- भैया ! एक सहज निजतत्त्व का आलंबन छोड़कर अन्य बातों में फँसने से क्या हाल होता है, इसके लिए ये सारे अमीर और गरीब लौकिक उदाहरण हैं। बहिर्मुखदृष्टि में न तो अमीर प्रसन्न हैं और न गरीब प्रसन्न हैं। अज्ञानवश सभी संसारी प्राणी अपने उपयोग को भटका रहे हैं। यहाँ कुंद-कुंद प्रभु आत्मोद्धार के उपाय में यह कह रहे हैं कि क्रोधादिक विकारभावों से हम दूर हों, इस प्रकार की भावना बनाएँ और अपने शुद्ध, सहज, सनातन, चिदानंदस्वरूप का दर्शन करके, चिंतन करके अपने आपको संतुष्ट करें। अपने आपमें यह परमार्थ संतोष मिल सके तो इस जीव का मोक्षलाभ अति निकट है। ऐसे ही मूल ग्रंथों में और आचार्य के ग्रंथों में एकमात्र ही उपाय आत्मा के उद्धार का कहा गया है।


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