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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 119

From जैनकोष



अप्पसरूवालंवणभावेण हु सव्वभावपरिहारं।

सक्कदि काउं जीवो तम्हा झाणं हवे सव्वं ।।119।।

विभावापराध के परिहार में समर्थ आत्मध्यानरूप प्रायश्चित्त- यह शुद्धनय प्रायश्चित्त का अधिकार है। इसमें वास्तविक प्रायश्चित्त बताया है। कोई अपराध हो जाय तो उस अपराध को दूर करने के लिए प्रायश्चित्त ही समर्थ है। जब तक अपराधों का प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता है तब तक अपराध दूर नहीं होते। व्यवहार में तो गुरुवों से अपना कसूर बता दिया निष्कपटभाव से जैसा का तैसा और गुरुवों ने जो आदेश दिया उसका पालन किया, यह प्रायश्चित्त है, पर परमार्थ से प्रायश्चित्त अपने आपमें विराजमान् उस स्वरूप का दर्शन करना है जिसमें अपराध का स्वभाव ही नहीं है। अपराध मिटाने के लिए निरपराध आत्मस्वरूप का उपयोग करना और उस शुद्ध आत्मस्वरूप के देखने में मग्न हो जाना, यह है वास्तविक प्रायश्चित्त। आत्मा के स्वरूप के अवलंबन के परिणाम से समस्त दोषों का परिहार करने में यह जीव समर्थ होता है। इसलिए वास्तव में जो आत्मा का ध्यान है वही सब कुछ है।

आत्मध्यान की सर्वसिद्धिरूपता- किसी को शांति चाहिये तो वह शांति भी यही है कि सर्व बाह्य विकल्पों को त्यागकर अपने स्वरूप का आलंबन करना, यही शांति का स्वरूप है। गुणविकास चाहिए तो उसका भी यह उपाय है कि गुणों का सागर जो अपना स्वरूप है उस स्वरूप का आलंबन कर लें। सब सिद्धि इस ही रूप में बसी हुई है, बाहर कहीं कुछ सिद्धि नहीं है। यह बाह्य पदार्थों का धनवैभव का समागम भी यदि मिलता है तो यह अपने स्वरूप की उपासना का किसी अंश तक फल है। कोई आत्मा मलिन है, क्रूर है, पापी है, उसकी स्थितियां संसार में बुरी हुआ करती हैं। कोई पुरुष शुद्ध विचार वाला है, कषायों को नहीं करने वाला है, मंदकषायी है और व्रत, तप, दान, दया सबमें जिसकी परिणति है, भोगों से विषयों से उदासीन है, वह पुरुष नियम से अच्छी गति पाता है।

निश्चयधर्मध्यान में गमन- भैया ! वर्तमान में कुछ भी उपसर्ग आये, कोई भी विपदा आये, उसमें घबरायें नहीं, धैर्य रखें और एक निर्णय के साथ कि मुझे तो मेरे स्वरूप का आलंबन ही शरण है, बस आत्मस्वरूप की उपासना में लग लिया जाय, यही हम आप सबका करने योग्य पुरुषार्थ है। इसमें शुद्ध निश्चय के नियम का वर्णन है। नियमों से सर्वोपरि नियम यह है कि सर्वविकल्पों का परिहार करके अपने इस शुद्ध ज्ञानज्योतिमात्र आत्मस्वरूप में मग्न हो जायें। इसमें सब नियम आ गये। भिन्न-भिन्न और कुछ नियमों के यहां विकल्प करने की आवश्यकता नहीं है। बाहर में जितने भी नियम किये जाते हैं वे सब इस अंत:स्वरूप में उपयोग को नियमित, निश्चित, स्थिर बनाने के लिए किए जाते हैं। इसमें अपने आत्मा के आश्रय होने वाले निश्चय धर्म का समावेश है। विकल्प हटाकर केवल ज्ञानप्रकाश का अनुभव करना यह है निश्चय धर्मध्यान। यह धर्मध्यान समस्त विभावों को दूर करने में समर्थ है। जो जीव अपने आपके चैतन्यस्वरूप की भावना करते हैं, जो चैतन्यस्वरूप समस्त परद्रव्यों से न्यारा प्रकाशमान् है उस पुरुष के विभाव ठहर नहीं सकते। देह में रहते हुए भी ऐसा उपयोग बनाना चाहिए कि देह की याद भी न रहे और साथ ही बाहर में किसी भी पदार्थ की याद न रहे।

मोह के विकल्प- मोही जीव के कभी-कभी ऐसा तो हो जाता है कि अपने देह की भी याद नहीं रहती, किंतु देह से भी विकट जो परद्रव्य का वियोग है वह हो जाता है। जैसे गाय का बछड़े पर बहुत मोह रहता है। बछड़ा यदि बड़ी भयंकर विकट नदी में गिर जाय तो वह गाय भी अपने शरीर का ध्यान नहीं रखती और उस बछड़े के मोह में उसके पास पहुंचने के लिए कूद जाती है। तो देह का ध्यान तो उसे भी नहीं रहा, किंतु ऐसा खोटा ध्यान, रागभरा ध्यान, मोहभरा ध्यान उसके हुआ कि देह से भी विकट बन गया। यों ही विषयों के साधन जुटाने में मोही पुरुष अपने देह की भी खबर नहीं रखते हैं, लेकिन वे परपदार्थों के प्रति आसक्ति तो रख रहे हैं, और ऐसा भी नहीं है कि उन्हें देह का ध्यान नहीं है। भीतर में, वासना में, संस्कार में देह की आत्मीयता बराबर पड़ी हुई है। यदि देह में आत्मीयता न होती तो बाहर के विषय-साधनों में भी वे जुटे न रहते।

प्रत्यग् ज्योति का आश्रय- जो जीव देह से भी भिन्न अपने स्वरूप का उपयोग रखते हैं वे विषय-साधनों से सहज ही विरक्त रहा करते हैं। अपने आपके स्वरूप को देखो, आत्मा जो जानने वाला, देखने वाला है वह किसी रंग में नहीं हुआ करता है। मेरे आत्मा का रंग काला हो, पीला हो, नीला हो किसी प्रकार के रंग का हो यह जानन परवस्तु में नहीं होता है। इस जानने वाले, इस ज्ञातास्वरूप आत्मतत्त्व में किसी प्रकार का रस नहीं है। यह तो आकाश की तरह अमूर्त निर्लेप है, सबसे न्यारा है, किसी से रंच भी संबंध नहीं है, उसमें खट्टा, मीठा, कडुवा, कषायला किसी भी प्रकार का रस नहीं है; न गंध है, न छुवा जा सकता है, यह तो आकाश की तरह अमूर्त किंतु अपने ज्ञानादिक गुणों का आधारभूत चैतन्यतत्त्व है। समस्त परद्रव्यों से स्वभावत: न्यारा है, ऐसे स्वरूप की यदि खबर हो जाय तो तीन लोक का वैभव भी इस धन के आगे न कुछ चीज है। अपने इस स्वतंत्र आत्मतत्त्व की जिन्हें खबर नहीं है वे करोड़ों की संपदा भी रखे हों तो भी दीन हैं, गरीब हैं, भिखारी हैं, संसार के जन्म-मरण के बढ़ाने वाले हैं।

धर्मरत्न- सर्वोत्कृष्ट पुरूषार्थ रत्न है यह कि अपने आपके शुद्ध स्वरूप का अनुभव हो जाय, यह आत्मतत्त्व समस्त परद्रव्यों से स्वत: ही जुदा है, अक्षुण्ण है, किसी भी प्रसंग में आत्मा का खंड नहीं हो सकता। आत्मा में बाधा नहीं आ सकती। इसका विनाश नहीं हो सकता। यह आत्मा अमूर्त है, निर्दोष है, अखंड है, सदा प्रकाशमान् है, आत्मा के स्वरूप पर कोई आवरण नहीं है, परंतु देखने वाले को दिख सकता है। ज्ञानी के लिए यह आत्मदर्शन व्यक्त है, अज्ञानी पर तो आवरण अज्ञान का छाया ही हैं। यह बात कही जा रही है पूरा जिससे पड़ सके ऐसे पते की। भगवान के दर्शन पूजन करने का यही लक्ष्य है कि आत्मदर्शन हो। यह चीज न पायी तो वह दर्शन पूजन भी बेकार रहा। यदि आत्मस्वरूप का अनुभव न कर सके तो उस भजन-पूजन का भी लाभ न प्राप्त कर पाया। तत्त्वज्ञान की बात मिलना बहुत दुर्लभ बात है। इस ज्ञान के आगे तीन लोक का भी वैभव न कुछ चीज है।

आंतरिक धर्म के अभाव में धर्मफल का अभाव- ऐसे लोग भी जो ज्ञान में अब भी बच्चे जैसे हैं। धर्म पालन के लिए बहुत श्रम कर रहे हैं, पूजा, भक्ति, यात्रा, समारोह, विधानादि और द्रव्य भी बहुत खर्च करते हैं, परंतु यदि वहाँ भी वास्तव में धर्म करता होता तो धर्म की बात पढ़ने-सुनने में इसे रुचि क्यों नहीं जगती? यदि धर्म की बात मानने की रुचि नहीं जगती है तो यह निर्णय करना कि सब परिश्रम तो जो धर्म के नाम पर किए जा रहे हैं उनका उद्देश्य ही प्राप्त नहीं हो सका और वह धर्म श्रेणी में नहीं है। भले ही तन, मन, धन, वचन, सब कुछ भी धर्म के लिए किया जा रहा है, लेकिन वहाँ न एक भी कर्म का क्षय हो सकता, न बंध रुक सकता है। हाँ, कभी इतना अंतर आ सकता है कि शुभ परिणाम होने से अथवा तीव्र कषाय न रहने से उसके पापबंध कम होगा। प्रथम तो यह भी निश्चित नहीं है कि पूजा करते हुए में पुजारी के तीव्र कषाय न रहे। हाँ, एक मंदिर के स्थान में पहुंचा है इसलिए लड़ाई करने को उसे कोई नहीं मिल रहा है तो लड़ाई तो नहीं कर रहा है, किंतु हरदम उसने विषयसाधनों की ओर दृष्टि की है, मेरी संपदा बढ़े, मेरा घर सुखी रहे, यदि किसी प्रकार की वासना लगायी है तो वह तीव्र कषाय है, इसको ही अनंतानुबंधी लोभ कहते हैं। धर्म के नाम पर धर्म करते हुए विषयों के प्रति लोभ पहुंचना, यह अनंतानुबंधी लोभ है। तीव्र कषाय ही तो हुई। कषायें भी तो वहाँ मंद नहीं हो सकी, जिसने अपने आपमें विराजमान् इस कारणप्रभु को नहीं निरखा है।

चैतन्य परमप्रभु की उपासना का प्रताप- निरावरण सहज परमपारिणामिक भाव चैतन्यस्वरूप की उपासना ही परमशरण है। उसकी उपासना से अन्य भावों का विलय हो जाता है। जीव के भाव 5 हैं- औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक। इनमें से निरपेक्ष शुद्ध तत्त्व है पारिणामिक चैतन्यस्वरूप। उस चैतन्यस्वरूप का अवलंबन करने से यदि उपशमन पद्धति बने तो औपशमिक भाव प्रकट होता है क्षयण पद्धति बनती है तो क्षायिक भाव प्रकट होता है। इस तरह शेष के चार भावों में ये औपशमिक और क्षायिक दो भेद निर्दोष भाव हुए, दोषों को हटाकर प्रकट होने वाला भाव हुआ, क्षायोपशमिक है कुछ दोषों को हटा देना, कुछ दोषों का ग्रहण होना, ऐसा मिलवां भाव है और औदयिक भाव तो बिल्कुल ही दोषों को प्रकट करने वाला भाव है। ये चारों ही भाव सापेक्ष भाव हैं जिनमें औदयिक तो पूर्ण विभाव है, क्षायोपशमिक भाव विभाव और स्वभाव का एक मध्यमरूप है। औपशमिक भाव, क्षायिक भाव यद्यपि स्वभाव को प्रकट करने वाले हैं फिर भी सापेक्ष हैं। कर्मों के उपशम से औपशमिक और क्षय से क्षायिक भाव होता है। उत्कृष्ट, विशुद्ध, एकपंचम परमपारिणामिक भाव है जिसका आलंबन करने से इन चारों भावों का भी परिहार हो जाता है। राग, द्वेष, मोह इनका अत्यंत अभाव हो जाता है।

अत्यासन्न भव्यात्मा- इन विभावों का विनाश करने में समर्थ अतिनिकट भव्य जीव जिसको संसार के संकटों से छूटने का अवसर आया है उसे ही इस धर्म की रुचि हो सकती है। वास्तविक धर्म अपना स्वभाव है। शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप की रुचि उस जीव के ही प्रकट होगी जिसका संसार से छूटना निकट है, मुक्ति की प्राप्ति निकट है। ऐसे आसन्न भव्य जीव एक इस आत्मा के स्वरूप का आलंबन करके इस समस्त पापरूप जंगल को जला डालता है। वह जाज्वल्यमान् ऐसी अग्नि है कि जिसके समक्ष ये पाप ठहर नहीं सकते, भस्म हो जाते हैं।

सम्यक् परम निर्णय- जो आत्मा अपने स्वरूप का अभ्यास करते हैं उन्हें सिद्धि होती है। अपने आपमें यह निर्णय रखिये कि मुझे सब कुछ मिल सकेगा तो निज परमात्मप्रभु की उपासना से मिल सकेगा। जगत् के मोही, रागी, द्वेषी जीवों की क्या अपेक्षा करना? श्रद्धान निर्मल बनाओ। निर्मल श्रद्धान यही है जो अंतरंग में एक यह निर्णय रहता है कि मेरा भला, मेरी शरण, मेरे शुद्ध स्वरूप का आलंबन है, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ न भला है, न शरण है। मेरे लिए अपने आपके स्वरूप का आलंबन करना कर्तव्य है, यही शुद्धनय प्रायश्चित्त है।

आत्मध्यान में व्रतों की पूर्ति- यह आत्मध्यान सभी प्रकार का तपश्चरण है। पंच महाव्रतों की पूर्ति इस आत्मध्यान से होती है। हम जीवों की दया-दया तो करते रहें और जीव का जो यथार्थ स्वरूप है, उसका भान न रहे तो उसने संसार का भ्रमण तो नहीं मिटाया तो वास्तव में उसके अहिंसा की पूर्ति नहीं हुई। यों ही शेष के चार व्रतों की भी यही बात है। कोई खूब सत्य बोले, चोरी न करे, ब्रह्मचर्य पाले, घरबार, कुटुंब परिजन, पैसा वस्तु सबका त्याग करके निर्ग्रंथ रूप भी रख ले, किंतु यदि आत्मस्वरूप की खबर नहीं, अपने इस सहजस्वरूप की खबर नहीं है, अपने इस सहजस्वरूप का अनुभव न हो तो ये सब व्रत भी वास्तव में व्रत नहीं कहला सकते। वास्तविक उनकी परमार्थ पूर्ति नहीं होती। यदि एक आत्मस्वरूप का बोध हो, उसका आलंबन हो तो उसकी पूर्ति हो जाय, यों इस आत्मध्यान में ही महाव्रतरूप तपश्चरण होता है।

आत्मध्यान में समितियों की पूर्ति- समितियां भी इस आत्मस्वरूप के आलंबन से संबंध रखती हैं। सूत्र जी में पढ़ा होगा, पंचमहाव्रतों को तो बताया है कि ये आस्रव करने वाले हैं, कर्मबंध करने वाले हैं। कौनसे कर्म का, पुण्यक, सुकृत का, पापकर्म का नहीं। महाव्रतों का पालन करने से पुण्य का बंध होता है, पर समितियों का पालन करने से कर्मों का बंध रुकता है, निर्जरा होती है। अब कुछ सुनने में अटपटसा लग रहा होगा। व्रतों का पालन तो बैठे-बैठे किया जा रहा है, किंतु समिति का पालन तो कुछ काम करें तब होता है। ईर्यासमिति से चलें, भाषासमिति से बोलें, आहार के लिए एषणासमिति से जायें, चीजों को धरें, उठायें तो आदान-निक्षेपणसमिति से धरें उठायें। मल-मूत्र की भी प्रतिष्ठापनासमितिरूप पद्धति है। इन समितियोंरूप काम करें तब समितियों का पालन होता है, परंतु ज्ञानी जीव को वह कौनसा प्रकाश जगा है जिस प्रकाश के कारण इन समितिरूप वृत्तियों में भी संवर भाव और निर्जरा भाव चल रहा है। वह है इस आत्मा के उज्ज्वल सहजस्वरूप की दृष्टिरूप सिद्धि।

समितियों की तरह गुप्ति आदि की भी पूर्ति आत्मध्यान में- इस अध्यात्मस्वरूप के अवलंबन सहित अपने आपमें सत्य-प्रवर्तन करने वाला, अपने ही स्वभाव का ग्रहण और अपने ही विभाव का निक्षेपण करने वाला और अपने आपको अपने आपमें ही प्रतिष्ठित करने वाला यह अध्यात्मयोगी बाहरी प्रकृति भी कर रहा है तब भी कर्मों का संवर चलता है। यों समितियों की पूर्ति जैसे अपने ही सहजस्वरूप के अवलंबन में होती है, ऐसे ही गुप्ति मन, वचन, काय को रोक दें यह भी आत्मध्यान में बनता है। प्रत्याख्यान वस्तुओं का परित्याग करने में, आत्मध्यान में ही हो पाता है। ये प्रायश्चित्त आलोचना आदिक समस्त प्रकार के तपश्चरण इस आत्मस्वरूप के अवलंबन से बनते हैं। इस कारण यह आत्मध्यान ही सब कुछ है। सुख, ज्ञान, हित, कल्याण सब सिद्धि आत्मा के ध्यान से ही है। जो पुरुष स्थिर भाव से इस ज्योति के दर्शन के द्वारा राग द्वेष मोह अंधकार का विनाश कर देते हैं, जो अनादि अनंत शाश्वत स्हजस्वरूप का आलंबन किए हैं, जिस पुरुष ने इस आनंदस्वरूप ज्योति का ही उपयोग किया है, ऐसा यह शुद्ध आत्मा शुद्ध आचरण का पुन्ज है।

शुद्धाचारस्वरूप भव्यात्मा- सब सदाचारों में श्रेष्ठ आचार केवल एक यह ज्ञानस्वरूप में मग्न होना है। ज्ञानस्वरूप के मग्न होने पर फिर कौनसा आचरण बाकी रह गया? उसने समस्त आचरण कर लिये। ऐसा यह शुद्ध आचरण पुन्ज इस आत्मध्यान के प्रताप से शीघ्र संसार से मुक्त हो जाता है। इस संसार में यदि कुछ सोने चाँदी के टुकड़े मिल गये। इनसे इस आत्मा का क्या भला हो सकता है? ये तो इस आत्मा से भिन्न हैं। अचानक ही किसी दिन मरण कर गए तो सब कुछ यही पड़ा रह जायेगा। जो पुरुष अपने जीते जी उदारता प्रकट करते हैं और त्याग की भावना का प्रयोग करते हैं वे अपने आपमें एक ज्ञान वैराग्य का धन ले करके जा रहे हैं। उन्हें अगले भव में भी जब तक संसार शेष है तब तक वैभव का समागम मिलता रहेगा और जो यहाँ के वैभव की तृष्णा रखते हैं, ऐसे पुरुषों को आगे वैभव नहीं मिल सकता है। वे तो न जाने कैसी दुर्गति में जायेंगे?

परम लाभ- भैया ! इस ज्ञान वैराग्य से इस आत्मस्वरूप के आलंबन से इस भव में भी आनंद बरसता है और परभव में भी आनंद का समागम होता है। इस कारण प्रत्येक प्रयत्न करके अपने तन, मन, धन, वचन सब कुछ न्यौछावर करके एक इस सहज शुद्ध ज्ञानानंदमय आत्मस्वरूप का आलंबन करना चाहिए, और इस परमशरण की प्राप्ति के लिए ज्ञानार्जन में अपना चित्त लगाना चाहिए। जो कुछ भी प्राप्त हैं वे सब भी न्यौछावर हो जाएँ और एक यथार्थ तत्त्वज्ञान का अनुभव हो जाय तो उसने सब पाया। हम अरहंत सिद्ध के स्वरूप को क्यों पूजते हैं? क्या उनके पास कुछ धन है? अरे ! उनके ये बाह्य वैभव धन नहीं हैं, किंतु आत्मीय ज्ञानानंद की निधि उनके पूर्ण प्रकट हुई है, इसलिये वे पूज्य हैं, धन्य हैं, कल्याणार्थिंयों के उपास्य हैं।


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