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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 122

From जैनकोष



वय.णोच्चारणकिरियं परिचत्ता वीयरायभावेण।

जो झायदि अप्पाणं परमसमाही हवे तस्स ।।122।।

परमसमाधि अधिकार का निर्देश- प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना एवं प्रायश्चित्त के अधिकार के बाद अब परमसमाधि नाम का अधिकार कहा जा रहा है। इन समस्त प्रतिक्रमण आदिक उपायों का लक्ष्य परमसमाधि भाव है। आत्मा में रागद्वेष विषय-कषायों का अभाव होकर केवल ज्ञानप्रकाशमात्र का ही प्रकाश चलता रहे, इसको परमसमाधि कहते हैं। जो जीव परमसमाधि से विमुख हैं और विषय-कषाय भावों में लग रहे हैं, उस ओर ही जिनकी दृष्टि है वे पुरुष संसार के संकट सहते हुए काल गवाँ रहे हैं। इस आत्मा का कल्याण करने वाला भाव है तो यह परमसमाधि है। परमसमाधि भाव कैसे प्रकट होता है और उसका क्या-क्या स्वरूप है? इन सब बातों का वर्णन इन परमसमाधि अधिकार में कहा जा रहा है।

परमसमाधि की सिद्धि के लिए वचनपरिहार की आवश्यकता- यह परमसमाधि समस्त मोह रागद्वेष विभावों का, आत्मा के वास्तविक शत्रुवों का विध्वंस करने में एकमात्र कारण है। जो पुरुष वचनों के बोलने की समस्त क्रियावों को त्यागकर वीतराग भाव से आत्मा का ध्यान करता है उस भव्य आत्मा के परमसमाधि होती है। व्यवहार और बाह्य पदार्थों के स्नेह में बढ़ना आदिक उपद्रवों का व्यावहारिक कारण है वचन बोलना। वचन बोलते हुए की स्थिति में समतापरिणाम आ नहीं सकता। राग की वेदना के बिना कोई वचन नहीं बोलता, इसलिए वचनों के उच्चारण का प्रथम परिहार कराया गया है।

परमसमाधि में अंत: व बहि:जल्प का परिहार- यद्यपि कभी अशुभ क्रियावों से हटने के लिए वीतराग सर्वज्ञदेव का स्तवन आदिक करना चाहिये, शास्त्रों का वाचन और उपदेश करना चाहिये। ये वचन उस काल में आवश्यक हैं। बड़े-बड़े योगीश्वर, मुनीश्वर भी प्रभुस्तवन, स्वाध्याय, वाचन, धर्म उपदेश आदिक वचन व्यवहार किया करते हैं तथापि वचनों के विषय का जो व्यापार है अर्थात् आत्मा का प्रयत्न है वह सब समाधिभाव का साक्षात् घातक है, अत: किसी भी प्रकार का वचनालाप न करना चाहिए। देखो सबसे प्रथम नियंत्रण किया गया है परमसमाधि भाव की प्राप्ति के लिए वचनव्यवहार का। वचनालाप का सर्वथा त्याग करना चाहिए और इतना ही नहीं कि ये बाहरी वचन ही त्यागे जायें किंतु अंतरंग में कुछ जो गुनगुनाहट चलती है वह शब्दरचना का अंतरंग व्यवहार भी छूट जाना चाहिए। प्राय: सभी जीवों के कुछ भी परिज्ञान होता है तो वह परिज्ञान किन्हीं शब्दों को लेकर होता है, चाहे वे शब्द मुख से न बोले जायें, किंतु अपने अंतरंग में वे शब्द उठते हैं ज्ञान के साथ-साथ। ऐसे इन शब्दों का इस जीव के साथ लगाव लग रहा है, उन अंतर्जल्पों का भी परिहार करके यह जीव परमसमाधि में लगता है।

सहजस्वरूप के ध्यान में परमसमाधि का अभ्युदय- जो आत्मा इस शुद्ध ज्ञायकस्वरूप अंतस्तत्त्व का ध्यान करता है, बाहरी कुछ नहीं विचार करता, स्वयं का अपने आप स्वभाव से जो स्वरूप है उस स्वरूपरूप में जो आत्मा को ध्याता है उस पुरुष के परमसमाधि होती है। इस परमपारिणामिक भाव अथवा शुद्ध अंतस्तत्त्व के ध्यान करने का साधन क्या है? स्वयं ही अभेद वीतराग भाव। जो स्वभाव समस्त कर्मकलंकों से रहित है, जिसमें न तो ज्ञानावरणादिक कर्म हैं और न रागद्वेषादिक भाव कर्म हैं और न जिनमें प्रदेश परिस्पंदरूप क्षेत्रकर्म हैं और न जिसमें जानन के परिवर्तनरूप भी कर्म हैं ऐसे उस कर्मकलंकमुक्त शुद्ध आत्मतत्त्व को जो ऐसे ही विशुद्ध ज्ञानध्यान से ध्याता है उसके परमसमाधि होती है।

त्रिकाल निरावरण परमब्रह्म- यह अंतस्तत्त्व त्रिकाल निरावरण है, जो परविषयक विकल्प भाव को तजकर अपने अंतर में अखंडस्वरूप को निहारता है उसे यह आत्मा दर्शन दे रहा है। यह त्रिकाल निरावरण है। वस्तु के स्वभाव पर कभी भी आवरण नहीं होता है, चाहे वस्तु का स्वभाव कुछ भी प्रकट न हो, न सही, पर स्वभाव का आवरण नहीं होता है। जैसे दृष्टांत में मान लो पानी का स्वभाव ठंडा रहना है, चाहे पानी खूब खौल रहा हो अग्नि के संबंध से, किंतु उस खौलते हुए पानी के होने पर भी पानी में ठंडा रहने का जो स्वभाव पड़ा है वह स्वभाव नहीं मेटा जा सकता है। बर्तन में पानी तेज गरम है, स्वभाव से बिल्कुल उल्टा हो गया है अग्नि के संयोग से, फिर भी इस जल में ठंडे होने का जो स्वभाव है वह स्वभाव कहीं भी नहीं गया है। गरम की हालत में भी पानी का स्वभाव ठंडा है इसे कोई मना नहीं कर सकता, पानी ठंडा नहीं है, पर स्वभाव ठंडा है। ऐसे ही इस आत्मा का स्वभाव है चैतन्य, ज्ञानदर्शन। इस ज्ञानदर्शन पर आवरण पड़ा है पर्याय अपेक्षा का और यह ढका हुआ है, प्रकट नहीं हो रहा है, लेकिन न भी निगोद जैसी भिन्न स्थिति में भी जीव पहुंचा हो, तिस पर भी जीव का स्वभाव चैतन्यभाव परमपारिणामिक तत्त्व निरावरण है। यदि स्वभाव पर आवरण हो जाय तो पदार्थ का ही नाश हो जायेगा, ऐसा त्रिकाल निरावरण यह मैं अंतस्तत्त्व हूं।

शाश्वत शुद्ध परमब्रह्म- यह मैं आत्मतत्त्व त्रिकाल शुद्ध हूं, अर्थात् वह वही का वही रहता है। इस जीव ने अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण किया है, कर्मों का प्रेरा चतुर्गतियों में भटका अशुद्ध विकारी बन रहा है। इतने पर भी यह जीव जो कुछ भी होता है वह अकेले ही होता है, कोई दो पदार्थ मिलकर विकाररूप नहीं हुआ करते हैं और स्वभाव को यदि देखो तो विपरिणत होता ही नहीं। यद्यपि स्वभाव प्रकट नहीं है, यह जीव उल्टी-उल्टी चालें चलता है। रागद्वेष क्रोधादिक कषायें इन सभी विषयकषायों में यह दौड़ लगा रहा है, इतने पर भी स्वभाव नहीं बदलता है। आत्मा का स्वभाव है- ज्ञानानंद चैतन्यभाव। वह चैतन्यभाव परिवर्तित नहीं होता है। ऐसा यह मैं शुद्ध आत्मा हूं।

कारणपरमात्मा– यह मैं अंतस्तत्त्व कारणपरमात्मा हूं अर्थात् यह मैं परमात्मा होऊँगा तो अपने स्वभाव का आलंबन करके ही होऊँगा। परमात्मा होने का जो कारण है अथवा जो परमात्मा में भी उपादान है वह उपादान भी मैं सदा से हूं, अत: मेरा स्वभाव चैतन्यस्वरूप कारणपरमात्मा कहलाता है। मुक्त हो जाने पर कहीं कुछ दूसरी बात नहीं हो गयी। जो मैं हूं वही वहाँ है। जो मेरे स्वभाव में है वही चीज नित्य व्यक्त है। मुक्त होने पर कोई नवीन बात नहीं बन जाती है। जैसे किसी पाषाण की कोई कारीगर मूर्ति बनाए तो वह कहीं दूसरी चीज से लिपटकर नहीं बनी है। जो थी उस पत्थर में, जो अंग अवयव थे उस पत्थर में वे अवयव अब प्रकट दिखने लगे हैं, व्यक्त हो गये हैं। इसी प्रकार जो मेरे में स्वरूप है, स्वभाव है, सत्त्व है, जो कुछ हो, यही विकारों से हटकर उपाधियों के संबंध से हटकर केवल रह जाता है। भगवान का स्वरूप कैवल्य कहलाता है, केवलज्ञान भी बोलते हैं। इसका अर्थ है सिर्फ ज्ञानमात्र रह गया है, जो था वह केवल अकेला निरपेक्ष रह गया है।

कैवल्य संपद- हम आपके साथ द्रव्य कर्म का संबंध है। ज्ञानावरणादिक 8 कर्म हैं, रागद्वेष, विषयकषाय शरीर का बंधन भी एक क्षेत्र में है, ये तीन प्रकार की उपाधियां, विकार संपूर्ण संसारी जीवों के साथ हैं, ये तीनों ही बातें जब बिल्कुल दूर हो जायें, न तो ज्ञानावरणादिक कर्म रहें, न शरीर रहे, और न रागद्वेषादिक विभावपरिणमन रहे। जो कुछ परतत्त्व हैं वे परभाव दूर हो जायें और यह आत्मा जो था वही मात्र केवल रह जाय, इसी के मायने मोक्ष है। मोक्ष पाने के लिए कोई नयी चीज नहीं जोड़ना है, किंतु अज्ञान दशा के कारण जो नई बातें जुडी हुई हैं, रागादिक भावकर्म, ज्ञानावरणादिक द्रव्यकर्म और शरीर, जो तत्त्व जो पदार्थ नये जुडे हुए हैं उन पदार्थों को दूर करना है। जब समस्त परभाव दूर हो जाते हैं और केवल यह रह जाता है तब इसे निर्वाण होता है ऐसा कहते हैं। निर्वाण में भी उपादान कारण मैं हूं। यह मैं कारणपरमात्मा शुद्ध और त्रिकाल निरावरण हैं। ऐसे इस अंतस्तत्त्व का जो आश्रय करता है उसके परमसमाधि प्रकट होती है।

परमसमाधि के लिए धर्मध्यान का सहयोग- परमसमाधि के व्यक्त होने में धर्मध्यान और शुक्लध्यान का पवित्र सहयोग रहता है। धर्मध्यान में तो कुछ उद्यम रहता है कुछ राग भी साथ बर्त रहा है, परंतु वह वीतराग भाव का आश्रय करने वाला राग है। इस धर्मध्यान में रागद्वेषरहित स्वरूपत: स्वत:सिद्ध अंतस्तत्त्व का आश्रय रहता है। अपने आत्मा के आश्रय से जो विशुद्ध ध्यान प्रकट होता है उसे धर्मध्यान कहते हैं। इस धर्मध्यान के बल से परमसमाधि प्रकट होती है।

परमसमाधि में शुक्लध्यान का सहयोग- यह धर्मध्यान जब अपना उत्कृष्टरूप रखता है तब वहाँ उद्यम ध्यान का रंच नहीं रहता, किंतु अपने आप टंकोत्कीर्णवत् निश्चल ज्ञायकस्वरूप में यह उपयोग निरत हो जाता है, शुद्ध ज्ञानप्रकाशरूप वर्तने लगता है और उस शुक्लध्यान के बाद फिर ऐसी ही वीतरागता उसके बर्तती रहती है। इस परम शुक्लध्यान के प्रताप से ये योगीश्वर परमवीतराग तपश्चरण में लीन हो जाते हैं। उत्कृष्ट तपश्चरण रागद्वेषरहित ज्ञाता द्रष्टा रहना है। मोही जीव के तपश्चरण की सुध नहीं है और कभी मोह न रहे, प्रारंभिक दशा हो, धर्ममार्ग में बढे़ तो उद्यम करता है यह कि रागद्वेष को त्यागकर मैं मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहूं, लेकिन ऐसा ज्ञाताद्रष्टा रहने के पुरुषार्थ में इस अभ्यासी को उपयोग की स्थिरता नहीं होती है। कुछ समय आत्मा के ध्यान में लगने पर घबड़ाहटसी हो जाती है। मालूम होता है कि यह आत्मा में मग्न होने का काम बहुत ऊँचा काम है। इसे बड़े बलशाली ही पालन कर सकते हैं। ऐसे इस ज्ञायकस्वरूप में अभेदरूप से निरत रहने रूप शुक्लध्यान के बल से जो वीतराग होता है, समस्त उपरागों से जो दूर होता है उस भव्य पुरुष के यह परमसमाधि प्रकट होती है।

परसमता का स्वरूप और महत्त्व- जहाँ यह परमसमाधि प्रकट होगी वहाँ द्रव्यकर्म और भावकर्म की सेना ठहर नहीं सकती है। इस आत्मा पर ये द्रव्यकर्म और भावकर्म सेना की तरह जुटकर इस एक आत्माराम पर आक्रमण कर रहे हैं, उस समस्त सेना को लूटने में समर्थ यह परमसमाधि है। इस समाधिभाव, समतापरिणाम, रागद्वेष न रहे, सर्वजीवों में परममैत्री हो जाय, किसी के प्रति विरोध भावना न रहे, ऐसी परमसमता अवर्णनीय है। आत्मा का कल्याण करने वाली चीज यह समता ही है। किसी कषाय में आकर किसी जीव के प्रति चाहे वह कितना ही उद्दंड हो, कितना ही विपरीत हो, मूढ़ हो, विरोधी हो, फिर भी उसको विरोधी मानना यह ज्ञानी का कर्तव्य नहीं है। ज्ञानी तो विरोधी जीव को भी जानता तो रहता है, पर विरोधभाव नहीं रखता है, वह सबका ज्ञाताद्रष्टा रहता है।

ज्ञानियों की विरोधी पर करुणा- भैया ! ज्ञानी के उपयोग में तो विरोधी जन कल्याण के पात्र हैं। अज्ञानी जन अपने विषयबाधकों को देखकर उन पर बड़ा रोष करते हैं, पर ज्ञानी जीव अपने किसी कार्य में बाधक निरखकर यों देखा करते हैं कि इनका उपादान ऐसा ही अज्ञानमय हैं, और ये अज्ञानरूप परिणम रहे हैं। यह समाधि धीर, वीर, उत्तम ज्ञानी पुरुष के ही प्रकट होती है। जो जीव विषयकषायों के लोलुपी हैं, धन, जड़ वैभव की ममता रखते हैं ऐसे पुरुषों के हृदय में समताभाव का प्रकाश नहीं आ सकता है। यह आत्मसंपदा है, इस अमूर्त संपदा के समक्ष तीन लोक का एकत्रित वैभव भी न कुछ चीज है। आत्मा को क्या चाहिये? शांति और आनंद। जो भाव शांति और आनंद को पूर्णरूप से दिया करे उससे बढ़कर संपदा और क्या हो सकती है? आत्मा की संपदा आत्मा से भिन्न नहीं है। जो आत्मा से भिन्न है वह आत्मा के शांति और आनंद को कर सकने वाला नहीं है। ऐसी यह परमसमता, किसी भी पदार्थ में राग और विरोध न हो ऐसी समाधि किन्हीं ही उत्तम पुरुष के प्रकट होती है।

स्वयं की अंतर्दृष्टि हुए बिना साधुसंतों के अंतरंग के परिचय का अभाव- इस सहज आत्मसंपदा का जब तक हम अनुभव नहीं करते तब तक हम साधुसंतों की विशेषता को नहीं जान सकते हैं। जो जीव अपने आपमें विकल्पभावों को तजकर निर्विकल्प शुद्ध ज्ञानप्रकाशमय अनुभव कर सकते हैं वे ही मनुष्य का माहात्म्य जान सकते हैं। साधुसंतों के अंतरंग में क्या बर्त रहा है? वह कौनसी दृष्टि है जिस दृष्टि के पा लेने से यह साधु-पुरुष कृतार्थ हो रहा है और निरंतर निर्व्याकुल प्रसन्न रहता है, उस मर्म का परिचय तब तक नहीं हो सकता जब तक कि यह इस ज्ञानप्रकाश का स्वयं अनुभव न कर ले। दूसरे लोग मिठाई खाते हैं उनको कैसा आनंद आता होगा? इसकी परख वही कर सकता है जिसने उस मिठाई का स्वाद लिया हो, इस ही तरह ज्ञानीपुरुष किस भाव में रहा करते हैं, उनके अंतरंग में कौनसी गुत्थी सुलझ गयी है, उनके कौनसा प्रकाश प्रकट हुआ है जिससे वे धीर, प्रसन्न कर्मबोझ से हल्के अनाकुल मोक्षपथगामी हुआ करते हैं, उस तत्त्व का परिचय पाना हो तो हमें भी उन जैसा ज्ञाताद्रष्टा रहकर अपने आपमें इस सहज परमात्मतत्त्व का अनुभव करना होगा। इस अनुभव के प्रसाद से अपनी भी गुत्थी सुलझ जाती है और परमेष्ठी का भी माहात्म्य समझ में आ जाता है। यों सर्वकल्याण की प्राप्ति कि लिए परमसमाधिभाव होना चाहिए। उस समाधि का ही इस अधिकार में वर्णन चलेगा।



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