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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 126

From जैनकोष



जो समो सव्वभूदेसु थावरेसु तसेसु वा।

तस्स सामाइगं ठाइ इदि केवलिसासणे ।।126।।

सर्वजीवों में समभावी के सामायिक की स्थायिता- जो पुरुष स्थावर अथवा त्रस सभी जीवों में समतापरिणाम रखता है उसके सामायिक ठहरती है, ऐसा भगवज्जिनेंद्र के शासन में कहा गया है। समता का अर्थ ही यह है कि समान दृष्टि रहना। जब तक इन जीवों में यह अच्छा है, यह बुरा है, यह मेरा है, यह पराया है, यह विषमता रहेगी तब तक सामायिक बन ही नहीं सकता। वह ज्ञानप्रकाश उत्कृष्ट वैभव है जिस ज्ञानप्रकाश में यह समस्त जीवलोक एक समान दिखता है।

अज्ञान में जीव की परिस्थिति- अज्ञान अंधेरे में पड़े हुए लोग जड़ विभूति को पाकर अथवा कुछ मायामय यश, प्रतिष्ठा, बड़ाई को देखकर आर्तध्यान और रौद्रध्यान करते हैं, किंतु मूल में क्या है? कुछ नहीं। सब मायारूप है। हम जिन बड़ों को पूजते हैं, जिनकी प्रतिमा बनाकर पूजते हैं उनका क्या स्वरूप है? वे केवल रह गये हैं इसलिये पूज्य हैं। जो केवल होते हैं वे उत्कृष्ट होते हैं और जहां कुछ लगा है, घर है, परिवार है, धन है, कुछ लगाव है वह तो पतित अवस्था है। पतित अवस्था में भी अहंकारी होवे तो इसे कितनी मूढ़ता कही जाय? कोई पुरुष लोकदृष्टि में पतित हो, जगह-जगह भीख मांगकर उदर भरता है। और फिर भी अभिमान बगराये तो ऐसे अहंकारी का कौन आदर करे? ऐसे ही यह अज्ञानी परवस्तुवों का भिखारी जिसने परपदार्थों में अपनी आशा लगायी है ऐसे इन भिखारी संसारी प्राणियों में अहंकार भी छा जाय, लोग बैठकर अपने आपके अहंकार का प्रकाशन करें और मन में अपने को बड़ा समझें, मैं धनी हूं, मैं नेता हूं, मैं इन लोगों में चतुर हूं, समझदार हूं, किसी भी प्रकार का बड़प्पन का घमंड अंतर में रखे तो उसे ज्ञानी पुरुष आदर नहीं दे सकते हैं। वे अज्ञानी हैं, मोही हैं, पतित अवस्था में हैं।

तत्त्वज्ञान के बिना दयनीय स्थिति- भैया ! जो कुछ विशेषताएँ मिली हैं, धन, वैभव, ऋद्धि, समृद्धि जो कुछ भी प्राप्त हुए हैं उनमें कल्पनाएँ जगती हैं तो समझना चाहिये कि कितनी दयनीय दशा है, पतित दशा है। पतित दशा का अहंकार करना विवेक नहीं है। जब तक कोई जीव सब जीवों को समान दृष्टि से न निरख सकेगा तब तक उससे धर्मपालन नहीं हो सकता है। भला वह कौनसी दृष्टि है, वह कौनसा लक्ष्य है जिसके सामने राजा, महाराजा, सेठ, गरीब, सूअर, कुत्ता, कीड़ा, मकोड़ा, पेड़ सब जीव एकसमान नजर आते हैं। कुछ अनुमान करो वह कौनसा तत्त्व है जिस तत्त्व को सामने रखने पर ये सब जीव एक समान नजर आते हैं? वह तत्त्व है आत्मा का आत्मा के सत्त्व के कारण आत्मीयस्वरूप। इस आत्मस्वरूप की दृष्टि से सब जीव एक समान हैं। जब तक इतनी उदारदृष्टि नहीं बन पाती, तब तक धर्मकार्य करके, व्यवहारिक कल्पित धर्मप्रवृत्ति करके अपने को धर्मात्मा मानकर संतुष्ट होना मूढता है।

सामान्य तत्त्व के दर्शन में धर्म का प्रकाश- धर्म तब प्रकट होगा जब एक बार उस तत्त्व का दर्शन हो जाय जिस तत्त्व के दर्शन होने पर पेड़ों से लेकर पंचेंद्रिय तक के सभी संसारी प्राणियों में एक समान बुद्धि हो जाती है। सब एक हैं। अहो ! कैसा यह दृष्टि का प्रताप है जिसके होने पर यह मोक्षमार्ग प्रकट होता है। आजकल धर्म के नाम पर कितनी विषमतावों को आदर दे दिया गया है? ओह ! ये अमुक जाति के लोग हैं, इन्हें दूर हटावो, इस प्रकार छुआछूत का भारी मन में जमाव है। यह जमाव क्या आत्मानुभव करा देगा? हाँ, केवल एक भोजन प्रसंग में छुआछूत का विवेक हो वह तो ठीक है, किंतु रात-दिन वही वही बात मन में रखे हैं तो जहां इस जीव में विषमता की अनुभूति हो रही हो वहां समतापरिणाम आ सके, यह कैसे संभव है? जो परम मध्यस्थभाव में स्थित हैं ऐसे ही मुमुक्ष जीवों के परमसमाधि प्रकट होती है। ये साधु योगीश्वर जो परमसमाधि के यत्न में बर्त रहे हैं उनके सहज वैराग्य प्रकट हुआ है। अंतर में उनके वस्तुस्वरूप का परिज्ञान होने से उनके समस्त वैभव से उपेक्षा हो गयी है।

विषमता का फल- भैया ! यह वैभव वर्तमान में भी मुझे सुख पहुंचाने वाला नहीं है और आगामीकाल में तो इससे सुख ही क्या होगा, अथवा मरने पर तो यह सब छूट जायेगा। इन समागमों के विकल्प करने से जो पापकर्म का बंध किया है वह बंध साथ जायेगा। यह समागम अशांति के लिए हुआ, कुछ आत्महित का कारण नहीं बन सका। जिन कुटुंबजनों के अर्थ, जिन माने हुए मित्रजनों के अर्थ न्याय अन्याय न गिनकर रात दिन श्रम करके धन संचय किया है, मरने पर न तो धन साथ जायेगा और न ये कुटुंब के लोग साथ जायेंगे। साथ जायेंगे तो जो संक्लेश परिणाम किया और अज्ञान वृद्धि की, उससे जो पापकर्म उपजा वह साथ जायेगा और जन्म भी मानो नरक जैसी निम्न गतियों में होगा।

विषमता के फल में पछतावा- नरक गति में पहुंचने वाला जीव अब घबड़ाता है, तड़पता है। कुछ यदि बोध है तो वह पछतावा करता है कि हाय ! हमने व्यर्थ में दुर्लभ नरजीवन खो दिया था, पापकर्म उपार्जित किया था, आज इस गति के दु:ख भोगने के समय वे कोई साथी नहीं हो रहे हैं। साथी होने की बात तो दूर जाने दो, यदि ये कुटुंब जन भी साथ ही वहां नरकगति में जन्म ले लें तो भी वे सुख के लिए नहीं होते, उल्टा लड़भिड़कर आक्रमण करके एक दूसरे को परेशान ही करते हैं। इस पर्याय में जाने के बाद यहां के सारे भाव बदल जाते हैं। मां और बेटा दोनों ही यदि नरक में जन्म ले लें तो वहां सबका उल्टा-उल्टा ही बोध बनेगा। मां ने पूर्व जन्म में इस बच्चे की बड़ी खुशामद की थी, आंखों में काजल अंजन लगाया था, नाना सेवाएँ की थी, किंतु अब नरक गति में जन्म लेने पर इस लड़के का जीव यों सोचता है कि यह मेरी आंखें फोड़ना चाहती थी, आंखों में सींक डालती थी, ऐसा सोचता है और शस्त्र से, बल से हर तरह से आक्रमण कर देता है।

ज्ञानी और अज्ञानी का भोग- भैया ! किसका कौन साथी है? इससे ही अनुमान कर लो कि पूर्व जन्म में जो भी मेरा कुटुंब था, क्या आज कुछ मददगार हो रहा है? वे कहां हैं इसका भी कुछ बोध नहीं है। यह संसार सब मायारूप है। यहां रंच भी विश्वास मत करो कि ये पाये हुए समागम सब कुछ हैं। जो ज्ञानी पुरुष होते हैं वे तो जानते हैं कि जो समागम मिले हैं तन, मन, धन, वचन ये सब धर्म के लिए मिले हैं। मेरा सर्वस्व धर्म के लिए न्यौछावर है ऐसी हिम्मत ज्ञानी के होती है। न करे कोई हिम्मत, रहा आये अज्ञानी तो भी उसका सब छूटेगा, मिटेगा। ज्ञानी का भी समागम छूटता है और अज्ञानी का भी समागम छूटता है। उनमें अंतर इतना है कि अज्ञानी जीव तो इस समागम के मोह में पाप बांधता है और उस पाप के फल को अगले भव में भोगेगा और ज्ञानी जीव उस समागम में उपेक्षा बुद्धि रखता है, इस उदारता के कारण जो पुण्य का संचय किया है उसका फल भोगेगा। अंतर इतना होगा, पर कोई चीज किसी के साथ न रहेगी, यह सुनिश्चित है।

ज्ञान का फल समता- जिस ज्ञानी की दृष्टि में ये सब जीव एक समान हैं उसके समतापरिणाम प्रकट होता है। यह महामुनीश्वर योगी उदार है, सबका यथार्थ मर्म और अनुभव करने वाला है। जिसके सहज वैराग्य प्रकट हुआ है उसमें विकारों के कारणभूत अब मोह रागद्वेष नहीं रहे। अहो, अर्थ का उद्देश्य तो समतापरिणाम है। जो धर्म, जो मंतव्य बना है उस मंतव्य में भी यही बात समायी हुई है कि मेरे समतापरिणाम प्रकट हो। कोई सिद्धांतवादी ऐसा मानते हैं कि सारे लोक में आत्मा एक है। वह अपने मंतव्य में समता की सिद्धियाँ करते हैं। किसी से क्यों राग करना, क्योंकि वह दूसरा है ही नहीं। वह भी मैं ही हूं, किस पुरुष से क्या द्वेष करना, क्योंकि वह भी मैं ही हूं। जब सभी जीवों को मैं ही मैं मानना इस मंतव्य में आया है तो अब रागद्वेष से छूट पाने का यत्न करता है। अरे प्रशंसा सुनने में हर्ष क्यों मानना, क्योंकि प्रशंसा किसी दूसरे ने नहीं की। वह भी मैं ही हूं, इसी प्रकार किसी ने निंदा की तो उसका बुरा क्यों मानना, जिसने निंदा की है वह कोई दूसरा नहीं है, वह भी मैं हूं। इस प्रकार सर्वथा अद्वैतवाद में भी समतापरिणाम पाने का एक रास्ता बनाया गया है। अब जैन सिद्धांत की दृष्टि से देखिए; जितने भी जीव हैं वे सब जीव यद्यपि पृथक्-पृथक् द्रव्य हैं, सबका उनका अनुभव अपने आपमें है। किसकी आशा की जाय, किससे रागद्वेष बनाया जाय?

परमज्ञान में पूर्ण निर्विकल्पता- भैया ! निरपेक्षस्वरूप पर जब दृष्टि डालते हैं तो सब एक स्वरूप नजर आता है। यों सब जीव एकस्वरूप हैं, वहां मैं और दूसरे का भी विकल्प नहीं है। यह दृष्टि द्वैत और अद्वैत से परे है। कैसा वस्तुस्वरूप का विवेचन है जैन सिद्धांत में कि सब मंतव्यों का उद्देश्य इस स्याद्वाद में मिल जाता है। यह दूसरा है, यह दूसरा नहीं है। मैं हूं, यह सब भी विकल्प नहीं हैं, किंतु एक शुद्ध ज्ञानान्नदस्वरूप पर ही दृष्टि है, स्वरूप दृष्टि में न एकपना है किंतु अनुभव है। अनुभव निर्विकल्प होता है। अनेक मानना यह भी विकल्प है और एक मानना यह भी विकल्प है। यह परमसमाधि तो निर्विकल्प दशा से प्रकट होती है। इस परमयोगीश्वर के कहीं रागद्वेष मोह नहीं है, विकार के कारणभूत सर्वप्रकार के रागद्वेष मोह दूर हो गए हैं। यह परमसमतारस का स्वामी है, इसमें भेद कल्पना रंच रही नहीं है। यह मैं हूं, ये दूसरे हैं, यह भी विकल्प वहां नहीं है।

उत्कृष्ट अभेदभाव में परमसमाधि- मैं हूं, ऐसा मानना भी भेद है। यह दूसरा है, ऐसा मानना भी भेद है। मैं मानने में यह अन्डरस्टुड है कि कोई दूसरा भी है। इतना भेदभाव भी जहां पर नहीं है उस परिणाम में परमसमाधि प्रकट होती है। यों योगीश्वर त्रस जीवों और स्थावर जीवों में समान बुद्धि रखते है उन योगियों के यह सामायिक नामक व्रत होता है। ऐसा वीतराग सर्वज्ञदेव के मार्ग में प्रसिद्ध हुआ है। जिन योगीश्वरों का चित्त त्रसहिंसा और स्थावरहिंसा से दूर रहता है, जो योगीश्वर आत्मा के सहज स्वरूप में पहुंच चुके हैं, ऐसे परमसमाधि के पुन्ज योगीश्वर मेरे हृदय में विराजमान् होओ, वे अभिनंदनीय हैं। मैं उनके गुणों की मन, वचन ,काय से सराहना करता हूं।

आस्तिक का वात्सल्य- भैया ! जिसकी धर्म में प्रीति है उसे धर्मात्मा में बहुमान हुए बिना रह नहीं सकता और जिसे धमात्माओं में प्रीति नहीं है उसे धर्म में भी प्रीति नहीं है। आज सभी प्रकार के मनुष्य चाहे कितने ही धनी हों, पर सभी परेशानी अनुभव कर रहे हैं। परेशानी रंच नहीं है। परेशानी तो केवल कुबुद्धि की है, मोह की है। किसी दिन यह सारा का सारा अंदुगा छोड़कर जाना होगा। जब यह निश्चित है कि मैं सबसे भिन्न हूं तो इन समागमों में क्यों ममता की जा रही है? हाय? यह कैसी कुबुद्धि बढ़ रही है कि मैं धन खूब बढ़ाऊँ। जो मोह ममता करेगा, उद्दंडता करेगा, उसको परेशान होना ही पड़ेगा। सब दु:खी हो रहे हैं तृष्णावश। यही तो नास्तिकता का स्वरूप है। जो पदार्थ जैसा है वह स्वरूप ध्यान में न आए, आराधना के योग्य गुरु, देव, शास्त्र पर जिन्हें विश्वास भी नहीं है वे तो कुबुद्धि में अग्रणी रहा करते हैं। धर्म और धर्मात्मावों का तो निकट संबंध है। जिसे धर्म में प्रीति नहीं है उसे धर्मात्मा में भी प्रीति नहीं है। खूब अनुभव करके विचार लो।

अज्ञानी और ज्ञानी की रुचि की दशा- जिन्हें व्यसनों में प्रीति है वे व्यसनी पुरुषों का आदर करते हैं। व्यसनी पुरुष दूसरे व्यसनी पुरुष को देखकर प्रसन्न हो जाते हैं, धर्मात्मा पुरुष को देखकर प्रसन्न नहीं हो सकते। जिसको जो परिणाम सुहावना लगता है, उसको उस परिणामधारी से अधिक प्रेम रहता है। यहां यह मुमुक्ष ज्ञानी पुरुष मुक्ति की अभिलाषा रख रहा है और जिसे मुक्त कराना है उस सहज स्वरूप की दृष्टि पकड़ रहा है। ऐसे सहज ज्ञान वैराग्य से संपन्न यह योगीश्वर सब जीवों को धर्ममय देख रहा है। अज्ञानी जीवों की जहां यह प्रकृति है कि वे गुणियों के ऐब ही पकड़ेंगे। वहां ज्ञानी पुरुषों की ऐसी प्रकृति है कि निंद्य से भी निंद्य पर्याय वाले जीवों में, कीड़े, मकौड़े, सूकर, गधा आदि निम्न पदार्थों में रहने वाले जीवों में भी उनकी प्रभुता निहारेगा।

अज्ञानी की दोषग्रहणप्रकृति- जिसकी जैसी प्रकृति है उसे वैसा ही सुहाता है। जो अवगुणी हैं उन्हें अवगुण ही सुहाते हैं और जो गुणी हैं उन्हें गुण ही सुहाते हैं। जिसमें दोषों का जमाव है वह दूसरे गुणी पुरुषों में भी दोष ही निरखेगा। अधर्मी धर्मी पुरुष में भी धर्मकार्यों को निरखकर ढोंग जैसा निरखता है। वह अधर्मी जानता है कि ये सभी पापी हैं, धर्म का तो ढोंग है। वह अंतरंग से यह संभावना नहीं कर सकता है कि धर्मात्मा भी कुछ हुआ करते हैं अथवा धर्म भी कुछ तत्त्व है और धर्म के प्रभाव से निर्वाण प्राप्त होता है, ऐसा प्रत्यय उसकी दृष्टि में नहीं समा पाता।

ज्ञानी की गुणग्रहणप्रकृति- जब तक जीव त्रस, स्थावर सभी प्रकार के जीवों में समतापरिणाम नहीं कर सकता है तब तक उसे धर्मपालन का पात्र नहीं बताया गया है। तत्त्वज्ञानी सर्वजीवों में अनादि अनंत अहेतुक असाधारण ज्ञानस्वभाव का ग्रहण करता है। निरपेक्षस्वरूप की दृष्टि से सब जीवों को निहारने की ज्ञानी की प्रकृति है। इस सामान्य भाव का जो कि अचेतन पदार्थों से विविक्त होने के कारण असाधारण है, दर्शन होना सर्वप्रथम आपतित है, पश्चात् पर्यायदृष्टि करके विषमपरिणतियों का ज्ञान करना उस प्रकार का चित्त बनाने द्वारा साध्य है। जहां चैतन्य सामान्य का दर्शन होता है वहां ही परमसमाधि प्रकट होती है।

अद्वैत और द्वैत से विनिर्मुक्ति तत्त्व की दृष्टि- सर्वविकल्पों को त्यागकर, परमविश्राम से रहकर जो एक सहज ज्ञानप्रकाश अनुभव में आता है वह तो है अद्वैततत्त्व और इस ज्ञानप्रकाश के अनुभव को छोड़कर जितने भी अनात्मतत्त्व में दृष्टि पहुंचती है अथवा भेदरूप जितने भी चिंतन चलते हैं वे सब हैं द्वैततत्त्व। अद्वैत का अर्थ दो नहीं, अथवा उत्कृष्ट अथवा एकस्वरूप और द्वैत का अर्थ है दो या अनेक, अथवा अनुत्कृष्ट। ऐसे दो प्रकार के मार्ग हैं- एक अद्वैतमार्ग और एक द्वैतमार्ग। कितने ही पुरुष अद्वैतमार्ग की इच्छा करते हैं और कितने ही लोग द्वैतमार्ग की इच्छा करते हैं। हम तो अद्वैत व द्वैत के विकल्पों से निवृत्त होकर स्व में आना चाहते हैं।

अद्वैत और द्वैत के एकांत में स्व का लोप- अद्वैतमार्ग की भी केवल इच्छा करने वाले लोगों का, सर्वथा अद्वैत को जब मान लिया गया हो, तब यह रूप बन जाता है कि इस लोक में सर्वव्यापक एक अद्वैत सत् है, ज्ञान है, शब्द है, ब्रह्म है। अनेक पद्धतियों के रूप में उपस्थित हुआ अद्वैत एकांत बन जाता है और द्वैतमार्ग की इच्छा करने के लिए जब बहुत भेदभाव में चले जाते हैं तो एक ही पदार्थ के अनेक अंश कर करके पदार्थ मान डालते हैं। जैसे एक आत्मपदार्थ है, इसमें ज्ञान दर्शन आदिक अनेक गुण हैं और इस आत्मा में जानने, देखने, रमने आदिक क्रियाएँ हैं। इस आत्मा को जब सामान्य दृष्टि से तकते हैं तो यह एक चिदानंदस्वरूप है, एकस्वरूप है, वह सामान्य तत्त्व है। जब हम इस आत्मा को न्यारा-न्यारा भेद बनाकर समझना चाहते हैं तो इसमें यह विशेष नजर आता है। इसमें ये परिणमन हैं, ये गुण हैं आदिक बातें पहिले आत्मा में नजर आती हैं। कोई उन सबको एक आत्मा न मानकर एक-एक गुण को, एक-एक परिणमन को सबको न्यारा-न्यारा पदार्थ मानने लगे तो यह भेदवाद की स्वच्छंदता है। यों अद्वैत के एकांत में भी स्व का लोप हो जाता है और द्वैत के एकांत में भी। अत: अब हम एकांतों को छोड़कर एक इस आत्मानुभव के मार्ग में आते हैं।

भेदैकांत की कल्पना में शांति का अस्थान- कोई भी पदार्थ हो वह तो है ही, उसके अलावा और भी चीज है या नहीं? उत्तर तो यह आता है कि अनेक चीजें हैं। हम एक जीव हैं, ये नाना पुद्गल हैं, अनेक हैं पदार्थ, पर कोई इस अनेकता को मना करके सब कुछ एक ब्रह्म है, सब कुछ एक ईश्वर है, सब कुछ एक ज्ञान है, शब्द है, किसी भी रूप में नानापन का खंडन कर डाले तो यहां इस पद्धति से वस्तु की स्वतंत्रता विज्ञात नहीं हो सकती है और कोई नाना को ही देखता रहे, यह भी है, यह भी है और इतना नानापन कर डाले कि एक पदार्थ में भी जितनी शक्तियां हैं उन सब शक्तियों को एक-एक पदार्थ मान बैठे तो उसने अपना उपयोग भटकाया है, शांति का काम तो नहीं किया है। शांति का आधार जो निज ज्ञानतत्त्व है उसकी ओर तो वह आ न पायेगा, क्योंकि इसका उपयोग बाहर में भटक रहा है।

स्याद्वाद व प्रमाण का दर्शन- भैया ! न केवल द्वैत से हम तत्त्वज्ञान कर सकते हैं। अद्वैत मायने हैं अभेदवाद और द्वैत मायने हैं भेदवाद। जैनसिद्धांत इन दोनों को स्वीकार करता है, और दोनों को मानकर यह शिक्षा देता है कि तुम ऐसे अखंड आत्मा का आश्रय करो कि अभेद और भेद दोनों का विकल्प समाप्त हो जाय। लोक में गणेश की मूर्ति प्रसिद्ध है। शरीर तो मनुष्य का है, मस्तक हाथी का है, और उसका वाहन चूहा है, ऐसी मूर्ति बनाते हैं। एक कल्पना तो करो क्या कोई महापुरुष चूहे की सवारी करता रहा होगा अथवा अपना सर हाथी का बना लिया होगा। वह मूर्ति एक प्रतीक है किसी सिद्धांत को बताने का। वह स्याद्वाद और प्रमाणसिद्धांत को बताने का एक अलंकार है। जैन सिद्धांत में दो नय बताये हैं- निश्चयनय और व्यवहारनय। निश्चय का नाम है अभेदनय, जिसमें और कोई भेद न उठाया जाय और व्यवहारनय का नाम है भेदनय, जिसके जितने भी बन सकें उतने भेद करने दीजिए। गणेश का वह चूहा भेदभाव का दृष्टांत है। जैसे चूहा कागज कपड़े को कुतर-कुतर कर खंड-खंड कर देता है जितना बढ़िया बारीकी से चूहा अपने मुख से फाड़ सकता है, हल्के से हल्के कागज का टुकड़ा बना देता है उतना बढ़िया दुकड़ा मनुष्य नहीं कर सकता है। तो वह चूहा व्यवहारनय का प्रतीक है और गले पर हाथी का सिर भी फिट ऐसा किया है कि एकमेक बन गए हैं, अंतर नहीं नजर आता। ऐसा अभेद कर देना किसी तत्त्व को, जिसका कि फिर भेद या अंतर न मालूम हो सके, यह है निश्चयनय का प्रतीक। यह समस्त मूर्ति यह बतलाती है कि निश्चय और व्यवहारनयात्मक तत्त्वज्ञान होता है, उभयनयात्मक होता है। वहाँ पर व्यवहारनय से समस्त तत्त्वों का निर्णय करके लक्ष्य बनाना चाहिए निश्चय का।

निर्विकल्प अनुभव की भावना- योगीश्वर यों चिंतन करते हैं कि हम अद्वैत व द्वैत मार्ग से विमुक्त होकर एक ज्ञानानुभवरूप वर्तना चाहते हैं। परमसमाधि के प्रकरण में उपयोग को वहां ले जाया जा रहा है जिस तत्त्व में हम अपना उपयोग ले जायें तो रागद्वेष मोह विकल्प तरंग, ये कोई भेद न उठे, ऐसी तत्त्वज्ञान में ही हमारी समाधि की पूर्णता होती है। एकस्वरूप सब जीवों में समान तत्त्व को जो निरखता है उसके परमसमाधि प्रकट होती है। कोई लोग अद्वैत के मार्ग से अपना व्यवहार बनाए रहते हैं, अपना मत, अपना विचार और अपने धर्म की प्रभावना एक अद्वैतमार्ग का विषय करके बनाते हैं। तो कोई लोग क्रियाकांड करके पूजन विधान आदि अनेक प्रकार की विधियों से आचमन करना अथवा जाप करना आदिक बड़े-बड़े भेदवादों सहित धर्म का पालन किया करते हैं। यह तत्त्वज्ञानी पुरुष जिसने परमात्मतत्त्व का मर्म पाया है और उस तत्त्व में लीन होने की उत्सुकता बनी हुई है उसका यह चिंतन है कि मैं अद्वैत और द्वैत सभी प्रकार के विकल्पों को तोड़कर अपने आपके अंत:प्रकाशमान् इस परमात्मतत्त्व की उपासना करता हूं।

स्वरूपभावना का कर्तव्य– जो पुरुष सदा के लिए संकटों से छूटना चाहते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे अपने से भिन्न पदार्थों में ममत्व न करके उनमें उपयोग न फँसाकर उनके ज्ञाताद्रष्टा रहकर अंतरंग में सही उत्सुकता बनायें। यह मैं आत्मा जो न जन्म लेता है, न मरण करता है, किंतु स्वत: स्वभाव से ज्ञानप्रकाशरूप और आनंदमय बना हुआ है, ऐसे आत्मा को मैं अपने आत्मा में स्थित होकर इस ही को बारंबार भाता हूं। मैं शुद्ध हूं, ज्ञानमय हूं, अविनाशी हूं, द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म- इन तीन अन्जनों से रहित, निरन्जन हूं, समस्त परपदार्थों से न्यारा आनंद मूर्ति हूं, इस तरह से अपने को जाने, देखे अनुभव करे तो वहाँ ज्ञानानुभव का प्रकाश होता है। यही है अलौकिक दुनिया, यही है अलौकिक वर्ष का प्रारंभ।

अनादि से विडंबना- भैया ! अनादिकाल से इस जीव ने विषयवासना, कषायसंस्कार के वश होकर आशा लगा-लगाकर जगह-जगह अपनी भटकना की है। भटका यह खूब, आज सुयोगवश मनुष्य जैसा उत्कृष्ट जन्म पाया, श्रवण और जानन की शक्ति पायी, अब भी यदि इन बाह्य विभूतियों में निरंतर अपना उपयोग बसाये रहे तो फिर बतावो कल्याण के करने लायक भव कौनसा होगा? क्या ये कीड़े पतंगे कल्याण कर सकते हैं? कल्याण कर सकने लायक भव तो एक मनुष्यभव ही है। यहां ही पुरानी ढफली गाते रहें, विषयकषायों की धुन बनाए रहें तो कैसे इस आनंद घर में प्रवेश हो सकेगा?

योग्य अवसर में भूल का फल- जैसे कोई अंधा भिखारी किसी नगरी में भीख मांगने के लिए जाना चाहता था। नगर में बहुत धनी और उदार पुरुष थे। वह नगर चारों ओर कोट से घिरा हुआ था। उस कोट में मान लो एक ही दरवाजा था। लोगों ने बताया कि इस कोट पर हाथ रखकर चले जाना, जहाँ दरवाजा मिले, वहीं से नगर में प्रवेश कर जाना। वह पुरुष खुजैला भी था, उसके सिर में खाज थी। वह हाथ टटोल-टटोलकर चला जा रहा था। जहां दरवाजा आया वहां ही अपना हाथ उठाकर अपना सर खुजलाने लगा और पैरों से चलना बराबर जारी रखा। इस तरह से उसने कई चक्कर लगा लिए, उसका ऐसा ही भवितव्य था कि जहाँ दरवाजा आता तहाँ अपनी खाज खुजाने लगता और पैरों से चलना जारी रखता। ऐसे ही यह जीव समस्त कुयोनियों में भ्रमण करके जब मनुष्य भव में आया तो यहाँ भी इसने अपने आत्मा की सुध न की। विषयकषायों की खाज खुजाने में ही यह आसक्त बना रहा और मनुष्यभव खो दिया, इस तरह से कुयोनियों में ही भटकना जारी रहा।

कर्तव्य का स्मरण- भैया ! यदि ये अमूल्य क्षण भोगों में गुजार दिये जायें तो फिर बतावो उसका कौन साथी होगा? जिस मकान, दुकान, परिवार को यह अपना सर्वस्व मानता है उनका एक अंश भी एक अणु मात्र भी साथी न होगा। जब तक समागम है तब तक भी ये साथी नहीं, आगे तो साथी कुछ होगा ही क्या? इससे कुछ आत्मा की सुध लेना चाहिए। सबसे महान् पुरुषार्थ है किसी भी प्रकार समतापरिणाम बन जाय, उत्कृष्ट समता बन जाय जहाँ किसी भी प्रकार का परपदार्थ का रंच भी विकल्प न हो, ऐसा उत्कृष्ट परिणाम हो जाय, ये नाना विकल्प संसार क्लेश को ही उत्पन्न करते हैं।

सहजतत्त्व के अनुभव में नयों की अगोचरता- जो मेरा अनुपम आनंदस्वरूप है ऐसा यह आत्मा समस्त नय-समूह से परे है। यह शुद्ध ज्ञानप्रकाश किसी भी नय के द्वारा जानने में नहीं आता अर्थात् हम अनुदार दृष्टि बनाएँ, वस्तु के किसी एक अंश को निरखें तो वहाँ इस आत्मा का अनुभव नहीं होता है। हाँ इतनी बात अवश्य है कि जिन जीवों को आत्मानुभव हुआ करता है उन्हें आत्मानुभव से पूर्व उस निश्चयनय का आलंबन होता है और जो जीव निश्चयनय की दृष्टि को छोड़कर केवल मात्र व्यवहार का ही आलंबन करता है उसको धर्म का मार्ग नहीं मिल पाता। इन विकल्पों से मेरा क्या प्रयोजन बनेगा? यह आत्मा तो द्वैत अद्वैत सर्व प्रकार के विकल्पों से दूर है। मैं निज एक उस भाव का वंदन करता हूं, जिसके प्रसाद से अल्पकाल में ही मेरे संसार के संकट दूर होंगे। संसार के संकट धन वैभव से नहीं दूर होते हैं, ये धन वैभव तो विकल्प बढ़ाने के ही कारण हैं। इन विकल्पों को तोड़कर निर्विकल्प अखंड, अद्वैत चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व में उपयोग जमे तो संसार के संकट दूर होंगे।

ज्ञानी की वैभव में उपेक्षा- ज्ञानीजन इस वैभव को यों छोड़कर चले जाते हैं जैसे नाक से छिनके हुए मल को छोड़कर लोग चले जाते हैं। फिर उस नाक की ओर नजर भी कोई डालता है क्या? उससे घृणा करते हैं, ऐसे ही ज्ञानी संत जिन्हें आत्मीय सत्य आनंद का अनुभव हुआ है वे इन अचेतन व परचेतन समागम का परित्याग करके आत्मीय आनंद के अनुभव के लिए उत्सुक रहा करते हैं। संसार में अनेक प्रकार के परिणाम हैं, कुयोनियां हैं, जन्मस्थान हैं, शरीरों के प्रकार हैं, उन सबमें जन्म लेकर यह जीव जितना भी सुखी दु:खी हो रहा है पुण्य व पाप के उदय के कारण हो रहा है। जिसने सुकृत किया उसके पुण्य आया और जिसने दुष्कृत किया उसके पाप बना। इस आत्मा के स्वरूप में न तो शुभभाव हैं और न अशुभभाव हैं , क्योंकि आत्मा सदा एकरूप है। यह तो जिस प्रकार के सहजस्वभाव का है वही स्वभाव वाला आनंदधन अनादि से अनंत काल तक रहता है, ऐसा स्वभाव जो संसार के संकटों से मुक्त है, जिसमें शुभ-अशुभ रागद्वेष विषय कषाय किसी भी प्रकार के विभाव नहीं हैं, उस नित्य शुद्ध आत्मा का मैं स्तवन करता हूं।

सत्य शरण ग्रहण- हे मुमुक्ष जनों ! संकटों से मुक्ति चाहो तो अपने आपके इस परमात्मप्रभु की शरण लें। बाह्य में शरण क्या हो? कुछ साथ में रहने का नहीं है। जैसा हम चाहते हैं वैसा परिणमन पर में होता नहीं है। इस कारण अन्य विकल्पों का परित्याग करके ऐसा साहस बनाएँ कि हम अपने आपके उस शुद्ध ज्ञानस्वरूप को निहार लें, जिससे समस्त आकुलता दूर हो जायेगी। जिसके प्रसाद से फिर यह ज्ञानी जितने जीवों को निरखें, त्रस हों अथवा स्थावर हों, सब जीवों को देखकर सर्वप्रथम तो उस चैतन्यस्वरूप की सुध लें।

आत्मा का चैतन्य चमत्कार- यह आत्मा नित्य शुद्ध है, चैतन्यचमत्कारमात्र है। कोई प्रश्न करे कि इस आत्मा में क्या भरा है? जैसे कोई प्रश्न करे कि इस देह में क्या भरा है? तो मांस, खून, हड्डी आदि ये सब भरे हैं। इस बोरे में क्या भरा है? गेहूं, चना आदि जो कुछ भी भरा है यह कहा जायेगा। जब यह प्रश्न हो कि इस आत्मा में क्या भरा है? तो उत्तर होगा कि आत्मा चैतन्यचमत्कार से भरपूर भरा पड़ा हुआ है। एक जाननदेखनहार, विलक्षण, अलौकिक सत्यप्रकाश इसमें पड़ा है। जिस शुद्धप्रकाश के द्वारा यह आत्मा प्रबल अंधकार को, रागांधकार को संकटों से दूर कर देता है।

आत्मतत्त्व की आस्था- यह आत्मतत्त्व जिसकी उपासना के लिए बड़े-बड़े चक्रवर्ती जैसे महापुरुष भी 6 खंड की विभूति को छोड़कर निर्ग्रंथ दशा में रहकर अपना जीवन सफल मानते थे वह आत्मतत्त्व सर्वत्र जयवंत हो। हम आप सबमें यह आत्मतत्त्व प्रकाशमान् हो, यह आत्मतत्त्व चैतन्यस्वरूप बड़े-बड़े मुनीश्वरों के हृदय-कमल में नित्य विराजमान् रहता है। यह तत्त्व अज्ञानियों को तो समझ में न आयेगा, ज्ञानियों को यह स्पष्ट ज्ञान में आता है। ऐसा यह आत्मतत्त्व हम आप सब लोगों की दृष्टि में सदा के लिए विराजमान् रहो, इस सामान्यरूप के दर्शन से परमसमाधि प्रकट होती है।

शुद्ध उपयोग का जयवाद- वह उपयोग धन्य है जिसमें पक्ष की रंच भी कलुषता नहीं रहती है। ऐसा स्वच्छ उपयोग ही सब आंधियों के शांत होने के कारण समाधि है। यह वीतराग विज्ञान ही स्वभाव में युक्त होने के कारण योग है। ज्ञातादृष्टा रहने की सहज स्थिति ही समवर्तना के कारण परमसामायिक है। यह शुद्ध ज्ञानप्रकाश परमज्योतिर्मय होने के कारण तेज:पुन्ज है। यह सहजस्वभाव का अवलंबन ही परमशरण है। इसके प्रसाद से ही शाश्वत आनंद प्राप्त होता है।


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