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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 130

From जैनकोष



जो हु पुण्णं च पावं च भाव वज्जेदि णिच्चसा।

तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे ।।130।।

पुण्यपापभाव के त्याग में समता- जो योगी पुण्य और पापरूप भावों को नित्य ही त्यागता है उसके सामायिक स्थायी है, ऐसा केवली के शासन में कहा है। इसमें साक्षात् तो पुण्यभाव और पापभाव के संन्यास की भावना है और उपचार से पुण्यकर्म और पापकर्म जो पौद्गलिक हैं उनके संन्यास की भावना है। यह जीव जब शांति और उन्नति के मार्ग में चलता है तब अपने ही शुद्ध परिणामों का कर्ता होता है। जो पुरुष पुण्य-पापरहित केवल ज्ञायकस्वरूप अपने आत्मा का अनुभव करता है उसके कर्म स्वयं खिर जाते हैं। जो पुण्यपापभाव को निरंतर त्यागता है उसके सामायिक स्थायी है।

तथ्यसूचक उपचारस्तवन- प्रभु से भीख मांगने पर कर्म नहीं खिरते हैं कि हे प्रभु ! मेरे ज्ञानावरणादिक कर्म दूर कर दो, इन दुष्टों ने मुझे रुलाया है, इनको मेरे से निकाल दो और हमको रख लो, ऐसा कुछ मांगने से काम नहीं बन सकता। यह तो एक प्रभु की भक्ति है। चूँकि प्रभु के स्वरूप के स्मरण के माध्यम से हमें आत्मतत्त्व की सुध हुई हैं और जिस आत्मतत्त्व की सुध के कारण कर्म दूर होते हैं उसका निमित्त, आश्रय, विषय प्रभु है, इस कारण प्रभु की बात कही जाती है यह आदर की बात है। जैसे कोई त्यागी पूछे कि आपके मकान के बारे में कि यह मकान किसका है, तो आप कह देते है कि महाराज यह मकान आपका ही है। तो क्या वह मकान महाराज का हो गया? महाराज के बहुमान से, सम्मान से ऐसा कहा गया है। यहाँ अंतर में ऐसा भाव पड़ा है मालिक के कि महाराज जैसे अन्य साधु-संतों की भक्ति के प्रमाद से, आशीर्वाद से पुण्य फला है और हमें यह संपदा मिली है। इस तथ्य को उपचार में लेकर इन शब्दों में कहा जाता है। प्रभु कष्ट कर्मों का विध्वंस कर देंगे, ऐसा कहना उपचारमात्र है।

स्वयं के पुरुषार्थ बिना सिद्धि का अभाव- भैया ! स्वयं के किए बिना सिद्धि न होगी। लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि स्वयं के मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता, स्वयं के किए बिना सिद्धि नहीं होती है। तब करना क्या है? अपने परिणामों को निर्मल करना है। लोक में किसी भी जीव का कोई दूसरा जीव न साथी है, न किसी प्रसंग में मददगार है, न कुछ कर सकता है। इतना तक भी तो नहीं है कि कोई दूसरा जीव मुझ पर प्रीति कर सके। जो भी प्रीति करता है वह अपनी कषाय से प्रीति करता है। कषाय से उत्पन्न हुई वेदना को शांत करने के लिये प्रीतिरूप परिणाम भी अपने आपमें उत्पन्न करता है। यह आत्मा किसी दूसरे पदार्थ में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है यह तो ज्ञानस्वरूप है। जो कुछ करेगा वह ज्ञानस्वरूप का ही काम करेगा। उन्नति के लिए हमें अपने आप दृष्टि बनाना है कि मैं आत्मा समस्त परपदार्थों से न्यारा इस देह से भी जुदा केवल ज्ञानमात्र तत्त्व हूं, ऐसी अनुभूति करनी होगी। उसके प्रसाद से ये कर्म अपने आप खिर जायेंगे।

राग की आर्द्रता के अभाव में कर्म का निर्जरण- जैसे गीली धोती नीचे गिर जाय और उसमें धूल भिड़ जाय तो विवेकी लोग यों करते हैं कि धीरे से उसे सूखने डाल दिया। जब वह धोती सूख जाती है तो झटका दिया, तब वह धूल झड़ जाती है। धूल के चिपटने का कारण वहाँ गीलापन था, गीलापन खत्म हुआ कि जरा से झटके में धूल दूर हो जाती है, ऐसे ही कर्मों के बंधन आत्मा के रागद्वेष की गिलाई से हुए हैं। तत्त्वज्ञान और वैराग्य के प्रताप से जब रागद्वेष की गिलाई सूख जाती है तो ये अष्टकर्म अपने आप झड़ जाते हैं। यह ज्ञानी तो भावना करता है पुण्य-पापरहित सर्व प्रकार के विकारों से रहित अविकारी स्वरूप ज्ञानतत्त्व की।

पूजा में प्रभुदर्शन और त्यागभावना- गृहस्थ भी पूजन में एक पद बोलते हैं प्रस्तावना में.. अर्हन् पुराणपुरुषोत्तमपावनानि वस्तुनि नूनमखिलान्ययमेक एव। अस्मिन् ज्वलद्विमलकेवलबोधवन्हौ पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि।। हे अरहंत, हे पुराण हे पुरुषोत्तम ! आपके सामने ये नाना पवित्र वस्तुएँ रक्खी हैं, क्या–क्या रक्खी हैं सो निरखते जाइये। अष्ट द्रव्यों से सजा हुआ थाल रक्खा है, बर्तन भी सब पवित्र रक्खें हैं, सामने भगवान की मूर्ति पवित्र है, यह पूजक भी नहा-धोकर, पवित्र कपड़े पहिने हुए है यह और पूजक भी स्नान करके पवित्र हुआ है। व्यवहारिक पवित्रताएँ सब वहाँ उपस्थित हैं। ऐसी स्थिति में यह पुजारी कह रहा है कि ये नाना पवित्र वस्तुएँ हैं, किंतु हे नाथ ! मुझे तो यह सब कुछ एक ही दिखता है। जिसका जो प्रयोजन है उसको सब बातों में वही एक नजर आता है। जिसको किसी एक चीज की बड़ी खुशी हुई हो, वह बातें भी अनेक करे तो भी उसके चित्त में वह एक ही बात बसी हुई है। हे नाथ ! मुझे तो ये सब ठाठ, मंदिर, प्रतिमा, द्रव्य, थाल- ये कुछ भी नाना नहीं नजर आ रहे हैं, वहाँ तो सब एक ही भाव दिख रहा है। वह क्या है? यह जाज्वल्यमान् प्रकाशमय केवल ज्ञानपुन्ज। इस ज्ञानपुन्ज अग्नि में मैं इस समस्त पवित्र सामग्रियों को होमता हूं।

उपासक की सकल संगसंन्यासभावना- इसमें देखिये कितने भाव भरे हैं- यह न जानना कि जो थाल में सजे हुए द्रव्य हैं उनको ही होमता हूं, जितनी भी विभूति मिली हैं- धन, मकान, वैभव, प्रतिष्ठा, इज्जत ये सब कुछ मैं त्यागता हूं। इस प्रकार अपने ज्ञान में वह पुजारी यों देख रहा है कि मुझमें कुछ भी पदार्थ नहीं है। ये वैभव ठाठबाट सब अचेतन हैं, जुदे हैं इनसे मेरा कोई संबंध नहीं है और ऐसी ही असंबंध बुद्धि को कर रहा है। मोही जीव तो एक सेकेंड को भी अपने को सबसे न्यारा निरख नहीं सकते हैं। इस ज्ञानी जीव ने अनेक प्रसंगों में थोड़ा ही यत्न किया, इंद्रियों को संयत किया, आँखें मींची कि सबसे विविक्त केवल ज्ञानपुन्ज को निहार लेता है यह। ऐसा अपने आपके विविक्तस्वरूप का उपासक यह पुजारी कह रहा है कि मैं समस्त वैभव को होमता हूं।

ज्ञानी की पुण्यकर्मसंन्यासभावना- यह ज्ञानी वैभव को ही होम रहा है, इतना ही नहीं, यह सब वैभव ठाठबाट जिस पुण्यकर्म उदय से मिला है उस पुण्यकर्म में भी इस ज्ञानी के आदर बुद्धि नहीं है। इससे यह भी उसका परिणाम बन रहा है कि मैं इन समस्त पुण्यकर्मों को भी होमता हूं। पापकर्म भी मेरा स्वरूप नहीं है और पुण्यकर्म भी मेरा स्वरूप मेरा नहीं है। इसलिए इन पौद्गलिक अचेतन पुण्यकर्मों को भी मैं स्वाहा करता हूं।

ज्ञानी की पुण्यभावसंन्यासभावना- यह ज्ञानी कर्मों से ही उपेक्षित होता है, इतना ही नहीं, किंतु पुण्यकर्म का बंध जिस परिणाम से हुआ था वह परिणाम है शुभोपयोग। प्रभु की भक्ति करना, उपकार, दया, दान का भाव रखना, ये सब कहलाते हैं शुभोपयोग। इस शुभोपयोग में भी ज्ञानी की आस्था नहीं है, ये मुक्ति नहीं दिलाते हैं, ये परंपरया सहकारी कारण हो सकते हैं, पर वास्तव में तो एक शुद्ध ज्ञायकस्वरूप के अनुभव से ही मुक्ति प्राप्त होती है। यह पुजारी यहाँ कह रहा है कि मैं इन समस्त शुभ-अशुभ भावों को होमता हूं। देखो कितना उत्कृष्ट ज्ञानी है यह गृहस्थ पुजारी? पूजा करते हुए भी प्रभु की भक्ति करते हुए भी उस भक्ति और पूजा के परिणाम को होम रहा है और एक शद्धि निर्विकार ज्ञानस्वरूप के अनुभव का उत्सुक बन रहा है। बाह्य और आभ्यंतर परिग्रह के त्यागी संत तो इस पुण्यभाव और पापभाव को होम ही रहे हैं।

ज्ञानी का अंतश्चिंतन- परम जिनयोगीश्वर पुण्यपापरहित अंतस्तत्त्व का चिंतन कर रहे हैं। इन ही योगीश्वरों के चरण-कमल की वैयावृत्य करने से, पैर दबाने से, शरीर की अनेक सेवाएँ करने से, अनेक वैयावृत्त्य करने से या ज्ञानध्यान का सुयोग मिलाए, ऐसी अनेक सेवावों के प्रसाद से जो पुण्यकर्म उत्पन्न होते हैं उन पुण्यकर्मों के भी त्यागने की बात यहाँ कही जा रही है। यह ज्ञानी यह नहीं सोच रहा है कि मैं इन पुण्यकर्मों को त्याग रहा हूं। पुण्यकर्म तो भिन्न हैं, परद्रव्य हैं, उनको न मैं ग्रहण करता हूं, न त्यागता हूं, किंतु पुण्यभाव के होने पर ये पुण्यकर्म स्वयं बँधते हैं और शुद्धोपयोग के होने पर पुण्य-पाप कर्म सभी समाप्त हो जाते हैं। यह तो पुण्य–पाप से रहित केवल ज्ञानानंदस्वरूप को निरख रहा है। उसके इस निरखने में ये समस्त कर्म दूर हो जाते हैं।

पुण्यकर्म के साधनों में प्रधान साधन- ये पुण्यकर्म, पुण्यकर्म के साधनों से उत्पन्न होते हैं। उन सब साधनों में प्रभु भक्ति और साधुसेवा- इन दो का उच्चस्थान है। यह धन-वैभव, हाथ-पैर पीटने से उपार्जित नहीं होता है। यह तो जो पहिले पुण्य बना था उसका जो उदय है, उसके अनुकूल समागम मिलता है। ये पुण्यकर्म भी अट्ट-सट्ट जिसके बँधना को बँध जाएँ, इस तरह नहीं बँधते हैं, किंतु जो शुभभाव करते हैं उनके बँधते हैं। उन शुभभावों में सबसे प्रधानभाव है प्रभुभक्ति और साधुसेवा। इन दो कर्तव्यों के प्रताप से उत्कृष्ट पुण्य बंध होता है, ऐसे पुण्यकर्म को भी यह योगी त्याग रहा है और हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इनके परिणाम के करने से पापकर्म उत्पन्न होते हैं, इन पापकर्मों को भी यह योगी त्याग रहा है।

ज्ञानी का सहज वैराग्य- ज्ञानी के तो सहज परमवैराग्य प्रकट हुआ है अथवा यों कहो कि ये साधुसंत वैराग्यरूपी महल के शिखर में जड़े हुए कलश की तरह हैं, ये विरक्त ज्ञानी संत इन पुण्य-पाप कर्मों का त्याग कर रहे हैं। जो पुण्य-पाप कर्म इस संसारविलास को उत्पन्न करने के एकमात्र साधन हैं। मोह रागद्वेष इन परिणामों से पुण्य-पाप कर्म बँधते हैं और इन पुण्य-पाप कर्मों के प्रताप से यह संसार का विलास बढ़ता है। यह समस्त संसार केवल दु:ख का घर है। किस परिस्थिति में यह जीव सुखी हो सकता है ऐसा कुछ ध्यान में तो लाएँ। कुटुंब का समागम हो वहाँ भी यह सुखी नहीं रहता है; धन का, वैभव का समागम हो वहाँ भी यह सुखी नहीं रहता है, बहुत से मनुष्यों के समुदाय में रहता हो वहाँ भी यह जीव सुखी नहीं रहता है, कौनसा समागम इस जीव को सुख का कारण है? यह सारा संसार दु:खरूप है। इस संसार के कारणभूत ये पुण्य-पाप कर्म हैं उनको जो योगीश्वर त्यागते हैं, उनके नित्य ही सामायिक व्रत होता है।

ज्ञानी का एक ही निर्णय और कर्तव्य- सम्यग्दृष्टि पुरुष जब अपने आपके प्रदेशों में से शुद्ध तत्त्व की दृष्टि के बल से पुण्य-पाप विकारों को निकाल देता है और ज्ञानानंदस्वरूप शुद्ध चैतन्यस्वरूप निज शुद्ध जीवास्तिकाय में उपयोग लगाता है इस ही शुद्ध जीवास्तिकाय में अपने उपयोग का विहार कराता है वह पुरुष तीन लोक के जीवों से पूजित अरहंत प्रभु हो जाता है। अपने जीवन में केवल एक ही निर्णय रखो, जब कोई कहे कि बोलो क्या करना है? तो उत्तर आना चाहिए कि मुझे निज शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप का दर्शन करना है। ये बाहरी कार्य होना हो तो हो और न होना हो तो न हो, सभी तो एक दिन छूटेंगे। उनके विकल्प में कौनसा लाभ मिलेगा? क्या करना है, इसका पूरा निर्णय रखिए। मुझे सहजस्वरूप का दर्शन करना है और कुछ वान्छा नहीं है। यह तत्त्वज्ञान, अंतस्तत्त्व का दर्शन, पुण्यपापरूप वन को भस्म कर देने में दावानल के समान है और संसार संताप को बुझा देने में यह शीतल मेघ की तरह है। इस मेरे सहजस्वरूप के आलंबन से ही सारे संकट दूर होंगे। यहां किसी को शरण मानना बेकार बात है, ज्ञानीसंत अपने आपके परमशरण, परमरक्षक अंतस्तत्त्व का आश्रय ले रहा है।

शुद्ध स्वरूप के निरखने में जीव का उद्धार- यह संसार का कामी पुरुष पापकर्म के उदय के वश होता हुआ इस संसार वन में भटक रहा है। यह मानो इस संसृतिरूप कुटिला का वरण कर रहा है, यह कर्मजनक सुख को उत्पन्न करने के लिए आकुल, व्याकुल होकर अपना जीवन खो रहा है। अरे ! यह कभी भी अपने आपके स्वरूप की संभाल का यत्न कर ले तो इसके भव्यता का विकास होगा और यह शीघ्र संसार के समस्त संकटों से छूटकर शाश्वत मुक्ति सुख को प्राप्त कर लेगा। एक बार इस शुद्ध स्वरूप का शुद्ध विकास होना चाहिए फिर यह त्रिकाल भी मलिन नहीं हो सकता, संसार के संकट प्राप्त नहीं हो सकते। एक मुक्ति का ही सुख अनुपम है और परिपूर्ण है जिसकी सानी का उदाहरण देने को अन्य कुछ भाव नहीं हैं। यह सबसे विमुक्त केवल ज्ञानानंदस्वरूप के विकास में तृप्त रहकर आनंद भोगता रहता है। सिद्ध होने के बाद फिर यह आत्मा कभी भी इस संसार में भ्रमण नहीं करता है। सबसे बड़ा काम पड़ा है हम आपके, अपने आपके सहजस्वभाव का आश्रय लेना, सबको असार जानकर ऐसा निर्मल ज्ञानप्रकाश बढ़ावे कि किसी परद्रव्य में अपना अनुराग न रहे।

सहजस्वभाव के आश्रय में आविर्मूत सहजविश्राम के प्रसाद से उत्पन्न अविकारभाव में परमसमाधि- इस परमसमाधि अधिकार में यह प्रतिपादन किया जा रहा है कि मुक्ति के अपूर्व आनंद को पाने में प्रधान साधन परमसमाधिभाव ही है। जिस उपाय से आत्मा में समता प्रकट हो उस उपाय को करना ज्ञानी संतों का कर्तव्य है और वह उपाय सुगम भाषा में सीधा यह है कि समस्त परपदार्थों को भिन्न जानकर, स्वतंत्र जानकर, उनसे मेरे में कुछ भी सुधार अथवा बिगाड नहीं है, ऐसी स्थिति समझकर एक बार तो समस्त परपदार्थों को उपयोग से हटावो और अपने सहज स्वरूप में अनुपम विश्राम लो। इस सहज विश्राम के प्रताप से अपने आपमें शुद्ध ज्ञान का अनुभव होगा, जहाँ रागद्वेष, सुख-दु:ख, शुभ-अशुभ परिणाम किसी प्रकार का विकार नहीं है, उस ज्ञानप्रकाश में ही परमसमता प्रकट होती है। जो योगीश्वर इस परमज्ञानप्रकाश में वार्ता करते हैं वे धन्य हैं, उनको हमारा ज्ञानपूर्वक वंदन हो।


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