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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 133

From जैनकोष



जो दु धम्मं च सुक्कं च झाणं झाएदि णिच्चसा।

तस्स सामाइगं ठाई इदि केवलिसासणे।।133।।

धर्मध्यान व शुक्लध्यान में समाधि की पात्रता- जो पुरुष धर्मध्यान और शुक्लध्यान को ध्याता है उसके सामायिक स्थायी होता है, ऐसा केवली भगवान के शासन में कहा गया है। यह परमसमाधि अधिकार की अंतिम गाथा है, उसके उपसंहार में यह बात बतायी जा रही है कि जो धर्मध्यान और शुक्लध्यान को ध्याता है उसके ही परमसमाधि होती है। लोग समाधिभाव की प्राप्ति के लिए अनेक प्राणायामादिक शारीरिक यत्न करते हैं। धारणा, नियम, आदिक भी बाह्य पद्धति के होते हैं, पर समाधि का संबंध क्रियाकांडों से नहीं है। प्राणायाम आदि चित्त की एकाग्रता की पद्धति में सहायक हो सकता है, पर समाधि की पात्रता धर्मध्यान और शुक्लध्यान में ही होती है।

आनंदमय समाधि के अधिकारी- समाधिभाव को वे ही योगीश्वर प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें केवल शुद्धज्ञानस्वरूप के विकास की ही भावना रहती है, जिनको एक ज्ञानतत्त्व के अतिरिक्त अन्य कुछ रुचिकर नहीं होता है, ऐसे ज्ञान के लोलुपी और आनंदरस से भरपूर पुरुष ही इस समाधिभाव को प्राप्त करते हैं। समाधि में कष्ट नहीं है, किंतु परमसमाधि में तो सहज आनंद की निरंतर वर्षा चलती रहती है। जो पुरुष इंद्रियों के विषयों को जीत लेते हैं वे योगीश्वर ही समाधि की साधना कर पाते हैं। बहिर्मुख वृत्ति बनने में ये इंद्रिय के विषय बड़ा सहयोग देते हैं। इंद्रिय का विषय जिन्हें सुहाता है उनकी दृष्टि बाह्यपदार्थों की ओर रहती है। जिन्हें हित चाहिए उनका कर्तव्य है कि इंद्रियविषयों पर विजय प्राप्त करें।

परत्याग में स्वग्रहण की पात्रता- कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि खाना-पीना त्यागने में और उसमें बड़ा नियम बनाने में, अमुक ही खाना, अमुक न खाना इस बात से क्या आत्मा का संबंध है? आत्मा को तो ज्ञान चाहिए, ज्ञान से ही मुक्ति है, लेकिन उन्हें यह ध्यान नहीं है कि इन विषयों की ओर जो अपने भीतर भाव बनाया है वह भाव ज्ञान की ओर आने कब देगा? जो इंद्रिय विषयों का लोलुपी है वह आहारादि का परित्याग नहीं कर सकता है और जब आहारादिक का परित्याग नहीं कर सकता है, निरंतर उसका संस्कार रहता है तो समाधि उत्पन्न करने की पात्रता आयेगी कहाँ से? जो जीव मांस, मदिरा आदि का भक्षण करने वाले हैं उन्हें इस समाधि का स्वप्न भी नहीं आ सकता है। जो जीव जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति में सामान्यतया जो सद्व्यवहार चल सकता है उस व्यवहार से भी जो गिरा हुआ है उसको समता की पात्रता नहीं है।

उन्नतिशील आचरण में हितसाधना- पशु-पक्षी तिर्यंच जीवों का साधारण मनुष्यों से भी गया बीता आचरण है। उनका आचरण मनुष्यों से गिरा हुआ भी रहे तो भी यदि वे उस व्यवहार से ऊँचे उठकर कुछ भी संभल जायें तो उन्हें हित का मार्ग मिल जाता है। तिर्यंच जब संभलते हैं तो उनके जब जघन्य संयमासंयम होता है वह मनुष्यों के जघन्य संयमासंयम से ऊँचे दर्जे का होता है, किंतु मनुष्यों में जो जिस कुल का है उस कुल के योग्य जो सामान्यतया व्यवहार है उस व्यवहार से कुछ गिर जाय तो उसकी मोक्षमार्ग की पात्रता नहीं रहती है। कोई जैन कुल में उत्पन्न हुआ पुरुष रात्रिभोजन, अभक्ष्य भक्षण करता हो, किसी अन्य नीचे पुरुष के आचरण से तुलना करके अपने को श्रेष्ठ कहकर अपनी पात्रता दिखाए तो यहां पात्रता नहीं हो सकती है। जो जिस व्यवहार में आया हुआ है उस व्यवहार से गिरा हुआ उसका आचरण है तो वह पतनोन्मुख है या उन्नतोन्मुख है? उन्नति की पात्रता नहीं है। यद्यपि जैन कुल में उत्पन्न हुआ पुरुष करोड़ों से अच्छे आचरण वाला है, परंतु वह आचरण कौलिक है, उससे ऊपर कुछ भी अधिक उठने की भावना न हो तो वह वहां आचरण गिरे हुए की हालत में है। इस कारण समस्त संज्ञी जीवों को अपनी उन्नति की ओर उठते हुए रहना चाहिये। उन्नति की ओर उठते हुए में ही पात्रता आती है।

धर्म का आधारभूत सदाशिवात्मक आत्मा- ये योगीश्वर जो इंद्रिय विषयों के विजयी हैं, ये ही इस सदाशिव आत्मा का ध्यान कर पाते हैं, जिस सदाशिव के ध्यान में समाधिभाव प्रकट होता है। जितने भी धर्मावलंबी हैं उन सबके मूल प्रणेतावों में भी मूल ऋषियों का दृष्टिकोण विशुद्ध रहा आया होगा, किंतु जैसे-जैसे वह ज्ञान की किरण कमती होती गयी, वहां कुछ अपना कल्पित परिज्ञान किया और उसके आने का यह रूपक है कि धर्म के नाम पर आज पचासों भेद पड़ गए हैं और इस भेदवाद के जमाने में भेदवाद के मिटाने का यत्न करने वाला स्याद्वाद भी भेदवाद की गिनती में आ गया। धर्म नाम है शुद्ध ज्ञानप्रकाश का। धर्म किसे करना है हमको या भगवान को? ज्ञानप्रकाश किसे करना है? ज्ञानप्रकाश हमको करना है, भगवान तो ज्ञानमय है। हम ज्ञानप्रकाश न करना चाहें और प्रभु से भीख मांगे तो धर्म तो नहीं हो सकता। ज्ञानप्रकाश का आधार है यह स्वयं आत्मा। जब तक अपने आपके ज्ञानप्रकाश के आधार का श्रद्धान न बने तब तक धर्म आयेगा कहां से? जहां से धर्म प्रकट होगा उस धर्मी की ही श्रद्धा न हो तो धर्म की उत्पत्ति कहां से होगी?

धर्मध्यान व शुक्लध्यान की विशेषता- इस निज आत्मतत्त्व में जो यत्न करके लगना है वह तो धर्मध्यान है और जहां यत्न नहीं करना है, उद्यम नहीं करना है, स्वत: ही ज्ञानप्रकाश बना रहे वह है शुक्लध्यान। धर्मध्यान में रागांश का सहयोग होता है और शुक्लध्यान में वीतराग का पुट है, किंतु धर्मध्यान भी स्वात्मा के आश्रय से होता है और शुक्लध्यान भी स्वात्मा के आश्रय से होता है, ऐसे स्वात्मा के आश्रय में होने वाले निश्चय धर्मध्यान के द्वारा परमसमाधि प्रकट होती है।

सदाशिव का स्वरूप- सदाशिव का अर्थ कुछ लोग यह करते हैं कि कोई जगत का रचने वाला यह ईश्वर है और ईश्वर सदा से मुक्त है। वह कभी भी बंधन में नहीं था और उस सदाशिव की भक्ति करके जो सदाशिव के प्रसाद से मुक्ति प्राप्त करते हैं उनकी मुक्ति की सीमा है। वे कब तक मुक्त रहेंगे, इसकी सदाशिव ने सीमा लिख दी है और सीमा के बाद सदाशिव उन्हें ढकेल देते हैं और उन्हें संसार में फिर रुलना पड़ता है, ऐसे सदाशिव की बात नहीं कही जा रही है, किंतु जो ज्ञायकस्वरूप सदा काल से शिवमय है, कल्याणमय है, अपने स्वरूप में स्वरसत: त्रिकालमुक्त है, ऐसे त्रिकालनिरावरण सदाशिव के ध्यान की बात कही जा रही है।

समाधि में धर्मध्यान व शुक्लध्यान का अनिवार्य सहयोग- ये जिन योगीश्वर निश्चय धर्मध्यान के द्वारा इस सदाशिवात्मक आत्मतत्त्व के ध्यान के जब अभ्यासी हो जाते हैं तब इनके निश्चयशुक्लध्यान प्रकट होता है। जहां समस्त प्रकार के विकल्पजाल नहीं रहे हैं, किंतु केवलज्ञान का उदय न होने से जिनके चित्त का कार्य होता है तथा चित्त की एकाग्रता की वृत्ति होती है उनके यह शुक्लध्यान प्रकट होता है। शुक्लध्यान केवलज्ञान के प्रकट होने पर नहीं होता है, आगम में जो दो शुक्लध्यान केवलज्ञानियों के बताए हैं वे उपचार से कहे गए हैं, उनमें ध्यान शब्द का अर्थ घटित नहीं होता है। ध्यान का फल निर्जरा है, सो निर्जरा के कारण ध्यान का उपचार है। एक ओर चित्त के लगा देने का नाम ध्यान है। जहां तक संज्ञी अवस्था है वहाँ तक यह ध्यान चलता है। केवली भगवान संज्ञी नहीं हैं, न असंज्ञी हैं, किंतु अनुभय कहलाते हैं। जहाँ मन का कोई कार्य ही नहीं रहा है वहाँ ध्यान कैसे कहा जाय? शुक्लध्यान में भी परिवर्तन होता रहता है और यह परिवर्तन ज्ञप्तिपरिवर्तन है। यह धर्मध्यान अन्य ध्यानों की तरह रागमूलक परिवर्तन नहीं है। जब तक ज्ञान की समाप्ति नहीं होती है, तब तक यह ज्ञान एक बात पर टिका रह सके, ऐसी बात पूर्व वासना के कारण नहीं होती है।

विशुद्ध ध्यान- उत्कृष्ट साधना से शुक्लध्यान प्रकट होता है और वह शुक्लध्यान 12वें गुणस्थानों के कुछ समय तक तो पृथक्त्वीचार शुक्लध्यान रहता है जिसमें विचार है, परिवर्तन है, 8 वें, 9 वें, 10 वें, 11 वें गुणस्थान तक तो पूर्ण समय पृथक्त्व वितर्क विचार रहता है और 12 वें गुणस्थान में कुछ समय तक यह परिवर्तन चलता है। बाद में जब परिवर्तन नहीं होता है तो एकत्व वितर्कअविचार शुक्लध्यान होता है, इसके पश्चात् अनंतर ही केवलज्ञान प्रकट होता है। इस एकत्व वितर्कविचार को भी हम क्या कहें? परिवर्तन होता है या नहीं होता है, इसका भी क्या निर्णय करें? परिवर्तन के लिए अवसर भी तो नहीं मिलता, तुरंत ही केवलज्ञान हो जाता और उस द्वितीय शुक्लध्यान में जो विषय ज्ञेय बन रहे थे, अब सकल ज्ञेय विषय हो गए तो हम यह भी क्या मना करें कि द्वितीय शुक्लध्यान के विषय में परिवर्तन होता नहीं होता। इस शुक्लध्यान के काल में परिवर्तन नहीं होता, यह निश्चित है। ऐसे शुक्लध्यान के द्वारा जो योगीश्वर सदाशिवात्मक निजअंतस्तत्त्व को ध्याता है उसके यह परमसमाधिभाव प्रकट होता है।

आत्मा का चिद्विलास- यह परमब्रह्म आत्मतत्त्व निरंतर चिद्विलासस्वरूप है। इस चैतन्यस्वरूप आत्मा में इस चेतन का ही तो विलास होगा। वस्तु का सत्त्व स्वत:सिद्ध है और जो वस्तु जिस स्वभावात्मक है उस वस्तु में उस ही के अनुरूप विलास होगा। क्या कभी पुद्गल द्रव्य जाननहार बन सकते हैं? नहीं बन सकते हैं, निरंतर रूप, रस, आदिक रूप ही परिणम सकते हैं। इसी कारण क्या यह आत्मा कभी चिद्विलास को छोड़कर रूप, रस आदिक रूप परिणम सकता है? कभी नहीं परिणम सकता है। विकार अवस्था ने भी इस चित्स्वभाव के, चित्ततत्त्व के अभिन्न आधारभूत जीवास्तिकाय में जो भी विकार उपाधिवश बन सके, भले ही हो जाय, मगर चैतन्यस्वभाव के विपरीत रूप आदिक परिणमन कभी नहीं हो सकते।

आत्मा का अखंड स्वरूप- यह आत्मपदार्थ निरंतर अखंड अद्वैत सहज चिद्विलासस्वरूप है, अखंड तो यों है कि यह एक वस्तु है, यह मेरा आत्मा एक परमपदार्थ है, उसमें जो भी परिणमन होगा, यद्यपि यह आत्मा प्रदेश की अपेक्षा विस्तार को लिए हुए है। परंतु परिणमन विस्तार को लिए हुए नहीं होता। जैसे आकाश प्रदेश की अपेक्षा विस्तार को लिए हुए है, परंतु आकाश का परिणमन विस्तार को लिए हुए नहीं होता और इसी कारण अलोकाकाश में पड़े हुए असीम आकाश को परिणमने के लिए लोकाकाश में पड़ा हुआ कालद्रव्य ही निमित्त हो जाता है। कालद्रव्य लोक के बाहर नहीं है, वहाँ यह समस्या नहीं आती है कि अब यह अलोकाकाश से परिणमे। आकाश में प्रदेश विस्तार है, किंतु परिणमन का विस्तार नहीं है। जो भी एक परिणमन है वह उस एक पूर्ण पदार्थ में होता है। जैसे यह चौकी जल जाय तो एक खूँट जल रहा है, चौकी नहीं जल रही है और वह परिणमन धीरे-धीरे आता जा रहा है। यहाँ यह परिणमन का विस्तार नजर आता है तो यह चौकी एक नहीं है इसलिए यह विस्तार नजर आता है। यह अनंत परमाणुवों का स्कंध है। एक पदार्थ में परिणमन विशेष नहीं होता। इस प्रकार का तो यह मैं आत्मा अखंड हूं।

आत्मा की अद्वैतता व क्रियाकांडपराड्.मुखता- यह मैं आत्मतत्त्व अद्वैत हूं। मेरे स्वरूप में किसी दूसरे का प्रवेश नहीं हो सकता है। अभेद्य हूं इसलिए अद्वैत हूं, ऐसा सहज शुद्ध चैतन्य के विलासरूप यह मैं अंतस्तत्त्व हूं। यह आत्मा आत्मीय आनंद के विलास में डूबा हुआ है। समस्त बाह्यक्रियाकांडों से पराड्.मुख है। यह अपने स्वरूप में अपना स्वभाव मुख मोड़े हुए है। हाथ, पैर कहीं कैसे ही चलो, पर यह अंतस्तत्त्व अपने में ही वर्त रहा है। समस्त बाह्य क्रियावों से यह पराड्.मुख है। मोही जीव कल्पनावश बाह्य क्रियावों के सन्मुख होता है, वहाँ पर भी यह आत्मतत्त्व उन क्रियावों से पराड्.मुख है। यह तो निरंतर अपनी अंत:क्रियावों का अधिकरणरूप है। ऐसे इस आत्मतत्त्व को परम जिन योगीश्वर धर्मध्यान और शुक्लध्यान के द्वारा ध्याता है।

समता परमसंपदा- ये दोनों ध्यान परमसमाधिरूप संपदा के कारण हैं। आत्मा की वास्तविक संपत्ति समता है। कोई पुरुष गृहस्थी में या अन्य कार्यों में बिगड़ रहा हो उस समय की उसकी मुद्रा निरखो और विश्राम और समता से बैठा हुआ हो उस समय की उसकी मुद्रा देखो, समता की मुद्रा सुभग होती है। लोग रूपों में यह खोज करते हैं कि यह सुंदर रूप है और यह असुंदर रूप है, कैसी भी सुंदर महिला हो अथवा पुरुष हो, यदि वह कर्कश हो, वहाँ क्रोध भी निरंतर बरसता हो, छल-कपट से दुनिया को परेशानी में डाले हो तो रूपवान् नहीं जँचता है और कोई सांवला हो अथवा काला हो, पर वह परोपकारी हो और सदा शांत रहता हो, क्षमाशील हो तो उसकी मुद्रा के निरखने पर उसमें सुरूपता झलकेगी, उसमें कांति प्रकट होगी। जिस स्वच्छता के प्रताप से यह रूप बनता है उस स्वच्छता का तो इस जगत के मोहियों ने अनादर किया है और केवल उस बाह्य रूप में ही आसक्ति है। इस कारण वे रूप का मधुर आनंद नहीं ले पाते हैं। रूप परिणमन का जो मूल साधन है उसमें प्रीति हो तो रूप का आनंद प्राप्त होगा। यह तो पौद्गलिक ठाठ है, परम संपदा तो समता है। इस परमसमाधि के कारण, समता के कारणभूत ये दोनों ध्यान हैं।

स्वात्माश्रित ध्यान- यह हितकारी ध्यान स्वात्मा के आश्रय से उत्पन्न होता है और निर्विकल्प है। धर्मध्यान में तो रागादिक का स्थूल विकार नहीं है और शुक्लध्यान में तो ये सूक्ष्म भी विकल्प नहीं हैं, ऐसे इन दोनों ध्यानों के द्वारा जो सदा निरावरण आत्मा को ध्याता है उसके ही नित्य शुद्ध सामायिक व्रत होता है। यह समतापरिणाम मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति से रचा गया है। जिनेंद्र भगवान के शासन में यह बात प्रसिद्ध की गयी है कि इस जीव को भरण समाधिभाव है और वह समाधिभाव इस सदाशिवात्मक परमसमाधि के ध्यान से प्रकट होता है। वे योगीश्वर धन्य हैं जिनकी बुद्धि धर्मध्यान और शुक्लध्यानरूप परिणमी हुई है, जो निर्दोष सहज आनंदस्वरूप आत्मतत्त्व का आलंबन लिए हुए हैं, ऐसे ध्यान वाले शुद्ध रत्नत्रयात्मक योगीश्वर ऐसे विशाल आनंद पद को प्राप्त करते हैं जहाँ समस्त दु:ख समूह नष्ट हो गए हैं।

परमसमाधि का उपसंहार- इस अंतस्तत्त्व को वचनों से नहीं कहा जा सकता है। सर्वविकल्पों को छोड़कर सहज ज्ञानानंदस्वरूप निज आत्मतत्त्व में उपयोग लगायें तो मेरा यह अनुभव सहज प्रकट हो सकेगा। विकल्प करके इस परमसमाधि के दर्शन नहीं हो सकते हैं। इस परमब्रह्म की दृष्टि उस ही पुरुष के उत्कृष्ट हो सकती है जिसको अपने इस शरीर तक की भी चिंता नहीं है, समस्त परिग्रहों से जो विरक्त है, समस्त परिग्रहों का जो त्याग कर दे, किसी भी परिग्रह की ओर दृष्टि न दे, आत्महित की निष्ठा से अपने अंतस्तत्त्व की रुचि बढ़ाये, ऐसे उपासकों को भी इस परमसमाधि के चमत्कार का क्षणभर को दर्शन हो जाता है। परमसमाधि के पात्र सम्यग्दृष्टि पुरुष को, परमसंयमी पुरुष को भावपूर्वक नमस्कार हो। यह परमसमाधि का उपसंहार है। उप का अर्थ है समीप में, सं का अर्थ भले प्रकार, हार का अर्थ है आत्मायत्त कर लेना। यहाँ समतापरिणाम को, परमसमाधि को अपने आपमें खपा लिया गया है। यों परमसमाधि अधिकार के उपसंहार में परमसमाधि का उपसंहार किया गया है।

परमसमाधि अधिकार समाप्त

परमभक्ति अधिकार


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