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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 142

From जैनकोष



ण वसो अवसो अवसस्स कम्म वावस्सयं ति बोधव्वा।

जुत्तित्ति उवाअंतिय णिरवयवो होदि णिज्जेत्ति।।142।।

आवश्यक निर्युक्ति―जो वश में न हो उसका नाम है अवश। जो पुरुष एक अपने आत्मतत्त्व के सिवाय अन्य किसी परपदार्थ के वश नहीं रहते हैं, किसी भी कल्पना, परभाव के अधीन नहीं रहते हैं उनपुरुषों को अवश कहते हैं और अवश का जो कर्म है, कर्तव्य है, पुरुषार्थ है उसको आवश्यक कहते हैं। यह तो हुआ आवश्यक का कार्य। अब इस शब्द के साथ निर्युक्ति भी जुडा रहता है, पूरा नाम है आवश्यक निर्युक्ति। इसमें निर्युक्ति शब्द का अर्थ है निरवयवस्य युक्ति: इति निर्युक्ति:। जिसमें अवयव नहीं रहते हैं वह है मोक्ष। उस मोक्ष का जो उपाय है उसे कहते हैं निर्युक्ति। युक्ति नाम उपाय का है अथवा आवश्यकरूप निर्युक्ति नि:शेष उपायों में संपूर्ण उपाय अर्थात् मोक्षप्राप्ति का एकमात्र उपाय है, किसी भी अन्य तत्त्व के परभाव के वश में न होना और अपने सहज आनंदस्वरूप का दर्शन करते हुए प्रसन्न रहना, यही है मोक्ष का उपाय।

वास्तविक वीरता―भैया !जो अवश होता है वह परम जिनयोगीश्वर है।दुनिया जिसमें वीरता समझती है वह है कायरता और जो वास्तविक वीरता है उसमें यह दुनिया है कायर। भोग भोगना आसान काम है और भोग तजना शूरता का काम है, लेकिन जगत के लोग उसे बहादुर जानते हैं, जो बहुत महल खड़े करा दे, भोगों के बड़े साधन जुटा दे। पर भोगों के साधन जुटा लेना,इस दुनिया में अपनी नामवरीप्रतिष्ठा का फैलाव बना लेना, कुछ मनोहारी भाषणों और करतूतों के द्वारा जनता में अपना रौब बैठाल लेना, पंचेंद्रिय के विषय-साधनों का संचय कर लेना, यह बहादुरी नहीं है। बहादुरी तो समस्त परतत्त्वों की, परभावों की उपेक्षा करके जो आत्मीय ज्ञानानंदस्वरूप है उस स्वरूप में मग्न रहना, यही है बहादुरी का काम।

सुगम स्वाधीन आवश्यक कार्य―अथवा आत्मा की उपासना का है तो अत्यंत सुगम काम, किंतु अज्ञानी जनों से किया नहीं जा सकता। उनकी अपेक्षा से यह बहादुर का काम है। प्रेमी पुरुषों को परिजनों के वातावरण में रहकर तो न जाने कितना समय व्यर्थ गुजर गया है? उन्हें मोह का वातावरण तो आसान लगता है, कोई बच्चा प्रतिकूल हो गया, कोई झंझट आ गयी तो उन झंझटों को संभालने का भी काम उन्हें आसान लगता है, किंतु पूजा में, स्वाध्याय में, सत्संग में धर्म की किसी भी साधना में वे कभी जायें तो उनको समय गुजारना कठिन लगता है,बार-बार घड़ी देखते हैं कि अरे !कितना समय हो गया है। उन्हें सब मोह का वातावरण आसान लगता है तो कठिन तो काम हुआ आत्मसाधना का, किंतु जो आत्मसाधना में कुशल हैं उन पुरुषों के लिए बच्चे खिलाना, पालना, अनेक प्रतिकूल बोझों का सहना, यह कठिन मालूम होता है। जो पुरुष किसी परतत्त्व के वश में न हो, केवल आत्मीय चैतन्यस्वरूप की दृष्टि के वश में है उस योगी पुरुष के यह परमावश्यक कर्म अवश्य ही होता है। यह बात इस गाथा में बतायी गयी है।

आत्मयोग―योगी नाम उसका है जो योग करे, जोड़ करे।जो वस्तु पृथक्-पृथक् हैं, लाखों उपाय किए जायें उनका उसमें जोड़ नहीं पहुंचता है। जो वस्तु एक है, किंतु कल्पना-भेद उस धर्म धर्मी को जोड़ नहीं रहा है, ज्ञानप्रकाश होने पर उस वस्तु में जोड़ हो सकता है। जो पृथक्-पृथक् वस्तु है उसमें कोई भी जोड़ नहीं हो सकता है। यह आत्मा और इस आत्मा का यह उपयोग यह कोई जुदा पदार्थ नहीं है, एक ही वस्तु है, धर्मों का भेद है। उपयोग धर्म है आत्मा धर्मी है,केवल समझने के लिये भेद किया गया है। जिसमें ज्ञान होता है उसे आत्मा कहते हैं, यह समझाने के लिये कहा जाता है। कहीं ऐसा नहीं है कि आत्मा कोई चीज है अलग और उसमें ज्ञान भरा रहता है और जिसमें ज्ञान भरा हो उसे आत्मा कहते हैं, ऐसी बात नहीं है। वह आत्मा ही स्वयं सर्व ओरसे ज्ञानरसघन है। एक ही चीज है।

विचित्र योग और वियोग―किसी भ्रम से यह मेरा ज्ञान उपयोग इस धर्मी आत्मा से बिछुड़ा हुआ है।बिछुड़ करके भी लगा हुआ है इस आत्मा से ही। इस आत्मा से ज्ञान का बिछोह बड़ा विचित्र बिछोह है। बिछोह भी है और बिछोह भी नहीं है। जो ज्ञान आत्मा को छोड़कर किसी परवस्तु में लगता है वह ज्ञान क्या आत्मा का आधार छोड़कर परपदार्थों में लगेगा? नहीं लगेगा। परपदार्थों की ओरदृष्टि रहकर भी वह ज्ञान आत्मा के आधार में ही बहिर्मुख होकर रह रहा है, इस कारण ज्ञानी आत्मा को बिछोह नहीं होता, लेकिन जो ज्ञान आत्मा की खबर भी न ले, उसे तो पूरा बिछोह कहा जायेगा। जैसे घर में रहते हुए लोग घर में ही रहेंगे, झगड़ा भी हो गया तो घर में ही लड़ेझगड़ेंगे। घर में रहते हुए भी वे एक घर में रह नहीं रहे हैं।झगड़ा मच रहा है, किसी का किसी से मन नहीं मिला। उन्हें एक जगह रहने वाला नहीं कहा जाता है। यद्यपि एक ही घर में रह रहे हैं, दूसरी-दूसरी जगह नहीं रह रहे हैं, किंतु मन न मिले तो उसे कहते हैं कि एक जगह नहीं रह रहे हैं। यह तो एक लौकिक दृष्टांत है। प्रकरण में यह जानना चाहिए कि यह उपयोग आत्मा का ही एक अभिन्न धर्म है, भिन्न नहीं है, आत्मा का ही स्वरूप है, लेकिन जो ज्ञान अपने आधारभूत मौलिक धर्मों का ख्याल ही न रखे, केवल बाह्य पदार्थों का ही ध्यान है तो समझना चाहिये कि यह ज्ञान आत्मा से बिछुड़ गया है। बिछुड़कर किसी दूसरी जगह नहीं पहुंचा, लेकिन जब माना ही नहीं है अपने आधार को तो वह बिछुड़ा ही है। ऐसा बिछुड़ा हुआ यह उपयोग आत्मा में जुड़ जाय, इसका आत्मा में योग हो जाय, इसे कहते हैं परमयोग।

आवश्यक शब्द का वास्तविक मर्म और विकृत अर्थ रूढ़ होने का कारण―ये योगीजन जिन्होंने आत्मा से योग बनाया है उन्हें कहते हैं योगी। जो भली प्रकार योगी बने हैं उन्हें कहते हैं योगीश्वर। जो योगी अपने आत्मग्रहण के अतिरिक्त अन्य किसी भी भाव का,किसी भी पदार्थ का अधीनत्व स्वीकार नहीं करता है उस पुरुष को अवश कहते हैं और उस अवश परमयोगीश्वरों के जो काम हो रहा हो उस काम को आवश्यक कहते हैं। उस योगी का क्या काम चल रहा है? एक आत्मा का दर्शन, आत्मा का ज्ञान और आत्मा का ही आचरणरूप शुद्ध चिद्विलासरूप पुरुषार्थ चल रहा है,यही है परमावश्यक। आवश्यक नाम परिणति का है अर्थात् मुझे आवश्यक काम पड़ा है, ऐसा कोई कहे तो उसका अर्थ यह लगाना कि मुझे मोक्ष के उपाय का काम पड़ा हुआ है, यह है सही-सही अर्थ। अब कोई आवश्यक शब्द को विषय-साधनों की ओरही लगा दे तो इसके लिए क्या किया जाय? जैसे कुबेर शब्द बड़ा उत्तम है, जो पुरुष उदार है, दान करता रहता है, ऐसे पुरुष को लोग कुबेर की उपमा देते हैं और कोई कंजूस धनी हो जिसकी कंजूसी नगर भर को विदित है और उससे कोई कहे आइए कुबेर साहब तो वह तो शर्म के मारे गड़ जायेगा और अपने को गाली मानेगा, मुझसे ये लोग मजाक करते हैं। अरे ! शब्द तो उत्तम बोला,पर अयोग्य पुरुष के लिए। आवश्यक कहो या मोक्ष मार्ग कहो दोनों का एक अर्थ है, लेकिन इस मोही प्राणी ने अपने खाने-पीने, विषय भोगों की बातों में आवश्यक शब्द जोड़ दिया है और इससे यह आवश्यक शब्द मोही-जगत में अपनीअंतिम सांसे ले रहा है। अब इस शब्दों में जान नहीं रही।

आवश्यकनिर्युक्ति का फल निरवयवता की सिद्धि―आवश्यक नाम है मोक्षमार्ग का। निश्चय धर्मध्यानरूप, आत्मानुभवरूप जो योग का अंतरंग में पुरुषार्थ है उस पुरुषार्थ का विलास यह तो हुआ आवश्यक शब्द का अर्थ। अब इसके साथ निर्युक्ति शब्द लगा रहे हैं, उसका अर्थ कह रहे हैं। युक्ति नाम उपाय का है और निर्युक्ति शब्द एक संकेत शब्द है, जिसका पूरा नाम है निरवयव, अवयवरहित। जहाँ शरीर नहीं रहा, केवल ज्ञानपुंज रहा, ऐसी अवस्था को निरवयव बोलते हैं अर्थात् मोक्ष। उस मोक्ष की युक्ति बना लेना, उपाय कर लेना, इसका नाम है निर्युक्ति। जो अवश पुरुष होते हैं, जो परद्रव्यों के अधीन नहीं हैं वे ही पुरुष निरवयव हो जाते हैं।

उत्तम शब्दों का निकृष्ट अर्थ में रूढ़ होने का कारण―जमाना प्राचीन काल में एक धार्मिक सभ्यता का था और उस समय जो पुरुष के लिए विशेषण बोला जाता था वह विशेषण अब धीरे-धीरे गालीरूप परिणत होता चला जा रहा है। जैसे उत्तम वस्तु दीन-हीन के हाथ पड जाय तो उसका दुरुपयोग ही होता है, ऐसे ही ये सब विशेषण जो व्यवहार में आज भी प्रचलित हैं, किसी समय लोगों की प्रशंसा के लिए थे, आज गालीरूप बन गए हैं। जैसे लोग कहते हैं नंगा, यह नंगा है, मायने जो आभ्यंतरबाह्य परिग्रहरहित हुआ, केवल शरीरमात्र ही जिसका परिग्रह है, ऐसा जो विशिष्ट योगी है, मनुष्यों के द्वारा पूज्य है, ऐसे विजयी पुरुष का नाम है नंगा, लेकिन दीन, गरीब, बेवकूफ लोगों को नंगा शब्द बोला गया, इसी से यह गालीरूप बन गया है। ऐसे ही लुच्चा मायने आलोचन करने वाला, तत्त्व का विचार करने वाला। जो बड़ा तत्त्वविचारक पुरुष है अर्थात् जो इतना विरक्त साधु संतपुरुष है कि अपने केशों का भी लुंचन करता है, ऐसे योग्य पुरुष का नाम है लुच्चा, लेकिन अयोग्य पुरुषों को बड़ी बात कहकर शर्मिंदा करने का उपाय किया गया था और तब से यह शब्द गालीरूप परिणत हो गया है।

उत्तम शब्दों की भांतिआवश्यक शब्द की विकृति―लोग कहा करते हैं उचक्का। यह तो बड़ा उचक्का है। उचक्का शब्द का मूल शब्द है उच्चक:, उच्चै: शब्द में क प्रत्यय लगाकर उच्चक: बना है जिसका अर्थ है लोक में उच्च पुरुष है। जो उच्च हो उसका नाम है उचक्का, लेकिन आज चूँकि यह शब्द छोटे लोगों को शर्मिंदा करने के लिए किसी समय बोला गया था तब से यह शब्द गालीरूप परिणत हो गया है। लोग कहते हैं कि यह पोंगा है। इसका मूल शब्द है पुंगव। पुंगव मायने श्रेष्ठ। पूजा में आप भगवान को भी पुंग बोलते हैं।‘स्वस्ति त्रिलोकगुण्वे जिनपुंगवाय’भगवान पुंगव है मायने श्रेष्ठ हैं। पुंगा शब्द एक ऊँचा शब्द है, लेकिन लोगों ने जब किसी दुष्ट, हीन पुरुष के मजाक करने के लिये बोल दिया तो अब वह पोंगा शब्द गाली के रूप में परिणत हो गया है। यों ही समझ लीजिये कि जितने भी गालियों के शब्द हैं आज, सिंगल शब्द जोड़-तोड़ के वाक्यों वाले नहीं, जैसे कोई मां बहिन का नाम लेकर कहे वह तो प्रकट उद्दंडता है, लेकिन जो सिंगल शब्द हैं, इकहरे शब्द हैं, वे सब प्रशंसा के शब्द हैं। यहाँ उदाहरण रूप दो-चार शब्द कहे हैं आज। ऐसे ही आवश्यक शब्द की मिट्टी पलीत हो रही है। लोग गप्प करना, ताश खेलना, विषय भोगना, सिनेमा देखना, लड़ाई के लिए जाना, अनेक कामों के लिए आवश्यक शब्द बोलने लगे हैं। भाई हमारा समय अब नष्ट मत करो, हमें अभी एक आवश्यक काम पड़ा है। क्या काम पड़ा है? भोग विषय। ऐसी गंदी बातों के लिए आवश्यक शब्द बोलने लगे हैं, परंतु आवश्यक का अर्थ है मोक्ष का उपाय बना लेना। भाई अब व्यर्थ के कोलाहल में हम अपना समय नहीं लगाना चाहते हैं। हम तो अपना निश्चय परमावश्यक काम करेंगे।

बुद्धि का सुयोग―भैया ! जो आवश्यक कार्य है योगियों का यह ही आनंद का देने वाला है। प्रेम से किसी भी स्त्री, पुत्र, मित्र से बोल लो, समझो सब एक विपरीत मार्ग में बढ़ गये हैं। उस मोहजाल से,इस स्नेह परिणाम से,अंतरंग की कुश्रद्धा से वह मोक्ष मार्ग बहुत दूर हो गया है। इसमें तत्त्व कुछ न निकलेगा और जीवनभर स्नेह,मोह की बाधाएँ सहकर जब बुढ़ापा आ जाता है तब कुछ अक्ल ठिकाने आती है और इंद्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और शरीर के नाते से यह पराधीन हो जाता है। अब उस अक्ल का क्या करें, जो अक्ल बुढ़ापे में आयेगी? वह यदि जवानी में आ जाय तो यह कितना अपना भला कर सकता है? बल हो तो जवानी का, अक्ल हो बुढ़ापे की और अवस्था हो बालकपन की―ये तीनों बातें यदि एक साथ मिल जायें तो वह पुरुष एक बालप्रभु है।

स्ववशता की भावना―योगी अपने हित में लीन रहता है। निज जो शुद्ध जीवस्वरूप है, प्रदेशात्मक दृष्टि से निरखकर शुद्धभाव रखने वाला जो यह जीवास्तिकाय है उस जीवस्वरूप को निरखिये, अन्य किसी भी पदार्थ के वशीभूत नहीं होना है। जो ऐसा करता है उसके ही निर्युक्ति होती है, मोक्षमार्ग का उपाय होता है। ऐसा जाप जपें, ऐसी भावना भायें, ऐसा ध्यान करें कि कितनी भी संपदा मेरे सामने आए तो भी हम उसमें न लुभायें, ऐसा मेरा ज्ञानबल बना रहे। देवांगना सदृश्य भी कोई रूपवती स्वयं ही कुछ प्रीतियाचना करे तब भी उसमें रंचमात्र भी लोभ न पैदा हो, ऐसा ज्ञानबल रहे।सारे जगत के लोग दृश्यमान् पुरुष मिलकर भी कोई प्रशंसा करें तिस पर भी उस प्रशंसा में मौज मानने की कल्पना न जगे और इस तत्त्वज्ञान के बल से अपने आपके स्वरूप का झुकाव बना रहे, ऐसा बल प्रकट हो।

ज्ञानी की आंतरिक चाह―हे प्रभो ! मुझे अनंत ज्ञान की चाह नहीं है, जो ज्ञान मेरे सारे विश्व को जाने। मुझे रंच चाह नहीं है कि मेरे ऐसा ज्ञान प्रकट हो जो ज्ञान सारे विश्व का ज्ञाता बने। केवल मुझे चाह है इतनी कि वह मेरा ज्ञान इस ज्ञान के स्वरूप का ही ज्ञान करने लगे, यह ही इच्छा है। मुझे केवलज्ञान की चाह नहीं है, मुझे ज्ञान के ज्ञान की चाह है, फिर केवलज्ञान चाहे अवश्य ही मेरे प्रकट हो, मैं क्या करूँ? लेकिन मुझे वांछा केवल ज्ञान के ज्ञान की है, अन्य पदार्थों के ज्ञान की वांछा नहीं है। हे प्रभो ! मैं ऐसा दर्शन नहीं चाहता कि तीन लोक का दर्शन मुझे होता रहे, मुझे तो इस श्रेष्ठ परमपुरुष का ही दर्शन चाहिए। मुझे अनंत सुख न चाहिए, केवल कभी कोई आकुलता न रहे इतनी भर बात चाहिए। मुझे बल भी अनंत न चाहिए, किंतु मेरा ज्ञान ज्ञान के आधारभूत इस अभिन्न अंतस्तत्त्व में बना रहे, जमा रहे, इतना भर बल चाहिए। यों जो आत्मा में नियुक्त होता है उस पुरुष के अज्ञानरूप अंधकार नष्ट होता है। अपने से प्रकट हुई प्रकाशमय ज्योति के द्वारा जो अवस्था प्रकट होती है वह निरपेक्ष, शुद्ध, सर्वथा अमूर्त अवस्था प्रकट होती है, उस ज्ञानानुभूत में अनंत आनंद होता है। प्रत्येक संभव उपायों द्वारा एक इस ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व का ज्ञान करना चाहिए।


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