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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 145

From जैनकोष



दव्बगुणपज्जयाणं चित्तं जोकुणइ सोवि अण्णवसो।

मोहांधयाखवगयसमणा कहयंति एरियसं।।145।।

ज्ञानविकल्प की प्रीति में अन्यवशता―प्रकरण यह चल रहा है कि निश्चय से परमआवश्यक काम क्या है? दुनियावी लोग विषयकषायों के साधनों को जुटाना ही आवश्यक काम समझते हैं किंतु वे सब काम आवश्यक नहीं हैं। आवश्यक उसे कहते हैं जो पुरुष किसी अन्य पदार्थ के वश में न हो, ऐसा अवश, स्वतंत्र पुरुष का जो कार्य हो, अर्थात् साधुसंतों के करने योग्य काम को आवश्यक कहते हैं। जो पुरुष अपने आत्मस्वरूप को छोड़कर अन्य किसी भी परभाव के अथवा परपदार्थ के वश होता है उसे अन्यवशकहते हैं। इस गाथा में अन्यवश का स्वरूप कहा गया है। जो पुरुष द्रव्य,गुण,पर्याय में अर्थात् उनके विकल्पों में मन को लगाता है वह भी अन्यवश है। ऐसा मोहांधकार से दूर रहने वाले साधुसंत जन कहते हैं।

परवशता का विवरण―जो पुरुष धन,मकान,संपदा आदि में चित्त रमाते हैं वे तो अन्यवश प्रकट ही हैं। जो परिजनों में, मित्रजनों में,कुटुंबियों में अपना चित्त लगाते हैं वे भी प्रकट अन्यवश हैं, किंतु निश्चय से तो वह भी अन्यवश ही है जो अपने रागद्वेष आदि विकारों में उपयोग लगाता है। रागादिक रूप ही मैं हूँ,इस प्रकार जो आत्मप्रतीति बनाये रहते हैं अथवा जो रागादिक सुहाते हैं, उनकी ही ओर जो आकर्षण बनाये रहते हैं वे भी अन्यवश हैं। यहाँ तो उन सब अन्यवशों से अत्यंत सूक्ष्म अन्यवश की बात कही जा रही है।धर्मकार्य में ज्ञान की आवश्यकता होती है और वह ज्ञान द्रव्यगुणपर्यायरूप में किया जाता है। प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्रस्वतंत्र अपना स्वरूप लिए हुए हैं। प्रत्येक पदार्थ में सहज अनंत शक्ति शाश्वत चली आयी है, उन शक्तियों का दूसरा नाम गुण है। उन गुणों के प्रत्येक के परिणमन निरंतर चलते रहते हैं। वे परिणमन उन पदार्थों के गुणों की व्यक्त दशा है। देखो ना,विकल्पों में वस्तु के स्वरूप का विचार करना तो भला है ना, किंतु इस गाथा में यह बता रहे हैं कि इन विकल्पों में भी जो अपना मन लगाते हैं वे भी अन्यवश हैं। केवल जो अपने सहज ज्ञानशक्ति स्वरूप में उपयोग लगाये हैं वे तो अवश हैं, स्वतंत्र हैं, मोक्षमार्गी हैं, किंतु जो आत्मस्वभाव से च्युत होकर विकल्पों में लगता है वह अन्यवश है।

धर्मचर्चा में भी विवाद कलह होने का मूल कारण―भैया ! कभी देखा होगा विद्वान्-विद्वान् बैठे हों और वे धर्म की चर्चा कर रहे हों, समझदार हैं, अपने ज्ञान की बात बता रहे हैं, द्रव्य पर्याय की चर्चा चल रही है, निमित्त उपादान आदि अनेक प्रकरण चल रहे हैं, उन प्रसंगों में एक दूसरे को जबरदस्ती कुछ मनाना चाहते हैं। बात ऐसी है, तुम जो कहते हो सो झूठ है, ऐसा दबाव डालते हैं और कभीकभी तो धर्मवार्ता के मध्य में भी तनातनी हो जाती है और झगड़ा होने लगता है। यह झगड़ा किस बात का है? इस झगड़े का मूल है विकल्पों में बुद्धि का रमना। विकल्पों में जो आत्मीयता का जो उपयोग किया है, जो ऐसा विकल्प करता है यह मैं हूँ,यह विकल्प मैं हूँ,मेरी बात यह मानता नहीं है, अरे ! यह कितनी महती विडंबना है? धन,संपदा पर झगड़ा हो तो यह कहा जा सकता है कि पैसे के बिना गृहस्थ जीवन नहीं गुजार सकते हैं इसलिए पैसे पर झगड़ा हुआ है, लेकिन धर्मावार्ता पर,ज्ञान की चर्चा पर भी झगड़ा होने लगे तो इसे कितना व्यामोह माना जा सकता है? जो पुरुष इन विकल्पों में भी अपना चित्त रमाता है उसे अन्यवश कहा है।

शुभविकल्प की अपनायत में श्रमण की अन्यवशता―कोई द्रव्यलिंगधारी साधु जिसे अपने आत्मा के सहजस्वरूप का अनुभव नहीं जगा है, किंतु निर्ग्रंथ भेष धारण करके 28 मूल गुणों का विधिवत् पालन करता है, उन क्रियावों में, विकल्पों में जो संतोष मान लेता है ऐसा द्रव्यलिंगधारी पुरुष चाहे वह बड़ा विद्वान् भी क्यों न हो और होते ही हैं ग्यारह अंग 9 पूर्व तक के पाठी, इतना विद्वान् होकर भी कितने ही द्रव्यलिंगी श्रमण रहा करते हैं। भगवान अरहंत देव के दिव्यध्वनि की परंपरा से चला आया जो पदार्थ का वर्णन है, कैसा वह मूल में है, कैसा उनका परमात्म विकास है, इन समस्त पदार्थों का प्रतिपादन करने में यह साधु बड़ा समर्थ है। फिर तो उन छहों द्रव्यों की चर्चा में वस्तुस्वरूप की चर्चा के विकल्प में अपना चित्त रमाता है तो उसे भी परतंत्र कहा गया है। यह भी साधु पराधीन हो गया है, स्वाधीन नहीं रहा है। यद्यपि ये साधु किसी धन,संपदा के अधीन नहीं हुए हैं, बाह्य परिग्रहों से पूर्ण विरक्त हैं और वे इतने दिल के पक्के हैं कि कोई दुश्मन इन्हें पीटे, मारे, इन पर उपसर्ग करे तो वे भी समता धारण करते हैं, उसे किसी भी प्रकार का वे कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते हैं, किंतु उस समता के मूल में भाव यह पड़ा है कि मैं साधु हूँ,मुझे समता से रहना चाहिए, रागद्वेष न करना चाहिए, ऐसा अपने आपमें शुभविकल्पों में आत्मतत्त्व का विश्वास बनाये हैं। तो इस पर्यायरूप के विकल्प से वह साधु भी अन्यवश है, परतंत्र है।

परमब्रह्मस्वरूप के परिचय बिना विज्ञान निपुण के भी परमावश्यक का अभाव―यह चर्चा आत्मा के अंत: मर्म की चल रही है। आत्मा का अंतरंग, वास्तविक, शुद्ध, निरपेक्षस्वरूप जो है उसके स्वीकार किए बिना यह जीव दुर्धर तपस्या करके और ज्ञान की बड़ी-बड़ी चर्चायें करके भी परवश रहा करता है, उसके आवश्यक कर्म नहीं होता। इन छहों द्रव्यों में एक द्रव्य तो मूर्तिक है,पुद्गल द्रव्य। जिसमें रूप, रस, गंध,स्पर्श पाया जाय उसे मूर्तिक कहते हैं। मूर्त केवल पुद्गलद्रव्य ही है। शेष के 5 द्रव्य जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये अमूर्त पदार्थ हैं, इसमें रूप, रस, गंध और स्पर्श नहीं है। इस प्रकार मूर्त और अमूर्त के भेद से पदार्थों का परिज्ञान और प्रतिपादन किया जा रहा है, अथवा छहों द्रव्यों में केवल जीवद्रव्य तो चेतन है शेष पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल―ये 5 द्रव्य अचेतन हैं। इनका विस्तार,इनकी परिणतियां, इनका विधिविधान, निमित्तनैमित्तिक संबंध, स्वभाव और विभाव रूप परिणति―इन सब चर्चावों में भी जो चित्त लगाये है और उनका वर्णन करने में भी बड़ा कुशल है ऐसा भी ज्ञानी पुरुष एक परमब्रह्मस्वरूप का ग्रहण न कर पाने से परतंत्र है और उसके आवश्यक काम नहीं कहा गया है।

अपनी बात―यह चर्चा बहुत गहरी है, साधारण परिज्ञान से भी समझ में नहीं आती है, लेकिन चर्चा अपनी चल रही है, अपने आपके आत्मा की बात है। जो पुरुष इतनी बड़ी प्रतिभा रख रहा हो, बड़े-बड़े व्यापार रोजगार के हिसाब कर रहा हो और बड़े विज्ञान की बातें भी बना सकता है वह पुरुष अपने आपके आत्मा की सही बात न समझ सके ऐसा कैसे हो सकता है? किंतु रुचि और बुद्धि चाहिए।दृष्टि अपने आपकी ओरहो तो यह सब सुगम है। निज सहज परमब्रह्मस्वरूप को ‘यह मैं हूँ’ऐसा अनुभव किए बिना यह जीव कर्मों को दूर नहीं कर सकता है। इस संसारी जीव ने अपने आपको नाना रूपों में मान रक्खा है। जो जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उसही रूप अपने को मानता है और इसी कारण शरीर में कुछ भी बाधा आए, रंच भी संकट आए तो अपने को विपन्न अनुभव करता है। मैं बहुत विपत्ति में हूँ। अरे ! सबसे बड़ी विपत्ति तो यह है कि शरीर को अपना माना जा रहा है। शरीर में रोग हो गया अथवा धन संपदा में कुछ कमी हो गयी तो यह कोई संकट नहीं है। ये तो समस्त परपदार्थ हैं, इनका परिणमन उन ही पदार्थों में हो रहा है। तेरे को इससे क्या संकट है? संकट तो यह है कि इन परपदार्थों में तू आपा मान रहा है ‘यह मैं हूँ’इस प्रकार का जो भीतर में भ्रम पड़ा है यह भ्रम ही महान् संकट है, इस जीव पर अन्य कुछ संकट नहीं है। परवस्तुवों में होने वाली स्थितियों से यह मोही जीव अपने पर संकट मान लेता है।

गुण पर्यायों का विज्ञान―यह पदार्थ के स्वरूप के प्रतिपादन की बात चल रही है। प्रत्येक पदार्थ अपने गुणों में कुछ न कुछ परिणमन कर रहा है और प्रत्येक पदार्थ अपनी कोई न कोई शकल बनाये रहता हैं। पदार्थ में आकार बनने की परिणति है उसे तो व्यंजनपर्याय कहते हैं और पदार्थ में गुणों के परिणमन की जो विशेषता है उसे अर्थपर्याय कहते हैं। जैसे ये दृश्यमान भौतिक पदार्थ पुद्गल हैं, ये अपना कोई न कोई रूप रखते हैं, काला, पीला, नीला, लाल, सफेद आदि कुछ भी रंग रखते हैं। ये भौतिक पदार्थ खट्टा, मीठा, कडुवा, कषायला, चर्परा इत्यादि कोई न कोई अपना रस परिणमन रखते हैं, इसी तरह रूखा, चिकना, कड़ा, नरम, ठंडा, गरम इत्यादि स्वभावरूप अपने आपको बनाये रहते हैं। यों ही सुगंध,दुर्गंध आदिक भी कुछ परिणतियां हैं। ये पकड़ी नहीं जा सकती हैं, उठायी नहीं जा सकती हैं। जरा इन पदार्थों का रंग उठाकर दे दो। आप नहीं दे सकते हैं। इसी प्रकार जरा किसी पदार्थ का रस लाकर दे दो, नहीं दिया जा सकता है। ये तो केवल स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु इंद्रिय के द्वारा जाननरूप ग्रहण में आया करते हैं। ये सब तो गुणपर्याय हैं। इन पदार्थों का जो यह ढाँचा बना है, कोई गोल है, कोई चौकोर है, कोई तिखूँटा है, इस प्रकार का जो आकार बना है वह व्यन्जनपर्याय है।

अंतस्तत्त्व के अनुभव के बिना विविध विज्ञान से आवश्यक का अभाव―यों अर्थपर्याय और व्यंजनपर्याय की चर्चा करके भी अथवा इस गुणपर्याय और व्यंजनपर्याय से भी अत्यंत सूक्ष्म जो षड्गुण हानिवृद्धि द्वारा पदार्थ का निरंतर अर्थ परिणमन चला करता है, उसका प्रतिपादन,इतना गहरा सूक्ष्म वर्णन करके भी जो साधु इन विकल्पों में ही रमता है और धर्म की बात करके ही अपने को संतुष्ट मान लेता है वह भी अन्यवश है, पराधीन है। अभी उसने जो सहज निज स्वरूप है उस स्वरूप का अनुभव नहीं किया है, इसके भी यह परमआवश्यक काम नहीं होता है। इस द्रव्यलिंगी साधु ने त्रिकाल निरावरण नित्य आनंदस्वरूप जो निज कारण समयसार है अर्थात् अपने आपका जो सहजस्वरूप है उसमें चित्त नहीं दिया है।

स्वगुणपरिणमन―यह सहजस्वरूपसहजगुणों और सहजपरिणमनों का आधारभूत है। जिस प्रकार से हम आपमें उस आनंद गुण का विकास हो रहा है, चाहे वह दु:ख के रूप में हो रहा हो, चाहे सुख के रूप में हो रहा हो अथवा शुद्ध आनंद के रूप में हो रहा हो, वह सब मेरे गुणों से ही उठकर हो रहा है। किसी अन्य भोजन आदिक परपदार्थों से उठाकर यह सुख नहीं उत्पन्न होता है, किंतु एक बाह्य ऐसी परिस्थिति है कि यह जीव भोजन करके उस निमित्त और प्रसंग में उठ तो रहा है अपने आपके ही आनंद गुण से सुख परिणमन, किंतु भ्रमवश मानता है कि मुझे भोजन में सुख मिल रहा है।

परानंदभ्रम पर एक दृष्टांत―जैसे कोई कुत्ता किसी सुखी हड्डी को चबाता है तो उस चबाने में दांतों का वज़न उसके मसूड़ों पर पड़ता है जिससे उसके ही मसूड़ों से खून निकलता है। उस खुद के ही खून कास्वाद उसे आता रहता है लेकिन मानता है कि मुझे हड्डी का स्वाद मिल रहा है। यों ही ये संसार के प्राणी इन पंचेंद्रिय के विषयों को, इन भौतिक साधनों को भोगकर इनके प्रसंग में आनंद तो मिल रहा है खुद के ही आनंद गुण का किंतु भ्रम यह हो गया है कि मुझे भोजन का स्वाद आ रहा है; पुत्र, मित्र, स्त्री का सुख आ रहा है। इस कारण इन विषयसाधनों को सुरक्षित बनाए रखने के लिए और इनका परिवर्द्धन करने के लिए रातदिन श्रम किया जा रहा है। भैया ! इस आत्मा को इतनी सुध नहीं है कि अरे ! यह समस्त चमत्कार तेरे आत्मा का ही है, जितना ज्ञानविकास है वह तेरे आत्मा से ही प्रकट होता है, जितना आनंदविकास है वह भी तुझसे ही प्रकट होता है,किसी बाह्य वस्तु से नहीं।

महापुरुषों को आत्मदर्शन में संतोष-जो पुरुष विवेकी होते हैं, ज्ञानवान् होते हैं, जिन्होंने जगत का और अपने आपके यथार्थस्वरूप का भान किया है उन पुरुषों के ऐसा वैराग्य जगता है कि पाये हुए राज्यपाट को, करोड़ोंअरबों की संपदा को असार जानकर उसका त्यागकर निर्ग्रंथ दिगंबर भेष में वस्त्र मात्र भी जो परिग्रह नहीं रखते हैं, केवल शरीर मात्र ही उनके साथ है, ऐसे परमविविक्त बनकर वन में अपने आपका ध्यान करते हैं, अपने आपका दर्शन करके संतुष्ट रहा करते हैं।भला उन्हें यदि उस जंगल में अपने आपका अद्भुत आनंद न मिलता होता तो वे जंगल से भागकर अपने छोड़े हुए राजपाट को संभालने क्यों नहीं आ जाते? एक बार घर से निकलकर फिर घर आ गए हैं, ऐसा देखकर घर के लोग खुशियां मनाते, पर आपने बड़े-बड़े पुराणों को भी पढ़ा होगा―बड़े-बड़े राजा लोग, सेठ लोग उस त्यागे हुएवैभव के बीच फिर नहीं आए। वे तो जंगल में ही आत्मध्यान में ही मस्त रहे, उसमें ही संतुष्ट रहे। कैसा अद्भुत आनंद है इस आत्मा में?

अध्यात्मयोगज आनंद में कर्मनिर्दहनसामर्थ्य―आत्मा के स्वरूप का भान होने से जो एक अद्भुत विलास प्रकट होता है उस आनंद में ही यह सामर्थ्य है कि भव-भव के संचित कर्मों को क्षणभर में ही विनष्ट कर दे। कष्ट सहने से कर्म नहीं मिटते हैं बल्कि बँधते हैं। तपस्वीजन तपस्या करके, उपवास करके, तीनों गुप्तियों की कठिन साधना करके अंतरंग में निरंतर प्रसन्न रहा करते हैं, कष्ट नहीं मानते हैं। अज्ञानी जीवों को ऐसा दिखता है किये साधु संत बड़ा कष्ट भोग रहे हैं किंतु ज्ञानी पुरुष इस बात का अंतरंग में बड़ा संतोष मान रहे हैं कि मैं अन्य पदार्थों के विकल्प से हटकर निर्विकल्प आनंदधाम निजस्वरूप की ओर लग रहा हूँ। जो पुरुष कभी भी अपने आपमें अपने उपयोग को नियुक्त नहीं करता वह बड़ी तपस्यायें करके भी पराधीन है। ऐसा प्रतिपादन उन संत पुरुषों ने किया है, जिनके मोह का अंधकार रंच भी नहीं रहा है। जिन्होंने इस परमात्मतत्त्व की भावना करके वीतराग परम आनंद प्रकट किया है ऐसे महाश्रमणों ने,परमश्रुत केवली भगवंतों ने बताया है।

योगी का आत्मप्रयोजन-ज्ञानी पुरुष ऐसा चिंतन करते हैं कि आत्मकार्य को छोड़कर अन्य जगह चित्त लगाने से लाभ न होगा। जो आत्मनिष्ठ यति हैं उन यतियों का किसी अन्य पदार्थ से कुछ प्रयोजन नहीं है। जब तक जंतुवों के परविषयक चिंता बनी रहती है तब तक उनका संसार में संसरण चलता रहता है। अनेक कुयोनियों में वे जन्ममरण पाते रहते हैं। जैसे अग्नि को ईंधन का सहवास मिल जाय तो अग्नि बढ़ती ही रहती है इस ही प्रकार इस जीव को परविषयक चिंता विकल्प रहे तो इसका संसार बढ़ता रहता है। ज्ञानी,विरक्त साधुसंत समस्त परद्रव्यों से उपेक्षा करके निज सहज ज्ञानानंदस्वरूप का अनुभव करने में ही उत्सुक रहा करते हैं और इनके ही परमआवश्यक कर्तव्य हुआ करता है।


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